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मैं ओरछा गई थी, सोचा आप सभी के साथ अपना अनुभव शेयर करूँ !

शैलेश:

हम कई अलग-अलग जगह घूमने जाते हैं, और हर जगह का अपना एक इतिहास होता है। हर नई जगह अपनी प्राचीन यादों की छवि ज़रूर बरकरार रखती है। हम उसको जानकर, समझ कर, देख कर, काफ़ी उत्साहित होते हैं। खास करके वे लोग जो इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं और जिन्हें प्राचीन चीजों से लगाव होता है। इसी तरह, उत्तर प्रदेश राज्य में, झांसी के पास बहुत खूबसूरत जगह है ओरछा। यह झांसी से 17 किलोमीटर की दूरी पर है। लगभग 40 मिनट का रास्ता तय करके वहाँ पहुँचना होता है और यह मध्य प्रदेश में आता है।

एक वर्कशॉप में भाग लेने हेतु, मेरा ओरछा जाना हुआ। ओरछा काफी शांत और खूबसूरत जगह है, जहाँ पर किले और मंदिर स्थापित हैं। किले का निर्माण वर्ष 1501 में राजा रुद्र प्रताप सिंह ने कराया था। इस किले के अन्दर भवन और मंदिर भी हैं। राज महल और राम मंदिर की स्थापना राजा मधुरकर सिंह ने की थी। जिसने यहाँ वर्ष 1554 से 1591 तक राज किया था। किले के मेन द्वार के सामने राजा राम मंदिर स्थित है। बातचीत करने पर निकल कर आया कि रानी इस द्वार से मंदिर जाया करती थी। इसके अलावा मुख्य द्वार पर तोपखाना भी स्थित है।

इस तरह की प्राचीन चीज़ों को देखकर इतिहास को जानने की उत्सुकता होती हैl मध्य प्रदेश के ओरछा में हमारी रुकने की जगह ताराग्राम सेंटर थी। ताराग्राम, रोज़गार (लाइवलीहुड) को लेकर नॉन प्रॉफिट संस्था है। इसका हेड ऑफिस दिल्ली में है। कोविड महामारी से पहले इस संस्था में लगभग ढाई सौ लोग कार्य करते थे। जहाँ पर वह कैरी बैग, टॉर्च, रेडियो, सीमेंट, गौशाला आदि के कार्य करते थे। कोविड के बाद जब बाज़ार में मंदी आई बहुत लोग कार्य को छोड़कर अलग-अलग जगह पर कार्य करने लगे।

अभी हाल में लगभग तारा ग्राम के अंदर 40 से 45 लोग काम करते हैं। जिनमें से 15 महिलाएं हैं। ताराग्राम के अंदर इस समय कॉटन के कपड़े से कागज बनाने का और उसके बाद उन कागज से कैरी बैग बनाने का कार्य चल रहा है। पहले कपड़ों को मार्केट से खरीदा जाता है और फिर उसकी मशीनों के द्वारा धुनाई की जाती है। फिर उसको रोलर में डालकर पानी से मिलाते हैं और फिर मशीन में डालकर उसका प्लेन कागज निकलते हैं। यह पूरा प्रोसेस होने के बाद वहाँ पर जो महिला टीम है वह मशीनों से कागज पर निशाने को बनाती है, और फिर उनको सलूशन द्वारा चस्पा करती हैं और हाथों से बनी डोरियों को बनाकर उसमें डालती हैं। जो हम मॉल, वगेरह में कैरी बैग का इस्तेमाल करते हैं उस तरह का कैरी बैग ताराग्राम केंद्र पर महिलाओं और उनकी पूरी टीम द्वारा बनाया जाता है।

टीम से जुड़ी कुसुम चाची जी बताती हैं कि वह लगभग पिछले 20 सालों से ताराग्राम सेंटर में कार्य कर रही हैं। रमेश भैया 1996 से टीम से जुड़े हुए हैं, जो मशीन पर काम करते हैं और पेपर बनाते हैं। ताराग्राम के अंदर डैम के मॉडल भी स्थित हैं। इसके अलावा यहाँ पर सीमेंट का भी कार्य हो रहा है। सीमेंट की ईंट और चादर बनाई जाती है, जिनको मार्केट तक पहुंचाया जाता है। कार्यस्थल के सभी साथी लगभग 12 से 15 किलोमीटर की दूरी से आते हैं और सुबह 10 से शाम 4:00 तक कार्य करते हैं।

महिला टीम से बातचीत के दौरान पता चला कि उन्हें 100 बैग के बंडल बनाने पर ₹200 मिलते हैं। कभी-कभी वह दिन में 100 बंडल ही बना पाती हैं और कभी-कभी उससे ज़्यादा बंडल भी तैयार कर लेती हैं।

मैं वर्कशॉप के दौरान अलग से इन सब चीजों की जानकारी, लोगों से बात करके इकट्ठा कर पायी। मुझे काफी अच्छा लगा वहाँ के लोगों से बात करके और वहाँ के बारे में जानकर। मुझे लगा, मैं अपने सभी साथियों के साथ भी यह बात साझा करूँ।
सामाजिक परिवर्तन शाला में आते-आते हर चीज़ के बारे में जानकारी इकट्ठा करने की और सवाल पूछने की आदत सी पड़ गई है। सोचा आप लोगों के साथ भी इसको शेयर कर दूँ।

फीचर्ड फोटो आभार – विकिपीडिया

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  • शैलेश, उत्तर प्रदेश से हैंl वर्तमान में शैलेश सरजू फाउंडेशन के साथ जुड़कर उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले में काम कर रही हैंl वह महिलाओं, किशोरियों और बच्चों के साथ शिक्षा, आजीविका और संविधान से जुड़ी गतिविधियों के अंतर्गत कार्य करती हैंl शैलेश को कविता और कहानी लिखना अच्छा लगता हैl

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