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सहोदय संस्था की पहल याद दिला रही हैं पुरखों की विरासत

अनिल, रेखा और सहोदय के बच्चे:

वर्तमान में सहोदय में 22 बच्चे, और पांच व्यस्क रह रहे हैं।

कल (07 जुलाई 2022) हमारा एक और सपना पुरा हुआ। कल डंगरा गाँव के साप्ताहिक सब्ज़ी बाज़ार में हम अपने यहाँ के और कुछ दक्षिण भारत और महाराष्ट्र की यात्रा के दौरान एकत्रित किए देशी सब्जी, फूल और जंगली पेड़ के बीज बेचने ले गए। लोगों ने खुब मजे और आश्चर्य से देखा। कईं लोग सवाल पूछे, जाने और थोड़े बीज खरीदे भी। बेचना मकसद नहीं था। अपनी विरासत की खेती, देशी और जंगली पेड़-पौधों के विविध बीज के अनुभव और इसके महत्व पर बातचीत करना था। कुछ बच्चे भी आए। हमने कहा कि वो जो बीज पहचानेंगे वो उनको दे देंगे। वे बोले कोई भी नहीं पहचानते। यहाँ तक की गाँव के 50 वर्ष के उपर के कई लोग कोदो मरूआ भी भूल गए। लेकिन उम्मीद जगी। दो महिलाओं ने नहीं पता होने के बावजूद कोदो और कांगनी (foxtail millet) के बीज लिए। अन्य लोग अलग-अलग तरह के लौकी के बीज लिए। हमारे पास छ: तरह के बीज देखकर खुश हुए। बहुत ‘कमाई’ हुई। लोगो की भागीदारी, और बीज की जानकारी पर लोगों की रूचि से उत्साह और उम्मीद बढी। अगला अब शनिवार को बाराचट्टी के सब्जी बाजार में बैठेंगे जा कर।


सहोदय के बच्चे 14 जुलाई 2022 को अपने खेत का जैविक मडुआ या रागी के आटा की बनी पाँच खाद्य सामग्री के साथ देशी बीज को हाट में बेचने लेकर गए। मडुआ के आटा से नमकीन राबड़ी, निमकी, ठेकुआ, लड्डू, और हलवा बनाया गया। हमारे इस क्षेत्र में लोग मडुआ लगभग भूल गए है। मडुआ केवल जितिया पर्व में याद किया जाता है। लोग इसका केवल रोटी बनाना जानते हैं। जबकि इसका हलवा भी ज़बरदस्त बनता है।

सब खाने की सामग्री रेखा, हिमांशी, और बच्चों ने घर पर बनाया। बाज़ार में हम लोगों ने बहुत लोगों का ध्यान आकर्षित किया और लोगों ने सब सामग्री गौर से देखी। कुछ लोग राबड़ी चखे।

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