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समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड)

हरित परसेंडिया:

लेख में व्यक्त किए विचार युवा साथी के स्वयं के हैं

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब यह है कि: भारत में रहने वाला हर एक व्यक्ति जो किसी भी धर्म का या जाति का हो, या किसी भी लिंग का हो, यूसीसी (UCC) लागू होने के बाद इन सबके लिए समान कानून होगा। कानून लागू होने पर शादी, तलाक, बच्चा, गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे सभी विषयों में एक जैसे नियम लागू होंगे। नागरिकों के बीच सामाजिक और धार्मिक विभिन्नताओं की वजह से उत्पन्न होने वाले मुद्दों की दिशा में सोचना मुश्किल हो सकता है। इन्हीं विवादों और असमंजस में एक समाधान प्राप्त करने के लिए सामान नागरिक संहिता या यूनिफार्म सिविल कोड (UCC) की आवश्यकता उभर रही है।

UCC लागू होने का जिक्र संविधान सभा में भी हुआ था और तब से कईं बार यह चर्चा में आया है। कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा सामने आया है। इस क़ानून से सभी प्रभावित होंगे क्योंकि सभी धर्मों में परिवार और संपत्ति के बंटवारे से जुड़े कानून अलग-अलग हैं और यूसीसी द्वारा इनको एक समान बनाने की मंशा है।

कुछ अहम मुद्दे जो विचार करने योग्य है:

सांस्कृतिक और धार्मिक भिन्नता: भारत एक विविधता और विभिन्नता वाला देश है, जिसमें विभिन्न समुदायों के अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के समूह रहेते हैं। UCC के तहत एक सामान कानून लागू करने से इसमें भिन्नताओं की सम्पत्ति को खतरा हो सकता है और लोगों का धार्मिक अधिकार प्रशासनिक इच्छाशक्ति के खिलाफ हो सकता है।

संविधानिक स्वतंत्रता: भारतीय संविधान ने नागरिकों को धर्म, भाषा, और संस्कृति के प्रति स्वतंत्रता प्रदान की है। इसका मतलब है कि एक व्यक्ति के पास उसके धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकार का पूरा अधिकार होना चाहिए, और UCC के माध्यम से इसमें कटौती हो सकती है।

समाजिक असमानता: विभिन्न समुदायों के लोगों के पास विभिन्न सामाजिक और आर्थिक स्थितियाँ होती हैं। इस प्रकार के कानून को बिना समझे लागू करने से समाजिक असमानता और दरिद्रता में वृद्धि हो सकती है।

सामाजिक विवाद: UCC को लागू करने के प्रस्ताव पर विवाद और संघर्ष हो सकता है, जो धार्मिक समुदायों के बीच आपसी असहमति की ओर बढ़ सकता है।

महिला सशक्तिकरण: UCC के माध्यम से नारियों को विवाह और तलाक के प्रति भी समान अधिकार और प्रक्रियाएँ मिलने का प्रस्ताव है, जिससे वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर नियंत्रण रख सकेंगी। अब देखना ये है की सरकार की मंशा महिला सशक्तिकरण की है या नहीं। क्यूंकि महिलाओं के लिए कई क़ानून पहले से न्याय प्रणाली का हिस्सा रहे हैं पर इनका क्रियान्वयन सही रूप से नहीं हो पता है, और सामाजिक रीति-रिवाज हमेशा क़ानून से ऊपर रखे जाते है, इसका उदाहरण दहेज प्रथा है। 

आगे का रास्ता :

इतने जटिल विषय पे ज़रूरी है समझ बढ़ाने की। सरकार को प्रस्ताव लाने से पहले सभी धर्म, जाति, समुदाय के लोगों से विचार-विमर्श करना होगा। UCC का ज़िक्र संविधान में ज़रूर हुआ है, पर इसको लागू करने का ये सही समय है या नहीं – ये चर्चा का विषय होना चाहिए। सरकार का प्रस्ताव आने पर इसकी सही रूप से विवेचना करना सभी नागरिकों का कर्तव्य है। यह सुनिश्चित करना होगा कि इसके प्रस्ताव को समाज की विविधता, संविधानिकता और सामाजिक संरचना के संदर्भ में विचार करके आगे बढ़ाया जाए।

फीचर्ड फोटो आभार: न्यूज़ट्रैक लाइव

Author

  • हरित, मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले से हैं। वर्तमान में हरित आईटीएम विश्वविद्यालय में विधि के छात्र हैं और वह जैनिथ सोसाइटी के साथ जुड़े हुए हैं।

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