आदित्य दत्ता:
इस बात में कोई दो मत नहीं है कि प्राचीन भारत विज्ञान में काफी बढ़ा –चढ़ा था I शून्य की खोज से लेकर अंक प्रणाली की खोज यहीं हुई थी जो बाद में अरबों के माध्यम से पूरे विश्व में फैली I यहीं आर्यभट ने कोपरनिकस से हज़ार साल पहले बताया कि सूर्य नहीं, बल्कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है I वराहमिहिर ने बताया कि सूर्य एक ग्रह नहीं, बल्कि एक तारा है I चरक ने कई रोगों के उपचार के लिए उनके कारण और निदान को ‘’चरकसंहिता’’ में लिखा, तो अमरसिंह ने पेड़-पौधे को वर्गीकृत करने का प्रयास किया I भारत के व्यापारी दूर-दूर तक व्यापार के लिए जाते थे और भारतीयों को विदेशियों से कुछ सीखने में कोई परहेज नहीं था I
पर सातवीं-आठवीं शताब्दी के आते-आते भारतीयों में न सिर्फ वैज्ञानिक चेतना का अभाव होने लगा, बल्कि एक किस्म के श्रेष्ठता बोध से ग्रसित हो गए I ‘’बाबा वाक्यं प्रमाणं’’ की प्रवृति बढ़ी I बजाय प्रयोग और निरीक्षण कर वैज्ञानिक खोज करने के छूआ-छूत,कर्मफल, किस पांत में खाएं, तिलक कहाँ लगाएं, आत्मा उद्धार, गोमूत्र चिकित्सा, गोबर में कितने गुण जैसे निरर्थक चर्चा और वाद-विवाद में लग गए I विज्ञान के बजाय ज्योतिष, हस्त शास्त्र, जादू-टोना, भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र इत्यादि छद्म विज्ञानों को बढ़ावा मिलने लगा I विदेश यात्रा करने वालों को धर्मच्युत कर दिया जाने लगा I विदेशियों या अछूतों के हाथ से छुआ पानी पीने पर भी लोगों को जाति से बाहर किया जाने लगा I इस तरह वे अपने में ही सिमित कूपमंडूक और जड़ समाज बन गए I इसके चलते कई तरह के सामाजिक बुराइयों ने जन्म लिया, पर वे उसे अजीब से तर्क के आधार पर धर्म संगत मानने लग गए I
इसका फल ये हुआ कि 17वीं शताब्दी से जहाँ यूरोप में पुनर्जागरण काल के बाद वैज्ञानिक चेतना विकसित हो रही थी, नए-नए प्रयोग और अविष्कार किये जा रहे थे, हमारे देश की चेतना कूपमंडूकता और जड़ता में डूबी रही I वे अपने प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को भूल चुके थे I पर पिछले २०० सालों में कई समाज सुधारकों के प्रयास से सती प्रथा, बाल-विवाह, छुआ-छूत इत्यादि कुप्रथाओं को बहुत हद तक दूर किया गया.जाति-प्रथा पूरी तरह से तो नहीं हटी, पर काफी हद तक इसके चलते होने वाले अत्याचार कम हुए I देश में एक बार फिर से वैज्ञानिक और तार्किक सोच को प्रमुखता मिलने लगी I बीसवीं सदी की शुरुआत से भारतीय वैज्ञानिकों की खोजों से एक बार फिर से विश्व के वैज्ञानिक समुदाय का ध्यान भारत की ओर आने लगा I इसमें तीन प्रमुख वैज्ञानिकों नाम उल्लेखनीय है I ये तीन वैज्ञानिक थे – रामानुजम, जिन्होंने सैद्धांतिक गणित में अनंत का सिद्धांत दिया; जगदीश चन्द्र बोस, जिन्होंने क्रेस्कोग्राफ का आविष्कार किया और रेडियो तरंगों पर भी काफी मौलिक खोज की और सी. वी. रमन , जिन्होंने ”रमन प्रभाव” ( Raman Effect) की खोज की थी I
आज यानी 28 फरवरी के दिन ही 1928 में रमन ने ”रमन प्रभाव” की खोज की थी. उनके इसी खोज के लिए उन्हें 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था I नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे दूसरे भारतीय और पहले भारतीय वैज्ञानिक थे I देश में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने के ख्याल से 1986 में नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने 28 फरवरी को ”राष्ट्रीय विज्ञान दिवस” के रूप में मनाने के लिए सरकार के पास प्रस्ताव भेजा जिस पर उस समय की सरकार ने तुरंत अपनी सहमति दे दी I इस तरह 1987 से प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को ”राष्ट्रीय विज्ञान दिवस” के रूप में मनाया जाता है I
पर क्या है ये ”रमन प्रभाव ( Raman Effect) जिसे इतना महत्वपूर्ण माना गया कि इसकी खोज पर नोबेल पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया गया ?
कहा जाता है कि 1921 में जब रमन लन्दन से भारत समुद्री रास्ते से लौट रहे थे तो उन्हें भूमध्य सागर का जल नीला देखकर सहसा ख्याल आया कि समुद्र का जल नीला क्यों होता है? तब तक ये रेले का ये कथन कि चूँकि आकाश का रंग नीला होता है तो समुद्र के जल पर उसके पड़ने वाले प्रतिबिम्ब की वजह से समुद्र के जल का रंग भी नीला होता है I चूँकि रेले ने प्रकाश की किरणों के प्रकीर्णन के माध्यम से आकाश के रंग नीला होने की सही व्याख्या की थी, इसलिए समुद्री जल के नीले होने के समबन्ध में उनके विश्लेष्ण को अब तक सही माना जाता था I पर रमन इस उत्तर से संतुष्ट नहीं थे I वे उसके बाद से ही लगातार इस पर अपने संस्थान ”इंडियन ऐसोसियसन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस’, जहाँ वे प्रोफेसर थे, की प्रयोगशाला में शोध करते रहे और आखिरकार 28 फरवरी 1928 को उन्होंने अपने शोध को अंतिम रूप दे दिया I उसी साल 16 मार्च को उन्होंने अपना शोध पत्र प्रकाशित कराया जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया I संक्षेप में ”रमन प्रभाव” एक क्वांटम परिघटना है जिसमें अणुओं द्वारा फोटॉन कणों का लचीला प्रकीर्णन होता है I सरल शब्दों में यह प्रकाश की तरंगदैर्ध्य में परिवर्तन है जो प्रकाश की किरणों के अणुओं द्वारा विक्षेपित होने के कारण होता है I जब प्रकाश की एक किरण किसी रासायनिक यौगिक के धूल रहित एवं पारदर्शी नमूने से होकर गुज़रती है तो प्रकाश का एक छोटा हिस्सा आपतित किरण की दिशा से भिन्न अन्य दिशाओं में उभरता है I जब प्रकाश की किरणें समुद्री जल में प्रवेश करती है तो जहाँ लम्बें तरन दैधर्य वाली किरणें जल द्वारा अवशोषित हो जाती है सबसे छोटी तरंग दैधर्य वाली नीली किरणों का प्रकीर्णन हो जाता है जिससे समुद्र का जल नीला दिखाई देता है I रमन प्रभाव रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का आधार निर्मित करता है जिसका उपयोग रसायन विज्ञानियों और भौतिकविदों द्वारा सामग्री के बारे में जानकारी प्राप्त करने हेतु किया जाता है I
अविज्ञानिक विचारों को बढ़ावा मिल रहा है वर्तमान कल में
1928 के बाद से, खासकर आजादी के बाद से देश ने विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में काफी प्रगति की है और विश्व में भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को काफी सम्मान से देखा जाता है I आज हम चाँद पर अपना लैंडर उतार चुके हैं I मंगल की कक्षा में हम अपना कृत्रिम उपग्रह भेज चुके है I आणविक विज्ञान सहित विज्ञान के अनेक क्षेत्रों में हम विश्व के समकक्ष पहुँच चुके हैं I पर साथ ही देश में हाल के वर्षों में वैज्ञानिक चेतना का ह्रास भी हुआ है जो कि चिंताजनक है I कथित हिन्दू श्रेष्ठता के नाम पर अवैज्ञानिक विचारों को बढ़ावा दिया जा रहा है I गाय के सांस छोड़ने से ऑक्सीजन का निकलना, मोर के आंसूं से मोरनी का गर्भवती होना, डार्विन के सिद्धांत को झूठा बताना, गणेश जी के सर को प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण बताया जाना जैसे अविज्ञानिक विचारों को बढ़ावा सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के द्वारा किया जा रहा है I ज्योतिष, तंत्र-मन्त्र, वास्तु शास्त्र जैसे छद्म विज्ञानों को बढ़ावा मिल रहा है I कई जगहों पर तो इसे पाठ्य क्रम में भी शामिल कर लिया गया है और इसमें कथित शोध को बढ़ावा दिया जा रहा है I इसके साथ दूसरी ओर ये प्रचार किया जा रहा है कि सभी आधुनिक वैज्ञानिक खोज वेदों में पहले से मौजूद हैं I बाबाओं, तांत्रिकों, मांत्रिकों, ज्योतिषों इत्यादि का प्रभाव समाज में एक बार फिर से खूब बढ़ने लगा है I ऐसे में ”राष्ट्रीय विज्ञान दिवस” का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है I आइये हम आज के दिन संकल्प लें कि हम समाज में वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देंगे और छद्म विज्ञानों और बाबाओं, नजूमियों, तांत्रिकों, ज्योतिषों इत्यादि द्वारा फैलाये जा रहे अंधविश्वासों के प्रभाव में नहीं आयेंगें I

