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अंधविश्वास के खिलाफ आवाज़ उठाना हमारा कर्तव्य है

ब्रजेश कुमार निराला:

अभी भी ऐसे लोग हैं जो शिक्षित होकर भी पुरानी मान्यताओं में विश्वास रखते हैं। उनको लगता है कि जो भी है सब यही है। जैसे हमारे गाँव में कुछ दिन पहले कि ही यह घटना है- गाँव में धान की खेती शुरू करने से पहले मान्यता है कि देवी-देवताओं की पूजा करने से हमारे अधिक वर्षा और अच्छी फसल होगी। इस कारण पूजा-अर्चना करते हैं और बकरा या बकरी की बली देते हैं और गाँव खुटाया जाता है। गाँव खुटाने का मतलब है कि कोई अन्य गाँव का भूत-प्रेत हमारे गाँव में प्रवेश ना करे। पूजा करने में किसी पंडित नहीं बल्की मांझी देवा का अहम योगदान रहता है, क्योंकि उनके बिना पूजा हो ही नहीं सकती।

जब हमारे गाँव में पूजा हो रही थी, तब हमने देखा कि पूजा करने वाला व्यक्ति पूरा नशा में है और पूजा कर रहा है। जब बकरे की बलि देने का समय आया तब उसका सिर ना काटकर उसका सिर कुचल कर मारा जा रहा था। यह सब देखकर हमारा रूह काँप गया, यह सब देखकर हमको रहा नहीं गया और हमने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई। लेकिन 100 के बीच में एक अकेला हम कुछ नहीं कर पाए, हमारी बात किसी ने नहीं सुनी। लोग बोले यह परंपरागत विधि है इसे करना मान्य है, इसे करने से हम लोगों की फसल अच्छी होती है और वर्षा भी अधिक होती है। फिर हमने कुछ ऐसा किया जिससे लोग गुस्सा हो गए, जो दो बकरे बंधे थे, उनको हमने चुपके से खोल कर भगा दिया। फिर सभी लोग हमको बोलने लगे और डांटने लगे, मेरे दादाजी वहाँ से हमें घर भेज दिए, फिर पता नहीं वहाँ क्या हुआ?

समाज के अंधविश्वास और दुष्कर्म  के प्रति आवाज़ उठाना ही हमारा कर्तव्य है और यह हम निष्ठा पूरक करके ही रहेंगे। आज भले ही हमने अकेले आवाज़ उठाई हो, पर हमें उम्मीद है कि आगे चलकर हज़ारों के तदात में लोग अंधविश्वास और ऐसे घिनौना काम के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए हमारे साथ रहेंगे।

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  • ब्रजेश, बिहार के गया ज़िले से हैं। वह स्थानीय संगठन मजदूर किसान समिति के साथ स्थानीय मुद्दों पर काम करते हैं। ब्रजेश, सामाजिक परिवर्तन शाल से भी जुड़े हैं। वह गाँव के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते हैं।

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