ज्ञानेन्द्र अवस्थी:
निक हनौएर कोई वामपंथी प्रोफेसर नहीं हैं।
वह किसी एनजीओ से पेट नहीं भरते।
वह अमेरिका के शीर्ष 0.01% अमीरों में शामिल एक अरबपति निवेशक हैं – Amazon के शुरुआती निवेशकों में से एक।
उनकी निजी संपत्ति सैकड़ों करोड़ डॉलर में है।
यानी जब वह कहते हैं कि
नवउदारवादी अर्थशास्त्र झूठा और खतरनाक है,
तो यह “ईर्ष्या” नहीं, अंदरूनी गवाही है।
और उनकी गवाही सीधी है –
पिछले 40 वर्षों में जिस आर्थिक सिद्धांत को “विकास” कहा गया,
उसने समाज नहीं बनाया –
उसने सिर्फ़ अमीरों के लिए एक एक्सट्रैक्शन मशीन बनाई।
नवउदारवाद का असली सच
नवउदारवाद यह दावा करता है कि
अगर अमीरों को टैक्स में राहत दी जाए,
श्रमिकों की मज़दूरी दबाई जाए,
और बाज़ार को “मुक्त” छोड़ दिया जाए,
तो संपन्नता नीचे तक पहुँचेगी।
हनौएर इसे एक वाक्य में नंगा कर देते हैं –
“Trickle-down doesn’t trickle.
It’s a pump – sucking money upward.”
पैसा नीचे से ऊपर जाता है।
हमने इसे भारत में देखा है, अमेरिका में देखा है, हर जगह देखा है।
यह सिर्फ़ असमानता नहीं है – यह राजनीतिक विस्फोट की तैयारी है
हनौएर का सबसे डरावना तर्क यही है:
जब असमानता चरम पर पहुँचती है,
तो लोकतंत्र सुधार नहीं करता –
वह टूटता है।
इतिहास यही बताता है।
जब नीचे के 50–60% लोगों के पास खोने को कुछ नहीं बचता,
और ऊपर के 1% के पास सब कुछ होता है,
तो व्यवस्था के पास दो ही रास्ते बचते हैं –
- समावेशी सुधार
या - ध्रुवीकरण, दमन और दुश्मन निर्माण
और यहाँ से अर्थशास्त्र राजनीति में बदल जाता है।
धर्म, जाति, राष्ट्र – ये अचानक क्यों उछाले जाते हैं?
हनौएर स्पष्ट कहते हैं –
जब आर्थिक असमानता खुलकर दिखाई देने लगती है,
तो सत्ता को ध्यान भटकाने के औज़ार चाहिए।
तभी
धर्म उबाल दिया जाता है,
जाति को हथियार बनाया जाता है,
राष्ट्रवाद को नशे की तरह परोसा जाता है,
और हर असहमति को “दुश्मन” ठहरा दिया जाता है।
यह संयोग नहीं है।
यह क्लास वार को कल्चर वार में बदलने की रणनीति है।
“लालच अच्छा है” – यह पूंजीवाद नहीं, समाज-विरोध है
नवउदारवादी दर्शन ने एक झूठ बेच दिया –
Greed is good.
हनौएर इसे साफ़ शब्दों में खारिज करते हैं:
“अत्यधिक लालच कोई बिज़नेस स्किल नहीं है।
यह समाज-विरोधी मानसिकता है –
और अंततः यह बाजार को भी नष्ट करती है।”
असल पूंजीवाद
सहयोग से चलता है,
भरोसे से चलता है,
और उन लोगों से चलता है
जिनके हाथ में खर्च करने की क्षमता हो।
सबूत? सिएटल देखिए
जब सिएटल में न्यूनतम मज़दूरी 15 डॉलर की गई,
तो डराया गया कि नौकरियाँ खत्म हो जाएँगी।
नतीजा उल्टा निकला –
रोज़गार घटा नहीं
छोटे व्यवसाय बढ़े
खपत बढ़ी
अर्थव्यवस्था मज़बूत हुई
क्यों?
क्योंकि लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा आया।
दान नहीं, नियम बदलने होंगे
हनौएर कहते हैं –
“मैं अमीरों में से हूँ।
लेकिन दान देकर अपनी आत्मा को शुद्ध करने में विश्वास नहीं करता।
मुझे ऐसे कानून चाहिए जो मुझ जैसे लोगों को टैक्स देने पर मजबूर करें।”
क्योंकि
व्यक्तिगत दया से सिस्टम नहीं बदलता।
नीति बदलने से बदलता है।
सबसे असहज सच – जिसे अमीर जानते हैं
हनौएर का अंतिम संदेश चेतावनी है:
“अगर हम असमानता ठीक नहीं करेंगे,
तो पिचफोर्क आ रहे हैं।”
यह कोई क्रांतिकारी नारा नहीं।
यह इतिहास की ठंडी भविष्यवाणी है।
अत्यधिक असमानता का अंत
शांति से नहीं होता।
इसलिए सवाल अर्थशास्त्र का नहीं है
सवाल यह नहीं है कि GDP कितनी बढ़ी।
सवाल यह है कि
वह बढ़ोतरी किसके लिए थी।
और अगर इस सवाल से ध्यान हटाने के लिए
धर्म, जाति, पहचान और दुश्मन गढ़े जा रहे हैं –
तो समझ लीजिए,
समस्या विकास की नहीं,
वितरण की है।
और उससे ध्यान भटकाने की,
एक सुनियोजित राजनीति की।

