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समर्पण – एक कविता

उमेश भट्ट ग्वाला :

आज एक कविता के प्रत्युत्तर में कुछ पंक्तियां यूँ ही लिख दी थी। एक मित्र की कॉल आई है, कहते हैं कि ऐसे ही लिखते रहा करो। आप क्या कहते हो?!

तुम तो बस बताते जाना
किस किस से मिलना है
नाव मैं चलाऊंगा
तैरना भी जानता हूँ
जरूरत पड़ी तो
पीठ पर बिठाकर
नदी पार कराऊंगा।।

पहाड़, टीले, चट्टान
तालाब, पेड़ और खेत भी
खुद ही आएंगे चलकर, पर
गाँव खलिहान के किसान
मज़दूर और जरूरतमंदों तक
तुमको पहले पहुंचाऊंगा

फुरसत तक का इंतजार
मैं नहीं करवाऊंगा
किसी का जरूरी काम
हमारी इच्छा पर ना हो निर्भर
अपनी सारी इच्छाओं से
किनारा करके ही
तुम्हारे साथ आऊंगा।।

उपनाम भी होना चाहिए कहते हैं कवि का, मुझे “ग्वाला” ही सही लगा !

Author

  • उमेश भट्ट, वर्तमान में बिन्दु खत्ता के निवासी हैं। वह मूल पिथौरागढ़ जनपद के दसौली के निवासी हैं। उमेश, बिन्दु खत्ता की वन अधिकार समिति के सक्रिय सदस्य हैं और प्रगतिशील किसान संगठन के संयोजक की भूमिका में भी कार्यरत हैं। दूध के काम को पहाड़ में धिनाली बोला जाता है, उमेश धिनाली नाम से ही एक डेयरी भी चलाते हैं।

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