आशीष कुमार :
सन 1975 में अब्दुल बारी जी ने साइकिल मिस्त्री के रूप में अपना कार्य शुरू किया। उन्होंने जीआईसी इंटर कॉलेज के बाहर एक छोटी सी दुकान से शुरुआत की थी। उस समय शहर छोटा था, साधन सीमित थे, लेकिन बारी साहब की लगन और मेहनत अटूट थी। साइकिल मरम्मत से जो भी आमदनी होती, उसी से उन्होंने अपने परिवार का पालन-पोषण किया।
कुछ समय बाद कॉलेज के पास से उनकी दुकान हटा दी गई। यह परिवार के लिए एक बड़ा संकट था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खोजनपुर परिक्रमा मार्ग पर किराए की एक दुकान लेकर फिर से काम शुरू किया।
समय के साथ उनके पुत्र मोहम्मद इरफान भी इस कार्य में शामिल हो गए। लगभग 1985 में उन्होंने वही दुकान, जो पहले किराए पर थी, खरीद ली। यहीं से इरफान भाई के जीवन में एक नया अध्याय शुरू हुआ।
इरफान भाई पैरों से विकलांग हैं, लेकिन उन्होंने इस बात को कभी अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने पांच भाइयों को साथ लेकर न केवल दुकान चलाई, बल्कि सबकी शादियाँ भी करवाईं और एकजुट परिवार की मिसाल पेश की। आज उस मेहनत की बदौलत उनके पास उसी मार्केट में चार दुकानें हैं। एक साइकिल की और तीन गाड़ियों की मरम्मत की दुकानें हैं। दो भाइयों को उन्होंने खुद गाड़ी मिस्त्री का काम सिखवाया और पूरे परिवार को रोज़गार से जोड़ा। शहर के अधिकतर लोग आज भी अपने वाहन की मरम्मत के लिए इनके पास आते हैं, न केवल हुनर के लिए, बल्कि इनके व्यवहार और ईमानदारी के लिए भी।
लेकिन अब इस परिवार के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। 14 कोसी परिक्रमा मार्ग पर नगर निगम द्वारा किए जा रहे सड़क चौड़ीकरण के चलते इनकी सभी दुकानें हटाए जाने की प्रक्रिया में हैं। जब हमने इरफान भाई से पूछा कि दुकानों के हटने के बाद वे कहाँ जाएंगे, तो उनका जवाब था “कुछ पता नहीं, दुकान की तलाश में हैं। जब तक दुकानें नहीं टूटतीं, तब तक काम चलता रहेगा। पर उसके बाद क्या होगा, कुछ नहीं कह सकते।”
उनका चेहरा चिंता से भरा था, लेकिन उनकी बातों में हौसला साफ़ झलकता था। “जैसे पहले मेहनत से खड़ा किया था, वैसे ही फिर से खड़ा करेंगे। मेहनत करने वालों की हार नहीं होती।”
यह सुनकर हमारे अंदर भी एक नई ऊर्जा जागी। सच में, जो लोग मेहनत से अपना आशियाना खड़ा करते हैं, उनके हौसले को कोई तूफ़ान हिला नहीं सकता।
इरफान भाई और उनके भाइयों को इस अतिक्रमण हटाओ अभियान में अपनी बनाई पूंजी को खोने का गहरा दुख है। मुआवज़ा कितना मिलेगा, यह भी साफ नहीं है, और अगर मिला भी तो उससे दोबारा दुकान खरीदना आसान नहीं होगा। फिर भी, उनकी बातों में आत्मविश्वास था “काम तो करना ही है, चाहे जैसे भी हो।”
1975 में एक साइकिल मिस्त्री की छोटी सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज चार दुकानों और एक आत्मनिर्भर परिवार तक पहुँचा है। यह सिर्फ़ एक दुकान की कहानी नहीं, बल्कि मेहनत, जज़्बे और हौसले की मिसाल है। जिसे अब चुनौती के समय एक बार फिर खुद को साबित करना है।

