श्रुति संस्था के साथी महिपाल ‘मोहन’ ने खेमराज भाई के रोज़ाना के फेसबुक स्टेटस को कहानियों के रूप में संकलित किया। इस संकलन को साल 2019 में ‘खेमराज भाई की डायरी’ के नाम से प्रकाशित किया। नीचे लेख के रूप में प्रकाशित इस किताब की भूमिका, महिपाल ‘मोहन’ ने ही लिखी जो खेमराज भाई के व्यक्तित्व का एक छोटा लेकिन प्रभावी ब्योरा है।
महिपाल सिंह (मोहन):
खेमराज चौधरी, किसी भी परिचय के मोहताज नहीं है। खेमराज भाई का नाम तो 14-15 साल पहले से सुना, लेकिन उनको करीब से जानने का मौका पिछले 7-8 सालों में ही मिला, उनके जीवन के संघर्ष की कहानियाँ बहुत सुनी। हमेशा से ही गरीब और शोषित वर्ग के लिये हर लड़ाई में सदा उन्हें खड़ा पाया, समाज के लिये लड़ते-लड़ते आज वो खुद की जिंदगी की भी लड़ाई लड़ रहे हैं।
कैंसर जैसे रोग के बावजूद वो लोगों की मदद करना नहीं भूलते, आज भी हर रोज़ ठीक उसी तरह निकल पड़ते हैं, जिस तरह क्रिसमस के दिन सेंटा क्लौज़ निकलता है अपनी पोटली के साथ। ठीक उसी तरह इन सभी लोगों को खेमराज जी का इंतज़ार रहता, सेंटा के आने की खुशी तो एक दिन की होती है लेकिन इनके आने की हमेशा ही खुशी रहती है। आज भी उनके गाँवों में जाने से किसी न किसी को एक नई ज़िंदगी मिलती है, उम्र में चाहे बड़ा हो या छोटा, वो हर किसी को बिना ‘जी’ के संबोधित नहीं करते, बच्चों के साथ किस तरह वह एकदम बच्चे बन जाते हैं, यह देखने लायक है।
खेमराज भाई ने अपना पूरा जीवन उन लोगों के नाम समर्पित कर दिया जो आज भी समाज की तथाकथित मुख्यधारा से कोसों दूर हैं। उन्होने लोगों को अपने जीवन का एक-एक पल दिया और दे रहे हैं। मैं पिछले कई सालों से उनके साथ जुड़ा हूँ, जिस तरह आज सोशल मीडिया का लोग दुरुपयोग करते हैं, उसके ठीक उलट खेमराज जी ने इसका सदुपयोग किया है। उनकी एक-एक पोस्ट से हर किसी की ज़िंदगी जुड़ी हुई है, आज लोग किसी को थोड़ी भी मदद करते हैं तो उसे इस तरह दिखाते हैं, जैसे दुनिया के सब से बड़े दानवीर हों, लेकिन खेमराज जी ने कभी अपने आप को इस तरह पेश नहीं किया, हमेशा पीछे से काम किया। इसके इसी व्यक्तित्व से मुझे इन कहानियों को संकलन का रूप देने के लिये प्रेरणा मिली।
उनकी एक-एक कहानी हमको उस भारत की तस्वीर दिखाती है जो हकीकत का भारत है। आज़ादी के 72 वर्ष बीतने के बाद भी हम आज कहाँ है? ये कहानियाँ हमें यह देखने और सोचने को मजबूर करती है कि आज भी देश में सरकारों को जो काम करना चाहिए, वो नहीं कर रही हैं, विकास शब्द केवल आंकड़ों में दिखाने के लिये ही है। खेमराज भाई की भाषा एकदम सरल और बेबाक है। भील समुदाय के संघषों को जिस तरह उन्होंने देखा, समझा और महसूस किया वो हम सभी को इन छोटी-छोटी कहानियों में देखने और समझने को मिलेगा। इन सभी कहानियों में हमने केवल थोड़ा-बहुत शब्दों को ठीक किया है, बाकी सब उनकी ही भाषा में है। उम्मीद है कि ये किताब हमें असल भारत की असल तस्वीर को समझने में मदद करेगी।
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