शैलेन्द्र राजपूत:
उत्तर प्रदेश के महोबा ज़िले के कबरई क्षेत्र में पत्थर खनन से हज़ारों की मौत पर सरकारों ने चुप्पी साध रखी है। मैं इसी इलाके के एक गाँव मकरबई का रहने वाला हूं। मेरे गाँव में बहुत सारे पहाड़ थे पर ज़्यादातर तोड़ दिए गए खनन द्वारा। मेरे गाँव में एक सड़क भी है जो कि 20 साल से टूटी पड़ी हुई है, इसका कारण है कि मकरबई खनन का मुख्य क्षेत्र है।
कबरई और इससे जुड़े हुए क्षेत्र कानूनी और गैर कानूनी खनन का गढ़ हैं, यहाँ जब पत्थर की क्रेशर चलती है तो दिखना बंद हो जाता है। यहाँ के सड़कों की जर्जर दशा निंदनीय है, पेड़ों पर धूल की परतें चढ़ी दिखती हैं और चारों तरफ धूल ही धूल नज़र आती है, जहाँ पत्थर और गिट्टी से लदे हज़ारों ट्रक प्रतिदिन गुजरते हैं। यहाँ लोगों की जिंदगी सुबह से घरों में जमी बर्तनों में जमी धूल को साफ करते हुए और दिन भर धूल का सामना करते हुए ही खत्म हो जाती है।
इस खनन के गढ़ में 3 तरह के लोग रहते हैं। मुख्य रूप से एक तो मजदूर वर्ग के लोग हैं, जो सुबह 8:00 बजे से लेकर शाम 5:00 बजे तक पत्थर की ढुलाई और ट्रक भरने का काम करते हैं। इनका पूरा दिन इसी धूल में रहकर निकल जाता है और दिहाड़ी में मिलते हैं केवल 300 रुपए। इन श्रमिकों का जीवन भी ज़्यादा लंबा नहीं होता, क्योंकि या तो टीबी या फिर किडनी के स्टोन से अक्सर कम उम्र में इनकी मौत हो जाती है। दूसरी तरह के लोग क्रेशर मालिक है, जिनके नाम पर ये पहाड़ आवंटित होते हैं। इन लोगों का इस क्षेत्र में पूरा प्रभुत्व चलता है, इनको सिर्फ खनन और उससे आने वाले मुनाफे से मतलब होता है। इसी खनन की कमाई से यह लोग राजनीति में आते हैं और अपना प्रभुत्व बनाते हैं। और फिर तीसरी वर्ग में आते हैं वह लोग जिन्हें सबसे ज़्यादा परेशानी और खनन द्वारा मौत मुफ्त में दे दी जाती है। यह वर्ग खनन से संबंध नहीं रखता है। यह बीच वाला वर्ग है जो इस क्षेत्र में किसानी करता है। ना तो खनन विभाग द्वारा इनके नुकसान की भरपाई की जाती है और ना ही किसी प्रकार की सुविधाएं ही दी जाती है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस क्षेत्र में टीवी और सिलिकोसिस जैसी बीमारियों का बहुत बड़ा खतरा है।
क्षेत्र में उस व्यक्ति का जो ना ही क्रेशर और पहाड़ों में दिहाड़ी करता है और ना ही खनन से संबंध रखता है, उसका यह सपना होता है कि कब वह इतना सक्षम हो जाए कि इस धूल से बाहर निकले और किसी दूसरी जगह प्रवास कर पाए। सरकारी अस्पताल के डॉक्टर बताते हैं कि यहाँ के लोगों में कफ या खाँसी की समस्या हमेशा बनी रहती है, जिसे लोग नजरअंदाज़ करते हैं और आगे चलकर ये टीबी बन जाती है और उनको बचाना ज़्यादा मुश्किल हो जाता है। यहाँ जब पत्थर पिसता है तो उससे निकलने वाली धूल वातावरण और लोगों की सेहत पर बहुत बुरा प्रभाव डालती है और सरकार इसे लगातार नज़रअंदाज कर रही है।
यूँ तो संविधान ने हमें जीने का अधिकार दिया है, लेकिन यहाँ जाने से लगता है वह अधिकार हमारे पास है ही नहीं, क्योंकि जीने के लिए तो स्वच्छ हवा चाहिए जो आपको यहाँ कहीं भी महसूस नहीं होगी।
2002 यूपी पोल्यूशन कंट्रोल बोर्ड का सर्वे बताता है कि वायु प्रदूषण की उचित लिमिट 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है लेकिन यहाँ प्रदूषण का स्तर 1800 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है। इतने अधिक प्रदूषण के कारण यहाँ के लोगों का जीवन गंभीर संकट में है। सन 2002 के बाद से यहाँ क्रेशर लगातार बढ़ते ही चले गए और पहाड़ टूटते गए, मुझे नहीं लगता कि लोगों का जीवन यहाँ पर संभव है लेकिन लोग इस आस में जी रहे हैं कि कभी तो वह सुबह आएगी जब लोग शुद्ध हवा में सांस ले सकेंगे।
मुख्यमंत्री योगी जी की सरकार ने क्रेशर मंडी पर काफी कड़े प्रतिबंध लगाए हैं पर फिर भी कुछ क्रेशर तो चल ही रहे हैं। क्षेत्र की सभी सड़कें बुरी तरह से जर्जर और ध्वस्त पड़ी है पर प्रशासन की नज़र कभी भी इन पर नहीं जाती है। यहाँ चुनाव में भी आपको हर तरह के के प्रत्याशी मिलेंगे पर ऐसा कोई भी प्रत्याशी नहीं होगा जो पर्यावरण, रोड और बहुमुखी विकास पर काम करता हो। यहाँ के नेताओं का काम सिर्फ बड़ी-बड़ी बातों और बड़े-बड़े पोस्टरों तक ही सीमित मिलेगा।
कबरई, महोबा और बुंदेलखंड में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अवैध उत्खनन पर चुप्पी की एक कीमत चुकानी होती है, चाहे वह आम लोग हों, चाहे वह प्रशासनिक अधिकारी हो या फिर पत्रकार। बुंदेलखंड में चंद लोग यहाँ के पहाड़ों को खा गए, किसानों की ज़मीनों को बंजर बना डाला और उन्हें एक रुपया तक भी नहीं दिया गया। कारण कानून की जानकारी ना होना और प्रशासनिक भ्रष्टाचार। यहाँ प्रशासन के हर स्तर पर लोगों को मौन रहने की कीमत अदा की जाती है। अमीर व्यक्ति और अमीर होते चले गए और किसान गरीब होते गए। जिन गाँवों के संसाधनों का दोहन हुआ, उन गाँव वालों को सिवाय बीमारियों और हताशाओं के कुछ नहीं मिला। अगर किसी ने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई तो उसकी मौत के कारण का भी पता नहीं चला। बांदा के पत्रकार आशीष शर्मा का किस्सा शायद कुछ लोगों को याद हो।
क्रेशर माफिया के खिलाफ वर्तमान भाजपा सरकार का कार्य सराहनीय रहा है क्योंकि उसने दिसंबर 2017 में उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राईम एक्ट पारित किया, जिसका मुख्य उद्देश्य माफियाओं की कमर तोड़ना था। इस एक्ट के आने के 1 या 2 साल तक पहाड़ वा क्रेशर मंडी बंद रही पर अब वह फिर से पनपने लगी है और वह भी बहुत ही तेज़ी के साथ। इसे जब कोई रोकने की कोशिश कर भी रहा है जैसे कि प्रशासन, पुलिस, नेता, मीडिया या फिर शिक्षित युवाओं का ग्रुप (सिंघनपुर बघारी) तो उसे उसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है। पहले जो सिस्टम मौन रहने का चल रहा था, वह फिर से वापसी कर चुका है। अब फिर वही “खाओ और चुप रहो” वाला इकोसिस्टम वापस से मज़बूत हो रहा है। अगर यह इकोसिस्टम फिर खड़ा हो जाता है तो किसान की ज़मीन बंजर हो जाएंगी, यहाँ आम आदमी का रहना मुश्किल हो जाएगा और मज़दूरों को प्रदूषण संबंधित कई बीमारियाँ होंगी। पहाड़ या क्रेशर चलाने वाले लोग लखनऊ या किसी और बड़े शहर में जमीन या कोठियां डालेंगे और हम सब मूकदर्शक बनकर तमाशा देखेंगे और अंत में यह धूल हमें मार डालेगी।
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