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बिहार के गया ज़िले से सामाजिक परिवर्तन शाला के प्रतिभागी ब्रजेश का परिचय

ब्रजेश कुमार निराला:

मेरा जन्म 1 जनवरी 2005 को बिहार के गया ज़िले के गम्हरिया गाँव में हुआ था। मेरे पिता का नाम मिथिलेश कुमार निराला और माँ का नाम मीना कुमारी भारती है। मेरी दादी बताती थी कि मैं बचपन में बहुत शरारती था, जब उनसे अपने बचपन की कहानियाँ सुनता था तो बहुत हँसी आती थी, मेरी दादी का नाम मुलजा देवी है। दादी कहती, “तुम जब छोटे थे तो लोगों को बहुत परेशान करते थे।” बचपन की बात करते हुए उन्होंने बताया कि मैं जब पैदा हुआ तो डॉक्टर ने कहा कि लड़के की साँसे नहीं चल रही हैं, यह सुनकर सब लोग डर गए और मुझे सरकारी अस्पताल से एक प्राइवेट अस्पताल में लेकर गए लेकिन वहाँ से भी मुझे एक अन्य अस्पताल में रेफर कर दिया गया। दादी ने बताया कि उस वक़्त मेरे दादा केशो यादव ने कहा, “मिट्टी को लेकर क्यूँ घूम रहे हो? ये मर गया है, इसे दफना आओ।” लेकिन मेरी दादी और परिवार के अन्य लोगों ने मुझे बचाने का पूरा प्रयास किया और मुझे पटना के एक अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ से मैं एकदम ठीक होकर लौटा।

जब मैंने पढ़ाई शुरू की तो उस समय मेरी उम्र पाँच या छह साल की थी। मैंने गम्हरिया के माध्यमिक स्कूल में पाँचवी तक और फिर आगे आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई गाँव से 6 किलोमीटर दूर डोभी के ज्ञान सरोवर नाम के एक प्राइवेट स्कूल में की। हमारे घर की आर्थिक स्थिती ठीक नहीं होने के कारण मुझे आठवीं के बाद दसवीं तक की पढ़ाई डोभी के सरकारी स्कूल से करनी पड़ी। 2020 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद 2021 में मैंने इंटर में दाखिला लिया।

मुझे बचपन से ही एक आर्मी अफसर बनने का शौक था, लेकिन शरीर की अंदरूनी कमी के कारण मेरा यह सपना पूरा नहीं हो पाया। फिर मैंने आईटीआई करने का सोचा लेकिन पैसों की कमी के कारण यह भी ना हो पाया। फिर मैंने डॉक्टर बनने का सोचा जिसमें मेरे पापा भी मेरे साथ थे। फिर साल 2020 में मेरी माँ की तबीयत बहुत खराब हो गयी, हमने जब सरकारी अस्पताल में उन्हें दिखाया तो उन्होंने जवाब दे दिया और कहा कि इनका ऑपरेशन करवाना होगा। हमारे पास उस वक़्त इतना पैसा नहीं था कि माँ का ऑपरेशन करवा पाते। जब पैसे की व्यवस्था हुई तो उन्हें एक प्राइवेट अस्पताल में लेकर गए, जहाँ पर उनके मांस का टुकड़ा लेकर उसे जाँच के लिए भेज दिया और हमें कहा कि जाँच की रिपोर्ट आ जाने के बाद ही आगे इलाज होगा। 2 महीने बाद जब रिपोर्ट आई तो उन्हें कैंसर होने का पता चला। वहाँ के डॉक्टर ने हमें पटना के महावीर कैंसर संस्थान से आगे इलाज करवाने का सुझाव दिया।

कैंसर की बीमारी का पता चलने के बाद मेरा पूरा परिवार विचलित था, हमारी तो मानो सोचने की शक्ति ही खतम हो गई थी, ना ही  हमारे पास इतने पैसे थे कि पटना में रहकर माँ का इलाज करवा सकें। हम सब लोग रो रहे थे, क्यूंकी डॉक्टर ने कहा था कि दस दिनों के अंदर इलाज शुरू नहीं हुआ तो ये बच नहीं पाएँगी। ऐसे समय में मेरे पिता ने सबको हिम्मत बनाए रखने को कहा, वो एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और गया में कार्यरत स्थानीय संगठन मजदूर किसान समिति के कार्यकर्ता हैं। अपने काम के कारण वह बहुत से लोगों को जानते हैं, ऐसे ही एक व्यक्ति हैं अशोक प्रियदर्शी। पटना के रहने वाले अशोक जी जन संघर्ष वाहिनी से जुड़े हैं, उन्होंने ही हमारे परिवार के लिए पटना में दलित विकास समिति के दफ्तर में रुकने का इंतजाम करवाया। इसके बाद हमने माँ को महावीर क़ैसर संस्थान में भर्ती करवाया। अगले एक साल तक वहाँ से उनका इलाज चलता रहा लेकिन फिर उन्होंने भी जवाब दे दिया और बताया कि माँ के कैंसर की स्टेज काफी बढ़ गयी है और अब उनका इलाज करवाने से बस पैसे ही बर्बाद होंगे, फिर उन्होंने माँ को घर ले जाने को कहा। साल 2022 में माँ वापस घर आ गयी, उनकी दवाएँ चल रही थी लेकिन उनसे कुछ फाइदा नहीं हुआ और साल 2023 में मेरी माँ का देहांत हो गया। 

इतना समय और पैसा लगाने के बाद भी मेरी माँ नहीं बच पाई, इससे हम सभी अंदर से बहुत टूट गए। इसका असर मेरी पढ़ाई पर भी हुआ और मेरी पढ़ाई भी छूट गई। फिर मैं भी अपने समुदाय के मुद्दों पर काम करने लगा। मैं गाँव के कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता हूँ और एक संस्था में भी काम करता हूँ। इससे मेरे खर्चे लायक पैसों का इंतजाम हो जाता है। इन सबके बाद भी मेरे अंदर के सपने बरकरार हैं, मैं अब उन्हें अपने दम पर पूरा करना चाहता हूँ। इसके लिए मैं पूरी मेहनत कर रहा हूँ और साथ ही अपने समुदाय के मुद्दों पर भी काम कर रहा हूँ।

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  • ब्रजेश, बिहार के गया ज़िले से हैं। वह स्थानीय संगठन मजदूर किसान समिति के साथ स्थानीय मुद्दों पर काम करते हैं। ब्रजेश, सामाजिक परिवर्तन शाल से भी जुड़े हैं। वह गाँव के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते हैं।

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