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राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की मज़दूर महिलाओं की कहानियाँ

सुमन चौहान:

कन्नू:

कन्नू अमरपुरा गाँव में रहती है, उसके पिताज का नाम प्रभु लाल और माँ का नाम मुन्ना बाई है। कन्नु की 6 बहनें हैं, और सभी की शादी हो गई है। एक बड़ी बहन की शादी हो जाने के बाद एक-एक कर इन सबकी शादी कर दी गयी। जब कन्नू की उम्र छोटी थी, तभी उसकी शादी हो गयी थी। कन्नु अपने ससुराल नहीं जाती है और उसने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। कन्नू का कोई भाई नहीं है, तो इसलिए वो अपने मम्मी-पापा के साथ रहती है। उसकी सारी बहनें मज़दूरी करती हैं। सभी खेत मज़दूरी करते हैं। उसकी दो बहनों ने आठवीं तक पढ़ाई की है, बाकी बहनों ने पढ़ाई नहीं किया है। कन्नू अपनी बहनों से कुछ अलग है, वो कुछ और करना चाहती है। अगर उसको कुछ सहयोग मिल जाए तो कन्नू आगे भी पढ़ सकती है। यदि वो एक छोटी-मोटी दुकान खोल ले, तो उससे कन्नु व उसके परिवार की ज़िंदगी थोड़ी और आसान हो जाएगी। 

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ममता माली:

ममता माली भी अमरपुरा गाँव में ही रहती है, उसकी उम्र 26 साल है और उसके पति का नाम नारायण लाल माली है। ममता बताती है, “जब मैं 9 साल की थी, तभी मेरी शादी करके मुझे ससुराल भेज दिया था।  ससुराल में सास नहीं थी, बस पति और ससुर, दो ही लोग घर पर थे। मेरे खेलने की उम्र थी, फिर भी मैंने ससुराल में जाकर घर के सब काम सीखे और काम करने लगी। पति और ससुर के ऊपर कर्जा था, तो मैंने और मेरे पति ने मिलकर, सारा कर्जा उतारा और गिरवी रखी ज़मीन को छुड़वाया। आज मैंने एक बीघा ज़मीन लेकर उस पर खेती करके, सात-आठ बोरी गेहूँ अकेले उपजाया  है। मैं किसी भी तरह की कोई मज़दूरी नहीं छोड़ती। पुड़िया बनाने भी जाती हूँ। अभी मैं पूड़ी बनाने जाती हूँ और खेत मज़दूरी भी करती हूँ, साथ ही मैंने एक छोटी दुकान भी डाल रखी है साड़ियों की, तो साड़ी भी बेच लेती हूँ। इस तरह से मैं अपने घर-परिवार को चलाती हूँ और पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हूँ।” ममता कहती, “घर में चार लोग खाने वाले और एक कमाने वाला होगा तो कैसे ज़िंदगी चलेगी। इसलिए पति के साथ मिलकर घर को संभालती हूँ। मेरे तीन बच्चे हैं, दो लड़की और एक लड़का। मैंने तो पढ़ाई नहीं की, पर मैं अपने तीनों  बच्चों को स्कूल भेजती हूँ।”

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धापू बाई

धापू बाई, भीलों का खेड़ा गाँव की निवासी हैं। उनके पति का नाम स्वर्गीय प्यारे लाल था, धापू बाई की उम्र तकरीबन 58 साल है। धापू बाई को बेटा नहीं है, उन्हें सिर्फ तीन बेटियाँ हैं और तीनों बेटियों की शादी हो गयी है। उनकी बड़ी बेटी अपने पति को छोड़कर अब माँ के साथ ही रहती है, बाकी दो बेटियाँ ससुराल में हैं। उनमें से एक बेटी का बेटा अपनी नानी (धापू बाई) के साथ रहता है। धापू बाई मनरेगा में मज़दूरी करने जाती हैं और साथ ही वह दूसरों के खेतों में भी  मज़दूरी करती हैं। वह बताती हैं कि खेत में मज़दूरी करते हैं तो पैसा अच्छा मिल जाता है, वहीं मनरेगा में पैसा समय पर नहीं मिलता है और कम भी मिलता है। फिर भी वह मनरेगा के काम को पसंद करती हैं, क्योंकि इसमें नियमित काम उनको मिलता रहता है। वह अभी भी मनरेगा के काम में जा रही हैं और इस क्षेत्र में काफी समय से मनरेगा का पैसा नहीं मिला है और पैसे मिलने का इंतजार भी कर रही हैं। धापू बाई के पास  एक बीघा ज़मीन है, जिसमें वह लगभग 4 बोरी (4 क्विंटल) के करीब गेहूँ की उपज कर पाती हैं। इस गेहूँ को वह बेचते नहीं है और पूरा साल अपने खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जब कभी सब्जी की ज़रूरत पड़ती है तो धापू बाई गाँव में ही गेहूँ देकर उसके बदले में सब्ज़ी ले लेती हैं, जिससे उनका गुजारा चल जाता है। इसी तरह धापू बाई और उनके परिवार का जीवन-यापन चल रहा है। 

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संकरी बाई

भील समुदाय की संकरी बाई, भेरूखेड़ा गाँव की रहने वाली हैं, उनके पति का नाम बाबूलाल है। संकरी बाई के चार बच्चे हैं- दो लड़कियाँ और दो लड़के। उनका सबसे छोटा लड़का 1 साल का है। संकरी बाई की एक ननद और एक देवर भी साथ रहते हैं। हाल ही में, इसी महीने संकरी के ससुर जी का देहांत हो गया, तभी से देवर और ननद भी साथ रह रहे हैं। उनके ससुर टीबी की बीमारी से ग्रसित थे और उनका इलाज़ चल ही रहा था। टीबी की बीमारी ज़्यादा सीरियस होने के कारण उनकी मौत हो गई। उनके पास कुछ ज़मीन थी, जिसको संकरी के ससुर ने अपने जीते जी किसी गुर्जर के यहाँ गिरवी रख दिया था। अब उनके पास कमाने का कोई साधन भी नहीं है और वह ज़मीन भी गिरवी रखी पड़ी है। उन्होंने 1,20,000 में उस ज़मीन को गिरवी रखा था, पर उन पैसों से वह कुछ भी नहीं कर सके। संकरी बाई के ससुर ने सिर्फ दारू ही पिया उस गिरवी रखी हुयी ज़मीन के पैसे से। अब संकरी बाई और कर्जदार हो गयी है, 1,20,000 तो ज़मीन का कर्ज़ ही है, जिसको खर्च कर उन्होने अपने ससुर का मृत्यु भोज किया है। ससुर के बच्चे संकरी के पास ही रहते हैं। संकरी और उसका पति मज़दूरी करते हैं जिससे वह लोग अपनी ज़िंदगी का गुजारा चलाते हैं। संकरी और उसका परिवार अपनी आर्थिक स्थिति के चलते बहुत संघर्ष कर रहा है।

Author

  • सुमन जी, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर शक्ति संगठन और आधारशिला विद्यालय के साथ जुड़ी हुई हैं और कई सालों से आदिवासी बालिकाओं के शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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