Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

डिग्री के आगे : पहाड़ की पगडंडियों पर चलते सपने

शालिनी बिष्ट:

पहाड़ों में शिक्षा की कहानी केवल विद्यालय जाने और डिग्री हासिल करने की कहानी नहीं है। यह उन रास्तों की कहानी है, जिन पर चलते हुए एक बच्चा सीमित साधनों और सीमित अवसरों के बीच बड़े सपने देखता है। यह उन परिवारों की कहानी भी है, जो अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कई बार उन्हें यह पता ही नहीं होता कि पढ़ाई के बाद उनके बच्चे के लिए कौन-सा रास्ता बेहतर होगा।

मैं उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले से हूँ। मेरी प्रारंभिक शिक्षा भी यहीं हुई। बचपन में पढ़ाई मेरे लिए कोई बोझ नहीं थी। मुझे पढ़ना अच्छा लगता था और बचपन से ही मेरे मन में एक सपना था, वायुसेना में अधिकारी बनना।

लेकिन पहाड़ में पली-बढ़ी एक बच्ची के लिए सपना देखना और उस सपने तक पहुँच पाना, दोनों हमेशा एक जैसे आसान नहीं होते।

विद्यालय से शुरू हुई असमानता

मेरी प्रारंभिक शिक्षा एक छोटे से स्थानीय विद्यालय में हुई, जो पाँचवीं कक्षा तक था। उसके बाद मैंने दूसरा विद्यालय बदला। इन दोनों विद्यालयों के अनुभवों के बीच मुझे शिक्षा की असमानता का पहला एहसास हुआ। बाज़ार और नगर में रहने वाले बच्चों के अनुभव और अवसर हमसे अलग थे। वे अंग्रेज़ी के ऐसे शब्द सहजता से बोल लेते थे, जिन्हें सीखने में मुझे कठिनाई होती थी। उस समय शायद मैं इसे अपनी कमी समझती थी, लेकिन आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि हर बच्चे की क्षमता समान हो सकती है, लेकिन हर बच्चे को मिलने वाले अवसर समान नहीं होते।

मेरे विद्यालय के दिनों में मैंने मित्रता में भेदभाव और उपेक्षा भी झेली। लेकिन इन्हीं वर्षों में मुझे एक ऐसे शिक्षक भी मिले, जिन्होंने मेरी शिक्षा और मेरे सपनों की दिशा बदल दी। दसवीं कक्षा में हमारे जीवविज्ञान के शिक्षक रंजीत मनहास आए। वे जम्मू से थे और विज्ञान को जिस तरह पढ़ाते थे, उसने जीवविज्ञान को मेरे लिए केवल एक विषय नहीं रहने दिया। उसमें मेरी रुचि बढ़ने लगी। उन्हीं से पहली बार मैंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा और कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति जैसे शब्द सुने। जब मुझे पता चला कि उन्होंने यह परीक्षा उत्तीर्ण की है, तो मेरे मन में एक नया सपना जन्मा-मुझे भी प्राध्यापक बनना है। एक शिक्षक कभी-कभी केवल विषय नहीं पढ़ाता, वह किसी बच्चे को उसके भविष्य की एक नई तस्वीर दिखा देता है।

जब सही मार्गदर्शन न मिले तो सपने भी रास्ता बदल लेते हैं

मेरे बचपन का पहला सपना वायुसेना था। लेकिन गणित धीरे-धीरे मेरे लिए डर का विषय बनती चली गई। आज मुझे लगता है कि यदि बचपन में मुझे ऐसा शिक्षक मिला होता, जो गणित की मूल अवधारणाओं को मेरी समझ के अनुसार समझाता, तो शायद मैं गणित से इतना नहीं डरती। आज जब मैं बच्चों को पढ़ाती हूँ तो अक्सर सोचती हूँ-अगर बचपन की शालिनी को भी उसी तरह समझाया गया होता, तो क्या वह गणित से भागती? शायद नहीं।

और शायद तब मेरा वायुसेना का सपना भी किसी और दिशा में जाता।

आज भी जब मैं किसी को वायुसेना की वर्दी में देखती हूँ, तो मन में एक कसक उठती है। यह केवल एक अधूरे सपने की कसक नहीं है: यह उस सवाल की कसक भी है कि यदि सही समय पर सही शिक्षक और सही मार्गदर्शन मिल जाता, तो क्या मेरी कहानी कुछ और होती? इसीलिए मुझे लगता है कि शिक्षा में अच्छे शिक्षक और सही मार्गदर्शन केवल सुविधाएँ नहीं, बल्कि अवसर हैं।

बारहवीं के बाद शुरू होता है एक दूसरा संघर्ष

बारहवीं के बाद मैं बनस्थली विद्यापीठ में पढ़ना चाहती थी, लेकिन वहाँ नहीं जा सकी। आज भी इस बात का मुझे दुःख है। उस समय मुझे यह भी ठीक से जानकारी नहीं थी कि स्नातक स्तर पर अलग-अलग पाठ्यक्रमों में क्या अंतर होता है, कौन-सा विषय किस प्रकार के रोजगार की ओर ले जाता है और मेरे लिए कौन-सा रास्ता बेहतर हो सकता है। मैंने वही किया जो मेरे माता-पिता ने कहा—विज्ञान विषय लेकर स्नातक की पढ़ाई की। हमारे समाज, विशेषकर पहाड़ों में, कई धारणाएँ इतनी गहरी होती हैं कि बच्चे अपनी पसंद और क्षमता के बजाय उन्हीं धारणाओं के आधार पर निर्णय लेने लगते हैं। मेरे अनुभव में कला विषय को कई बार कमतर और विज्ञान विषय को बेहतर समझा जाता था। जीवविज्ञान चुनने के कारण मुझे भी कई बार यह महसूस कराया गया कि शायद मैं गणित पढ़ने वाले बच्चों जितनी अच्छी नहीं हैं।

लेकिन क्या किसी बच्चे की बुद्धिमत्ता इस बात से तय होनी चाहिए कि वह गणित पढ़ता है या जीवविज्ञान? मुझे नहीं लगता। शिक्षा का उ‌द्देश्य बच्चों को एक ही साँचे में ढालना नहीं, बल्कि उनकी अलग-अलग क्षमताओं और रुचियों को पहचानना होना चाहिए।

शिक्षा ने मुझे अपने अधिकारों के लिए बोलना सिखाया

अगर मैं अपने जीवन में शिक्षा से मिली सबसे बड़ी चीज़ पूहूँ, तो मेरा उत्तर होगा-अपने अधिकारों के लिए बोलने की ताकत। यदि मैं शिक्षित नहीं होती, तो शायद मुझे यह समझने में कठिनाई होती कि मेरे लिए सही क्या है और गलत क्या। शायद मैं अपने भविष्य और अपनी पसंद के बारे में सवाल भी न कर पाती।

मैंने अपने परिवार की इच्छा के विपरीत समाजशास्त्र को चुना। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन शिक्षा ने मुझे अपने जीवन के निर्णयों पर सवाल उठाने का साहस दिया। मेरे लिए शिक्षा इसलिए केवल रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा व्यक्ति को अपने अधिकारों, अपनी पहचान और अपने निर्णयों के प्रति जागरूक बनाती है।

क्या शिक्षा सबको बराबर अवसर देती है?

यहीं आकर पहाड़ का सवाल और बड़ा हो जाता है।

आज भी मुझे लगता है कि पहाड़ों और शहरों के बच्चों के बीच शिक्षा के अवसरों का एक बड़ा अंतर है। मेरी विद्यालयी शिक्षा के समय स्मार्ट कक्षाएँ, ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल सुविधाएँ हमारे लिए सामान्य चीजें नहीं थीं। कई अवधारणाएँ उतनी गहराई से स्पष्ट नहीं हो पाईं, जितना बेहतर साधन और अधिक अवसर मिलने पर हो सकती थीं। बात केवल इंटरनेट या आधुनिक कक्षाओं की नहीं है। बात है-किस बच्चे को कितनी

जानकारी मिलती है, कौन उसे भविष्य के विकल्प बताता है, कौन उसे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करता है और कौन उसे यह समझाता है कि उसके सामने कितने रास्ते खुले हैं। कई पहाड़ी बच्चों के सामने विद्यालय के बाद महाविद्यालय का प्रश्न आता है। फिर उच्च शिक्षा का। फिर प्रतियोगी परीक्षाओं का और अंत में रोजगार का। यहीं आकर शिक्षा और अवसर के बीच की दूरी दिखाई देने लगती है।

डिग्री और नौकरी के बीच की दूरी

हम अक्सर बच्चों से कहते हैं: “पढ़ो, मेहनत करो और आगे बढ़ो।” लेकिन क्या केवल पढ़ लेना पर्याप्त है?

मेरे अनुभव में शिक्षा किसी न किसी रूप में बहुत लोग प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन रोजगार हर किसी को नहीं मिल पाता। कई बार गलत विषय का चुनाव, उचित मार्गदर्शन का अभाव, कमजोर आधार और आवश्यक कौशलों की कमी आगे चलकर बड़ी बाधा बन जाती है। जिस समय रोजगार की आवश्यकता सामने आती है, तब पता चलता है कि डिग्री तो है, लेकिन उसके साथ वह कौशल, अनुभव या व्यावहारिक ज्ञान नहीं है जिसकी आवश्यकता थी। आज जब दुनिया कृत्रिम बु‌द्धिमत्ता और नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है, तब शिक्षा में कौशल विकास को और गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।

मेरे लिए सबसे बड़ा प्रश्न यही है-

डिग्री हाथ में आने के बाद रास्ता कहाँ है?

यदि शिक्षा हमें जीवन और रोजगार के लिए तैयार नहीं करती, तो हमें शिक्षा के उद्देश्य पर फिर से विचार करना होगा।

छात्र आंदोलनों ने भी कुछ सवाल छोड़े हैं

हाल के छात्र आंदोलनों और शिक्षा से जुड़े विरोध-प्रदर्शनों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि किसी भी आंदोलन का केंद्र वास्तव में छात्र होना चाहिए। मेरे अनुभव में कई बार विद्यार्थी अपने परिवार के दबाव, डर या परिस्थितियों के कारण खुलकर सामने नहीं आ पाते। दूसरी ओर, कई बार ऐसा भी लगता है कि छात्र आंदोलनों के साथ राजनीति जुड़ जाती है और वास्तविक वि‌द्यार्थियों की आवाज़ पीछे छूट जाती है।

पहाड़ में शिक्षा से जुड़े आंदोलनों को देखते हुए भी मुझे कई बार यही महसूस हुआ कि मंच और कैमरे के सामने दिखाई देने वाले लोग और वास्तव में परीक्षा या शिक्षा संबंधी समस्या से जूझ रहे विद्यार्थी हमेशा एक ही नहीं थे। इस अनुभव ने मेरे मन में एक सवाल छोड़ा है-

“क्या हम विद्यार्थियों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, या विद्यार्थियों के नाम पर अपनी राजनीति के लिए?”

शिक्षा से जुड़े किसी भी संघर्ष का केंद्र विद्यार्थी की वास्तविक समस्या और उसका भविष्य होना चाहिए।

अगर मुझे शिक्षा व्यवस्था में बदलाव का अवसर मिले

अगर मुझे शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करने का अवसर मिले, तो मैं सबसे पहले व्यवस्थित करियर मार्गदर्शन को मजबूत करना चाहूँगी। हर बच्चे को समय रहते यह पता होना चाहिए कि उसके सामने कौन-कौन से विकल्प हैं। कौन-सा पाठ्यक्रम किस रोजगार से जुड़ता है, उसके लाभ और सीमाएँ क्या हैं, आगे की पढ़ाई कैसे की जा सकती है और किन कौशलों की आवश्यकता होगी-इन सबकी जानकारी विद्यार्थी को समय पर मिलनी चाहिए। क्योंकि कई बार बच्चा असफल इसलिए नहीं होता कि उसमें क्षमता नहीं थी। वह इसलिए पीछे रह जाता है क्योंकि उसे रास्ते का पता ही नहीं था।

विशेषकर पहाड़ के बच्चों के लिए यह मार्गदर्शन बहुत आवश्यक है। उन्हें यह बताने की जरूरत है कि उनके सपने उनके गाँव या पहाड़ की भौगोलिक सीमाओं से छोटे नहीं हैं।

मेरे सपने अभी बाकी हैं

मेरे जीवन में कुछ सपने अधूरे रह गए। वायुसेना का सपना पूरा नहीं हो पाया। जीवविज्ञान और प्राणीविज्ञान के साथ प्राध्यापक बनने का सपना भी उस रास्ते पर नहीं जा सका, जिस रास्ते पर मैं कभी चलना चाहती थी।

लेकिन शिक्षा ने मुझे समाजशास्त्र का एक और रास्ता दिखाया।

समाज को समझने की मेरी जिज्ञासा धीरे-धीरे इतनी गहरी हुई कि आज समाजशास्त्र में प्राध्यापक बनना मेरा सबसे बड़ा सपना है। मैं आज भी बच्चों को पढ़ाती हूँ। जब किसी बच्चे को कोई अवधारणा समझ नहीं आती, तो मैं कोशिश करती हूँ कि उसे उसी स्तर से समझाऊँ जहाँ से शायद बचपन की शालिनी उसे समझ पाती। शायद यही मेरी शिक्षा की सबसे बड़ी सीख है। जो कमी मुझे मिली, मैं कोशिश करती हूँ कि वह किसी और बच्चे के रास्ते की दीवार न बने।

मेरा सपना केवल प्राध्यापक बनना नहीं है। मैं ऐसी शिक्षिका बनना चाहती हूँ, जो किसी बच्चे को यह महसूस न होने दे कि वह किसी दूसरे बच्चे से कम है। ऐसा शिक्षक, जो केवल पाठ्यक्रम पूरा न करे, बल्कि बच्चे को उसके भीतर छिपी संभावना भी दिखाई दे।

क्योंकि पहाड़ के बच्चों को केवल शिक्षा की आवश्यकता नहीं है।

“उन्हें ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें अपने सपने देखने, अपने अधिकारों के लिए बोलने और उन सपनों तक पहुँचने का रास्ता खोजने की शक्ति दे।

पहाड़ की पगडंडियाँ आज भी कठिन हैं। रास्ते अभी भी लंबे हैं। लेकिन उन रास्तों पर चलने वाले बच्चों के सपने छोटे नहीं हैं। और शायद शिक्षा की असली सफलता उसी दिन होगी, जब किसी पहाड़ी बच्चे के हाथ में डिग्री के साथ-साथ अपने भविष्य को चुनने के पर्याप्त रास्ते भी होंगे।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पहाड़ का बच्चा कितना पढ़ा।

सवाल यह है कि पढ़ने के बाद उसके लिए कितने रास्ते खुले।

Author

  • शालिनी बिष्ट उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने विज्ञान विषय में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है तथा वनस्पति विज्ञान में एम.एससी. (M.Sc. Botany) और समाजशास्त्र में एम.ए. (M.A. Sociology) किया है। शिक्षा, समाज और युवाओं से जुड़े प्रश्नों में उनकी विशेष रुचि है। पहाड़ के सामाजिक जीवन, यहाँ के बच्चों और युवाओं की शिक्षा तथा उनके संघर्षों को मैं अपने अनुभवों और संवेदनाओं के माध्यम से समझने का प्रयास करती हैं। वर्तमान में शालिनी विद्यार्थियों को पढ़ाने का कार्य भी करती हैं। उनका सपना समाजशास्त्र के क्षेत्र में अध्यापन और शोध के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान देना है।

    View all posts
Exit mobile version