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आज के वैचारिक युद्ध में हम: लघुकथा

नीतिशा खलखो: 

दृश्य: एक भगदड़ का वीडियो मुंडी गड़ाए हुए सभी दोस्त देखने में व्यस्त है। संकरी बन्द गलियों में भीड़ कुछ छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर सरियों और डंडों से मार रही है। कसूर है लंबी दाढ़ी मूछ लिए, हवाई चप्पल पहने, झोला लटकाए  एक खास यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट होना।

मीडिया ने कई दिनों से अपनी वाचालता से यह हर आम जन के जेहन में बैठा दिया है कि ये लोग देश विरोधी हरकतों में संलिप्त है। देश में टैक्स का बड़ा खर्च इन उम्रदाराजों को पढ़ाने में खर्च हो रहा, देश की माली हालत इन्ही लोगों के कारण खराब है।

कबीर : यार यह तो अति हो गया है। इस सुमिरका (जगह) की गलियों को हम छात्रों ने ही गुलजार बनाये रखा है। जबसे ऐ. एन. यू यहाँ खुला है तब से इस जगह के रेट किराए के बढ़े हैं।

अगर हम यहाँ न हो तो इस जगह में खाने के लाले पड़ेंगे मकान मालिकों को। हमसे ये जीते हैं। और सालों-साल यहाँ रहकर छात्रों ने इस जगह को इतना सुंदर व  स्वस्थ माहौल बनाया है। और आज चंद बेहूदा न्यूज़ चैनल और सत्ता की मानसिकता से ये हमले हम स्टूडेंट पर हो रहे। माइक पकड़कर कैमरे के सामने ये नाटककार एंकर ने जो जहर फैलाना था वह फैला दिया, अब भोग हम रहे।

शांतनु : कल अनिरुद्ध और कला भी कुछ सामान खरीदने केमिस्ट शॉप गए थे तो कुछ लोकल्स ने उनको देखते ही कॉन्डोम और सेक्स टॉय खरीदने आये हो जैसे वाहियात बातें करके छेड़ने की कोशिश की। कला पूरे माहौल को भांपते हुए बहुत सावधानी से अनिरुद्ध को लेकर वहाँ से निकल पड़ी। स्टूडेंट्स पर हो रहे हमले रोज अखबार, सोशल मीडिया में कहीं न कहीं से सामने आते रहे हैं।

मनमीत : मैं तो अब अपने लैंड लॉर्ड को बोल चुकी हूँ कि दरवाजे पर डबल लॉक लगाने की व्यवस्था कर दें। अब किसी भी तरह की आपाधापी से दिल धक-धक् करके रह जाता है कि अब अपनी गालियां सेफ नहीं लगने लगी है। जब लोग हॉस्टल घुसकर एक क्लोज्ड कैंपस में सिक्योरिटी के रहते हमले कर सकते हैं तो …. तो इन गलियों और किराए के मकानों का क्या ही भरोसा ?

कबीर : पर यह हल नहीं है। देश को इस यूनिवर्सिटी ने क्या कुछ नहीं दिया है ? देश में चल रहे हर आंदोलन को देख लो, वह इसी तरह की चुनिन्दा यूनिवर्सिटीज की ही देन है। आज इनके इन हमलों से हम आहत होने के बजाय मजबूत बनेंगे।

विचार जिंदा थे, जिंदा हैं, जिंदा रहेंगे। देखना है यह युद्ध कब तक जाकर विराम ओढेगा! इतिहास इनसे सबक लेकर रहेगा। झूठ; एक दिन सच की राह ज़रूर  पकड़ेगा। हम टूटे नहीं, बिखरे नहीं यह आज के समय की सबसे जायज मांग है। देश की चिंता करने वाली जमात पर देशद्रोही होने का तमगा हम हटा कर रहेंगे। सच हम सबको बता कर रहेंगे।

(घोर मौन में सबके ललाट लकीरों से बंधे हुए, पर उस पर चमकता तेज़ उस वीरान सांझ को भी अपने उजाले से उजरा करते दिखी।)

Author

  • नीतिशा, झारखंड की रहने वाली हैं। वह वर्तमान में झारखंड के धनबाद ज़िले में स्थित बी.एस.के. कॉलेज, मैथन में विभागाध्यक्ष हैं। नीतिशा कई आदिवासी आंदोलनों, विशेषकर साहित्यिक आंदोलनों से जुड़ी हैं।

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