Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

कावड़ यात्रा में शालीनता का महत्व

हीरालाल:

श्रावण का महीना शुरू होता है, प्रकृति नीली चादर ओढ़कर अपने आप को सुसज्जित कर लेती है। वृक्षों की कोंपलें नया आकार लेकर परिवृद्धित होती है। झरने फूट पड़ते हैं, कांच की तरह स्वच्छ जल का प्रवाह होने लगता है, चारों ओर पानी ही पानी। उसी समय देश के कई हिस्सों में 16 दिन तक भगवान शिव के नाम पर कांवड़ यात्रा शुरू की जाती है।

कांवड़िये अपनी कांवड़ लेकर रवाना होते हैं। मार्ग में चलते रहते हैं। आराध्य शिव के गुणगान का गायन करते हैं। लेकिन राह में कई जगह उत्पात मचाया जाता है वह कितना उचित या अनुचित है। आप राह में चलते हैं। भूख लगी, ढाबे पर खाना खाया, आपकी मंशा पैसे देने की नहीं थी, आपने यह कहकर उत्पात मचाना शुरू किया कि खाने में मिर्च ज़्यादा है, प्याज है इत्यादि, अंत में उस गरीब के ढाबे को तहस-नहस कर दिया, क्या कांवड़ियों का यही धर्म होता है?

यही नहीं, आपकी कांवड़ यात्रा जारी है। किसी को राह में कोई वाहन थोड़ी छू जाए, उस वाहन में तोड़-फोड़ कर देते हैं, क्या यह आप में धार्मिक शालीनता है? चश्मे वाले की दुकान पर जाते ही आपको चश्मा लेना है, उसके सही दाम नहीं दे पाते हैं, उस वजह से झगड़ा कर उसकी पूरी दुकान तोड़ देते हैं, सारा सामान नष्ट कर देते हैं। क्या यह शालीनता है? उन पर यूपी पुलिस कार्रवाई करती है, एवं यह कहकर छोड़ देती है कि जाओ अब ऐसा मत करना, क्या यह न्याय है?

ऐसे समय पर यूपी के एक शिक्षक राजनीश गंगवार एक कविता सुनाते हैं और उन पर एफआईआर कर दी जाती है। जबकि उनकी कविता में बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक करने के भाव थे। कविता की पंक्तियां – “तुम कांवड़ में मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना” – इस कविता में हमें कहीं भी लगता है कि यह कविता धर्म विरोधी है? इसका सीधा-सादा मतलब क्या है? यह आप सबको सोचना चाहिए।

फीचर्ड फोटो आभार: द हिन्दू

Author

  • हीरालाल, झिरी के राजस्थान ज़िले में रहते हैं। वह सन 2000 से क्षेत्र के हम किसान संगठन के साथ जुड़कर कार्य कर रहे हैं। साथ ही,झिरी गाँव में चलता आया मंथन स्कूल में हीरालाल जी शिक्षक के रूप में सक्रीय योगदान दिये हैं। वर्तमान में स्कूल नहीं चलाया जा रहा है पर हीरालाल जी संगठन के साथ उनके इलाके के ग्रामीण मुद्दों व समुदाय के आधिकारों के लिए काम कर रहे हैं।

    View all posts
Exit mobile version