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इस धरा के घने जंगल

नरेंद्र तिवारी:

भवानी प्रसाद मिश्र दादा की कविता “सतपुढा के घने जंगल याद करते हुए”

इस धरा के घने जंगल
जाने कैसे बने जंगल
खूब सुंदर खूब गहरे
हरहराते हरे जंगल
ज़िन्दगी की मौज वाले
फूल-खुश्बू नींद वाले
साँस देते और लेते
इस तरह थे खड़े जंगल।

जुगनुओं की चमक वाले
चितवनों की गमक वाले
तितलियों से खेलते थे
बारिशों को झेलते थे
नदियाँ इनसे होके गुजरें
पर्वतों को रुक के सोचें
मोरनी का नाच देखें
ऐसे थे रसभरे जंगल।

धीरे-धीरे लूट आई
लोभ-लालच साथ लाई
हत्यारों को बुलाया
सरकारी फरमान आया
खोद करके काट करके
चीर करके फाड़ करके
इस तरह से लुटे जंगल
इस धरा के घने जंगल।

एक दिन पहुँचे व्यापारी
जंगलों में सेंध मारी
ले कुल्हाड़ी आरा-आरी
जेसीबी तक ला उतारी
खून खच्चर आम करके
हत्या सरेआम करके
इस तरह से मरे जंगल
इस धरा के घने जंगल।

बरगदों को किया आधा
पीपलों ने मौन साधा
आम बौराया पड़ा था
पलाश एकदम चुप खड़ा था
ये बेaचारे क्या ही करते
देखते थे सबको मरते
उखड़े-उखड़े डरे जंगल
इस धरा के घने जंगल।

हाथियों को काट डाला
शेरनी को मार डाला
बारासिंघा भून डाला
भागता था हिरन साला
लगा जाके एक भाला
पेट का बनकर निवाला
हड्डियों से पटे जंगल
इस धरा के घने जंगल।

तोते उड़ के छुप गए थे
बाज़ गगन में लुक गए थे
गिद्ध सबकुछ देखता था
बाकी सारे चुप hoa गए थे
मोर पागल भग न पाया
उसको सबने भून खाया
फड़फड़ाते पंख वाले
इस धरा के घने जंगल।

घास चुप है, कास चुप है
गुलमोहर का राग चुप है
हवा-पानी-आग चुप है
अमलतास पीला पड़ा था
दे रहा था वो गवाही
अब बचा न नैन पानी
जल रहे हैं हरे जंगल
इस धरा के घने जंगल।

भालू बेसहारा बेचारा
फिरता है अब मारा-मारा
रात में गीदड़ हैं रोते
भूख से बेहाल होकर
तीतरों को काट खाया
सबने चटखारा लगाया
रोते-रोते फट रहे हैं
इस धरा के घने जंगल।

चीड़ से शोभा है घर की
सागवान की मेज-खिड़की
शीशमों के मोह वाले
साखू के सौ साल किस्से
महुये चौखट बन खड़े हैं
सब खटखटा बन रहे हैं
इसलिए सब कट रहे हैं
इस धरा के घने जंगल।

पानियों को सोख लेते
जब भी बढ़के वो था आता
महामारी कौन रोके!
अब कहाँ जंगल से नाता
आपदा को कौन रोके!
बाढ़ को अब कौन थामे!
जब नहीं रह गए जंगल
इस धरा के घने जंगल।

राम वन पथ को मिटाकर
पर्णकुटियों को हटाकर
सालवन बस नाम है अब
धन कमाना धाम है अब
रेल की पटरी बिछाकर
हाइवे से बदल डाले
चीखते विकास वाले
इस धरा के घने जंगल।

विपरीत बुद्धि विनाश काले
नर नहीं पिशाच वाले
धुंआ धक्कड़ राख वाले
बंजर धरती साथ लेकर
ज़हर हवा में सांस लेकर
कब तलक हम तुम रहेंगे!
वक्त रहते तो बचा लो
इस धरा के घने जंगल।

Author

  • नरेन्द्र, उत्तर प्रदेश के गोंडा ज़िले से हैं। वे महाविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं और स्वंत्र रूप से अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं के लिए कविता, कहानी, कॉलम लिखते हैं।

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