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कला भील के जीवन की कहानी 

पूजा मीणा:

राजस्थान राज्य के छित्तौड़गढ़ ज़िले के एक छोटे से गाँव बहेरूखेड़ा में कला नाम की एक लड़की रहती है, जो अपनी छोटी-सी उम्र में ही बहुत दुख देख रही है। 11 वर्ष की उम्र में ही उसके साथ कई तरह के दुर्व्यवहार हो रहे हैं। जब वह 5-6 साल की थी, तभी उसकी माँ उसे छोड़कर दुनिया से चली गई और करीब 1 साल बाद उसके पापा की भी मृत्यु हो गई। कला के तीन भाई-बहन हैं। उसके बड़े भाई की शादी हो चुकी है। अब कला का आखिरी सहारा उसका बड़ा भाई है। कला और उसका छोटा भाई दोनों ही अपने बड़े भाई के पास रहते हैं।

कला का भाई तो उसे अच्छे से रखता है, लेकिन उसकी भाभी उससे पूरे घर का काम करवाती है। खाना खाते समय उसकी थाली में दो रोटियाँ दी जाती हैं, वही वह खाती है। वह अपनी भाभी से और खाना भी नहीं मांग सकती, क्योंकि दोबारा खाना मांगने पर उसकी भाभी उसे ताने मारती है कि – और कितना खाएगी, काम तो कुछ करती नहीं है सुबह और शाम दोनों समय, उसे सूखी रोटी दी जाती है। उसकी भाभी उससे कहती है कि मैं मनरेगा में जा रही हूँ, मैं आऊँ तब तक घर का सारा काम कर लेना, कुछ भी बचना नहीं चाहिए। अगर कुछ काम कला से नहीं हो पाता है, तो उसकी भाभी वापस आकर उसे बहुत डांटती है।

पर कला अपना दुख किसके साथ बांटे, यह उसकी सबसे बड़ी समस्या थी। उसकी भाभी उससे अपना छोटा बच्चा भी रखवाती है। कला पूरे दिन उस बच्चे को रखने और घर का काम करने में ही गुजारती है। उसकी भाभी अपने बच्चों को तो स्कूल पढ़ने भेजती है, लेकिन कला को नहीं भेजती, क्योंकि अगर कला पढ़ने जाएगी तो उसके बच्चों को कौन रखेगा, उनकी देख-रेख कौन करेगा। इसी कारण वह कला को स्कूल नहीं भेजती।

बहुत ही मुश्किल से आधारशीला शिक्षण केंद्र की सुमन चौहान, जो गाँव में महिलाओं व लड़कियों के साथ शिविर करती हैं, उन्होंने कला की भाभी को समझाया कि कला को आधारशीला शिक्षण शिविर में पढ़ने भेजो, कला को सब कुछ मैं लाकर दूँगी। वे रोज़ कला को लेने जाती थीं, पर फिर भी उसे नहीं भेजा जाता था। कुछ दिनों बाद कला की भाभी ने उसे वहाँ पढ़ने के लिए भेजा। कला 5-6 महीने आधारशिला में रही। सुमन माई ने उसे सब कुछ दिलाया, चाहे वो कपड़े, कॉपी, पेन हों, कपड़े रखने के लिए पेटी, हर चीज़ दिलाई। कला को यह महसूस नहीं होने दिया कि उसकी मम्मी नहीं है। उन्होंने माँ का हर फर्ज निभाया, जिससे कला में अपनापन आया। उसमें कई बदलाव आए, उसकी झिझक खुली। वह हर सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने लगी, बोलने लगी, सबके साथ मिल-जुलकर रहने लगी। पढ़ाई में भी बहुत होशियार बनी, पढ़ना-लिखना सीख लिया। सुमन माई हर त्योहार पर उसे अपने पास रखती थीं।

जब भी उससे पूछा जाता था, कला तुम्हें घर की याद नहीं आती, तो वह कहती थी कि मेरे घर में कोई नहीं है, मुझे किसी की याद नहीं आती। मेरा सब कुछ अब सुमन माई हैं। मैं उनके पास रहूँगी, कभी घर नहीं जाऊँगी। यही रहूँगी, मेरी माँ सुमन माई हैं।

पर जब वह गर्मी की छुट्टियों में अपने छोटे भाई से मिलने घर गई, तब से उसकी भाभी ने सोचा कि वह वापस चली जाएगी, इसलिए उसे दोबारा हॉस्टल नहीं भेजा। अभी भी सुमन माई उसकी भाभी को कॉल करके कहती हैं कि कला को भेजो, तो वह कहती है कि आज भेजूँगी, कल भेजूँगी, और फिर कभी नहीं भेजती। कई बार उसे लेने उसके घर भी जाती है, पर उसकी भाभी उसे नहीं भेजती।

जब कला से पूछा जाता है कि कला, तू हॉस्टल में नहीं आना चाहती? तो वह कहती है कि मैं पढ़ना चाहती हूँ, पर मेरी भाभी मुझे नहीं भेजती।

आज वह फिर उसी स्थिति में आ गई है, जो पहले थी। छोटी-सी उम्र में इतना दुख देख रही है। पर सुमन माई अभी भी उसे हॉस्टल लाने का पूरा प्रयास कर रही हैं और उसे शिक्षा से जोड़ने का प्रयास भी कर रही हैं।

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  • पूजा मीणा राजस्थान के छित्तौड़गढ़ ज़िले की निवासी हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर संगठन और आधारशिला बालिका केंद्र से जुड़ी हैं, जहाँ वह श्रम और लड़कियों की शिक्षा से संबंधित मुद्दों पर अपनी समझ और दृष्टिकोण विकसित कर रही हैं व सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं। 

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