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लाइब्रेरी से युवा क्लब का सफर 

उर्मिला: 

जनता सूचना केंद्र की लाइब्रेरी हम ‘लाइब्रेरी से दोस्ती’ कोर्स से पहले चलाते थे। यह चार गाँवों, घूघरा, मालमाथा, बलवाड़ा और धामोद, में चल रही थी। साल भर तो लाइब्रेरी बहुत अच्छी चली। एक गाँव के बच्चों ने 14 अप्रैल, डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के कार्यक्रम में नाटक प्रस्तुत किया गया था। वहीं, दूसरे गाँव के बच्चों ने 3 जनवरी, सावित्रीबाई फुले की जयंती के कार्यक्रम में नाटक और डांस प्रस्तुत किया था।

फिर धीरे-धीरे शादियों का माहौल शुरू हुआ, तो बच्चों की संख्या कम होने लगी। कोई शादी में चला जाता, तो कोई मेहमानों के साथ चला जाता। बाद में फैसिलिटेटरों और हम सबने कोशिश की कि बच्चे वापस आएँ, लेकिन बचपन में बच्चे अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। मर्जी हो तो आएँगे, नहीं तो नहीं आएँगे। फिर धीरे-धीरे फैसिलिटेटरों ने भी कोशिश करना छोड़ दिया और लाइब्रेरी बंद हो गई। इसमें से एक फैसिलिटेटर लड़की की शादी हो गई और एक फैसिलिटेटर लड़की बाहर पढ़ने चली गई। इस तरह धीरे-धीरे लाइब्रेरी का काम बंद हो गया।  

इसमें हमारी भी गलतियाँ रही होंगी। शायद हम बच्चों की पसंद के हिसाब से, उन्हें मज़ा आए और वे रुचि के साथ जुड़ें, ऐसी गतिविधियाँ अच्छे से नहीं कर पाए। पहले हमारे पास ज़्यादा कुछ गेम नहीं थे। उस समय हम हिंदी की किताबों के साथ अलग-अलग गतिविधियाँ करवाते थे और कुछ खेल खिलाते थे। अभी हमारे पास जिस तरह के गेम और सामग्री हैं, उस तरह की सुविधा तब नहीं थी। 

फिर इसके एक-दो साल बाद हमने सोचा कि बड़े बच्चों के साथ ट्राय करते हैं। सबसे पहले हमने हमारे साथियों की मीटिंग में इस बारे में बात कर इस पर सहमति बनाई। फिर तय किया कि इसकी शुरुआत मेरे गाँव मालमाथा से करेंगे। मैंने वर्क साइट पर महिलाओं के साथ बात की और फिर मासिक मीटिंग में भी यह बात रखी। महिलाओं ने अपनी लड़कियों के नाम लिखवाए और दिन तय किया। 

पहले युवा क्लब को मेरे घर पर बुलाया। कुल 22 लड़कियाँ आईं। तब हमें भी ज़्यादा कुछ समझ नहीं थी कि उनके साथ हर रविवार को क्या करेंगे। उस दिन परिचय हुआ, गाना गाया, हिंदी की कहानी पढ़ी और उनसे पूछा कि उनका क्या सपना है, वे क्या सोचती हैं और उन्हें क्या पसंद है। ये सब उन्होंने लिखकर बताया। खेल में ‘मेरी उँगली नाच रही है’ वाला खेल भी किया। 

फिर ऐसे ही युवा क्लब चलता गया। कभी बच्चे ज़्यादा होते तो कभी कम भी। धीरे-धीरे हमको भी समझ आया कि क्या करें उनके साथ। फिर हमने सोचा कि दूसरे गाँवों में भी युवा क्लब शुरू किया जाए। घूघरा, पादरडी और करोली में इसकी कोशिश की। घूघरा में तो क्लब चल गया, लेकिन करोली में बहुत कोशिश के बाद भी नहीं चल पाया।

फिर हमने सोचा कि समर कैंप करें। इस मुद्दे पर मीटिंग में बात हुई और सहमति बनाई गई। इसके बाद गाँव की मीटिंग में भी बात रखी। सबने सहमति दी, तो फिर हम समर कैंप की तैयारी में लग गए। 

बच्चों की लिस्ट बनाई। कक्षा 6 से 12 तक की सिर्फ लड़कियों को इसमें शामिल करने का सोचा, तो संख्या 90 से ऊपर पहुँच गई। इस बारे में हम बाहर के साथियों से भी मदद और सुझाव ले रहे थे। सुझाव आया कि पहली बार इतने बच्चों के साथ कैंप नहीं करना चाहिए। फिर संख्या कम करने के लिए कक्षा 7, 8 और 9 की लड़कियों के साथ समर कैंप किया। इस तरह बच्चों की संख्या करीब 50 हुई। इनमें 4 बच्चे मूक-बधिर भी थे।

कुल 6 दिन का समर कैंप किया। इसमें बाहर के साथियों ने भी बहुत मदद की, फिजिकली भी, ऑनलाइन जुड़कर भी और चंदे के रूप में भी। अजमेर के साथियों ने, भोपाल यूनिवर्सिटी से राहुल जी ने, साकड़ से अमित जी ने, उदयपुर से संजीव जी और अलका जी ने और भी कई साथियों ने मदद की, जिनके नाम मुझे अभी याद नहीं हैं। अजमेर के 4 साथी पूरे समर कैंप में हमारे साथ रहे।

इन 6 दिनों में हमें बहुत कुछ सीखने को मिला और खूब मज़ा भी आया।

समर कैंप के बाद बहुत से गाँवों से सुझाव आने लगे कि हमारे गाँवों में भी युवा क्लब चलाना है।

इसके बाद समर कैंप के बाद अभी 5 गाँवों, डेडली, बिलपन, जेलाना, मेवाड़ा पादरडी और बलवाड़ा, में युवा क्लब शुरू हुए हैं। अभी ये क्लब अच्छे से चल रहे हैं।

अभी युवा क्लब में हम वॉलीबॉल, फुटबॉल, रिंग और फ्रिस्बी खेलते हैं। कुछ बोर्ड गेम और दूसरे गेम भी खेलते हैं, जैसे ब्लॉक्स, चाइनीज़ चेकर, शतरंज और डोमीनो। पजल्स में टेंग्राम के 7 पीस से अलग-अलग चित्र बनाते हैं और सुडोकू करते हैं।

पढ़ने के लिए हिंदी में एकलव्य, टाटा ट्रस्ट, प्रथम बुक्स और पराग की किताबें हैं। अंग्रेजी में लेवल फर्स्ट और लेवल सेकंड की किताबें पढ़ते हैं। किताबों की कहानियाँ पढ़ते हैं और म्यूजिक के साथ किताबों का परिचय भी करवाते हैं। स्टोरीटेलिंग करते हैं और कहानी को आगे बढ़ाने की गतिविधि भी करते हैं।

एकलव्य फाउंडेशन, भोपाल से बच्चों के लिए तीन मैगजीनें हर महीने आती हैं, ‘चकमक’, ‘साइकिल’ और ‘प्लूटो’।

अलग-अलग गतिविधियाँ भी करवाते हैं। अंग्रेजी के शब्दों से कभी बॉडी पार्ट्स के नाम, तो कभी रोजमर्रा में बोले जाने वाले शब्दों को एक्शन के साथ करवाते हैं।

लिखने की गतिविधियों में किताब के कवर पेज को देखकर अपने हिसाब से कहानी लिखना, गाँव की कहानी लिखना और किसी विशेष दिन या त्योहार पर लिखना शामिल है।

ऑरीगेमी में कागज से मेंढक, तितली, बतख आदि बनाना सिखाते हैं। गणित में सर्किल बनाते हैं और उससे जुड़ी दूसरी गतिविधियाँ करते हैं।

फिर नक्शे के साथ भी अलग-अलग गतिविधियाँ करते हैं। कभी नक्शे को सही क्रम में जमाना, कभी उसमें अलग-अलग चीजें भरना और कभी अलग-अलग राज्यों की राजधानी ढूँढना।

इसके अलावा पहेलियाँ, लोककथाएँ, अंताक्षरी, ‘नाव पार’ जैसे खेल और कई दूसरी गतिविधियाँ भी करते हैं।

Author

  • उर्मिला शारदा फनात, डूंगरपुर ज़िले के बिछीवाड़ा ब्लॉक के मालमाथा गाँव में रहती हैं। उर्मिला, राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन की सक्रिय कार्यकर्ता हैं और अपने क्षेत्र की महिलाओं के अधिकार, मनरेगा और मज़दूर मुद्दों पर काम करती हैं।

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