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क्या आज़ाद हैं हम – कविता 

मिनाक्षी :

क्या आज़ाद हैं हम…?
बंधी तो नहीं हैं ज़ंजीरों में, फिर भी बंधे हुए हैं हम।
डाली तो नहीं पाऊं मैं बेड़ियों पर,
फिर भी चल नहीं पा रहे हैं हम।
क्या आज़ाद हैं हम…
बटे हुए हैं दलों में, टुकड़ों में,
जातियों के नाम पर बंटे हैं सब।
क्या आज़ाद हैं हम…
व्यवस्था से हो रही रोज़ लड़ाई,
हिंदू-मुस्लिम के नाम पर।
गाँव-गाँव होते हैं दंगे,
क्या आज़ाद हैं हम?
न भाईचारे की बात होती है, न समानता की,
अगर होती है, तो बस हिंदू-मुसलमान की।
क्या आज़ाद हैं हम…
सुर बिछड़े हुए हैं हमारे, ताल जुड़ता है,
गीत गाता है देशभक्ति का,
फिर भी दंगे करते हैं।
लड़ते हैं राजनीतिक खेल में,
और मासूम मरते हैं।
क्या आज़ाद हैं हम…
इस देश में नहीं सुनता कोई हमारी,
इस देश में नहीं है हमारा कोई अस्तित्व।
बोलो, कैसे आज़ाद हैं हम?
जाति व्यवस्था और असमानता में फंसे हैं हम,
ऊपर से अंधश्रद्धा में पड़े हैं।
क्या आज़ाद हैं हम…

Author

  • मिनाक्षी अहमदाबाद, गुजरात की रहने वाली एक कवि और कार्यकर्ता हैं। मिनाक्षी सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित कविताएँ लिखती हैं एवं एक दलित कार्यकर्ता के रूप में अपने काम और एक श्रमिक संगठन में काम करने के अपने अनुभवों से प्रेरणा लेती हैं।
    इनकी कविताएँ अक्सर हाशिए पर पड़े समुदायों के संघर्षों और लचीलेपन को दर्शाती हैं और सामाजिक न्याय और समानता की वकालत करती हैं। इनका मानना ​​है कि युवानिया का मंच मिनाक्षी की आवाज़ के लिए एक शानदार घर हो सकता है, जो उन दर्शकों तक पहुँच सकता है जो इन विषयों से जुड़ते हैं।

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