शंकर सिंह :
खेमराज के साथ बिताए पल कभी भूल नहीं सकता खेमराज एक व्यक्ति से ज़्यादा एक विचार था। खेमराज उस विचार को लोगों के बीच जीता था। वह समानता का पक्षधर थी, लेकिन केवल थ्योरी में नहीं, वह उसे व्यवहार में जीता था। गरीबी की पीड़ा को, उसके दर्द को खेमराज ने उन्हीं के बीच में रहकर जिया। खेमराज के मूल्य समानता, को लेकर बहुत कठोर थे। गरीबी में जीना, उनके साथ वैसे ही रहना, जितना कम में गुज़ारा हो सके, वह करता था। उनके भीतर लोगों को जोड़ने की बड़ी अदभुत क्षमता थी। कठिन से कठिन परिस्थितियों में रहकर जीना खेमराज का स्वभाव था। सामने वाला दुश्मन कितना भी बड़ा हो उसको चुनौती देने में खेमराज को मजा आता था। मार्क्सवादी साहित्य पढ़ने में खेमराज की बहुत रुचि थी, पढ़ना, मार्क्सवाद को लोगों के साथ जीना और आंदोलन खड़ा करना खेमराज के जीवन का लक्ष्य था। खेमराज का विज़न बहुत बड़ा था, वह चाहता था कि एक ऐसी दुनिया बने जहाँ न्याय हो, समानता हो और वह समझता था कि आर्थिक समानता हासिल करने के लिए संघर्ष ही रास्ता था। रास्ता तो सही है, वैसी दुनिया बननी भी चाहिए, लेकिन राह कठिन है। उसका हर पल गरीबों के लिए था, उनको संगठित करने में उसने अपनी जी जान लगा दी।
मैं ऐसे ही चांस से खेमराज के साथ SWRC (सोशल वर्क रिसर्च सेंटर) तिलोनिया में जुड़ गया था, इसकी वजह भी खेमराज ही था। जब मैं खेमराज से मिला तो मैं प्रौढ़ शिक्षण समिति में रात्रि स्कूलों को सुपरवाईज़ करता था, लेकिन यह मेरे जीवन का उद्देश्य नहीं था बस एक नौकरी थी। इसी दौरान मैं रामलीला मण्डली में भी जुड़ गया था और रात्रि स्कूल में काम करने के साथ मैं शौकिया काम के रूप में रामलीला में जोकर का रोल भी किया करता था, जोकर का काम लोगों को हँसाने का था। मैंने अपने इस शौक, इस हुनर को प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र के रात्रि स्कूलों में पपेट (कठपुतली) के माध्यम से आजमाना शुरू किया जो लोगों को भी पसंद आया। जहाँ यह रात्रि स्कूल था, उस गाँव में SWRC का भी काम चल रहा था। यहीं खेमराज ने मुझे तिलोनिया में काम करने का ऑफर दिया।
खेमराज लोगों को बहुत जल्दी प्रभावित कर देता था, मैं भी उसी का शिकार हुआ और प्रौढ़ शिक्षण समिति छोडकर SWRC तिलोनिया में खेमराज के साथ काम करने लगा। लेकिन वहाँ काम करते हुए भी खेमराज के मन में बहुत से सवाल थे। वह कहा करता था, “प्रोजेक्ट लेकर काम करने वाले क्रांति को दबा देते हैं, लोगों में इस व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी गुस्से में बदलनी चाहिए, तभी क्रांति आ पाएगी। एनजीओ प्रोजेक्ट वाले काम से क्रांति को दबा देते हैं।” मुझे यह बातें कम समझ आती थी। मेरी समझ का स्तर केवल इतना ही था कि मैं इससे बहर नौकरी मिलने के इंतज़ार में काम कर रहा था। मुझे बदलाव को लेकर खेमराज के कमिटमेंट और उसके उसूलों ने बहुत प्रभावित किया। फिर खेमराज तिलोनिया छोड़कर क्रांति कहाँ से और कैसे आएगी, इन सवालों के जवाब की तलाश में झाबुआ चला गया।
झाबुआ जाकर जो उसने किया वो बहुत ही अदभुद था, एक अकेला बंदा अंजान इलाके में जाकर क्रांति के लिए लोगों को तैयार करने चला गया। कितने ही दिन वह रेलवे स्टेशन पर उन बेघर बेसहारा लोगों के बीच में सो जाता था, दिन भर घूमता रहता कि कोई मिल जाए जिससे दोस्ती करने का मौका मिले। रात बेघर लोगों के बीच बिताता था और दिनभर दोस्तों की तलाश करता। कभी किसी बाबा के आश्रम में झाड़ू-बुहारी करके मंदिर का घन्टा बजाकर खाना खा लेता, हालांकि उसका आश्रम में कोई विश्वास नहीं था। ऐसी हि एक जगह पर खेमराज को खेमला मिल गया और वह उसके साथ उसके ही घर चला गया गया। अब खेमराज उनके गाय-बकरी चराने का काम करता उसक बदले आ घर में खाना खाता और अपने विचार साझा करता। और फिर खेमला के साथ हुई यह दोस्ती खेडूत मजदूर चेतना संगठन के रूप में विकसित हुई।
खेमराज के साथ की ऐसी तो कई यादें हैं लेकिन अंत में एक हल्के फुल्के पल का ज़िक्र मैं विशेष रूप से करना चाहूँगा। उस वक्त संगठन के साथियों ने छोटी गेंदरा के स्कूल में डेरा जमाया हुआ था। कमरे में क्रांति की बातें चल रही थी और मैं काली चाय बना रहा था (मेरा मन इनकी क्रांति की बातों में कम लगता, अत: ऐसी चर्चाओं के दौर में मैं यह काली चाय बना कर देता रहता था)। रात के करीब ढाई बज चुके थे और अब आई क्रांति, तब आई क्रांति, ऐसे आएगी क्रांति, वैसे आएगी क्रांति की बात चल रही कि तभी पड़ोस के कमरे में रहने वाले मास्टर जी आए और बोले, “भाई साहब क्या आपकी क्रांति सुबह तक रुक जाए तो चल सकता है, मुझे सोना है?” उसके बाद हमारे क्रांतिकारी साथी भी सो गए और क्रांति भी वहीं रुक गई, शायद मास्टरजी नहीं रोकते तो क्रांति आ ही जाती। ऐसे कितने ही पल, कितनी यादें जुड़ी हैं खेमराज से, खेमराज जैसे व्यक्तित्व के लोग दुनिया में बहुत कम होते हैं। आज खेमराज का नहीं होना हम सभी के लिए बहुत बडा लॉस है।

