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बरबतपुरा : एक ऐसा गाँव जो आज भी उम्मीदों और बेहतर कल के इंतज़ार में धड़कता है

राजा आदिवासी:

शिवपुरी ज़िले से लगभग 80 किलोमीटर दूर, खनियाधाना तहसील के पास एक छोटा-सा गाँव है, बरबतपुरा। नक्शे पर यह गाँव शायद बहुत छोटा दिखाई दे, लेकिन यहाँ रहने वाले लोगों की ज़िंदगी की कहानियाँ बहुत बड़ी हैं।

बरबतपुरा एक ऐसा गाँव है, जो विकास की मुख्यधारा से कटकर एक अलग ही दुनिया में जी रहा है। गाँव की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि यहाँ पहुँचना भी किसी चुनौती से कम नहीं लगता। बुनियादी सुविधाओं का अभाव आज भी लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बना हुआ है।

इसी जगह से इस बस्ती के लोग पीने का पानी ले जाते हैं। ये एक गड्ढा है, जो ग्रामीणों ने मिलकर खुदाई करके बनाया है। पीने का साफ पानी, शिक्षा और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसी ज़रूरी चीजें भी यहाँ के लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

जब हम पहली बार बरबतपुरा पहुँचे, तो हमारे मन में भी यही सवाल था कि आखिर इस गाँव के लोगों की ज़िंदगी कैसी होगी? यहाँ बच्चे अपना दिन कैसे बिताते होंगे? उनके सपने क्या होंगे? और सबसे बड़ा सवाल, क्या इन बच्चों को भी वह अवसर मिल पाएगा, जिसका हक़ हर बच्चे को है?

गाँव में प्रवेश करते ही हमें एक बगीचे में एक छोटी-सी चलती-फिरती दुकान दिखाई दी। दुकान बहुत बड़ी नहीं थी। कुछ ज़रूरी सामान रखा हुआ था और आसपास के गाँवों के लोग आते-जाते दिखाई दे रहे थे। लेकिन हमारे लिए वह दुकान सिर्फ एक दुकान नहीं थी।

ये चलती-फिरती दुकान…

यहीं से हमारे बरबतपुरा को समझने की शुरुआत हुई।

हमने लोगों से बातचीत शुरू की। धीरे-धीरे बातचीत गाँव की ज़िंदगी, परिवारों की परेशानियों और बच्चों की शिक्षा तक पहुँची। लोगों की बातें सुनकर हमें महसूस हुआ कि यहाँ समस्याएँ सिर्फ एक-दो नहीं हैं। यहाँ कई परिवार आज भी ऐसी परिस्थितियों में जीवन जी रहे हैं, जहाँ रोजमर्रा की ज़रूरतें पूरी करना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

सबसे ज़्यादा चिंता हमें बच्चों को लेकर हुई।

बच्चों की आँखों में सपने तो थे, लेकिन उन सपनों तक पहुँचने का रास्ता बहुत कठिन था। कोई बच्चा पढ़ना चाहता था, कोई बड़ा होकर नौकरी करना चाहता था, कोई शिक्षक बनना चाहता था, तो कोई सिर्फ इतना चाहता था कि वह अपने परिवार के लिए कुछ अच्छा कर सके।

लेकिन सवाल यह था कि इन बच्चों को पढ़ाएगा कौन?

यहीं से हमारे मन में एक विचार आया, अगर हम इन बच्चों तक शिक्षा नहीं पहुँचा सकते, तो कम से कम शिक्षा को इन बच्चों तक लेकर तो जा सकते हैं।

इसी सोच के साथ बरबतपुरा में हमारा सहरिया बाल शिक्षा केंद्र/पाठशाला की शुरुआत हुई।

शुरुआत आसान नहीं थी। न कोई बड़ी बिल्डिंग थी, न बड़ी सुविधाएँ और न ही संसाधनों की कोई भरमार। लेकिन हमारे पास एक चीज़ थी, बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा।

धीरे-धीरे बच्चे जुड़ने लगे। कभी पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई हुई, कभी खुले स्थान पर। बच्चों के हाथों में किताबें आईं और उनके चेहरों पर पढ़ने की उत्सुकता दिखाई देने लगी।

हमारे लिए वह सिर्फ एक पाठशाला नहीं थी।

वह उस गाँव में उम्मीद की शुरुआत थी।

जिस गाँव में सरकारी योजनाओं की पहुँच को लेकर सवाल खड़े होते हैं, वहाँ बच्चों के हाथों में किताब पहुँचाना हमारे लिए बहुत बड़ी बात थी। जिस गाँव में पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत के लिए संघर्ष करना पड़ता है, वहाँ बच्चों की शिक्षा के लिए एक छोटा-सा प्रयास शुरू होना अपने आप में बदलाव की एक किरण थी।

कई बार जब हम पाठशाला में बच्चों को पढ़ते हुए देखते हैं, तो मन में एक सवाल आता है, क्या गाँव में पैदा होना किसी बच्चे के सपनों की सीमा तय कर देता है?

हर बच्चे को पढ़ने का अधिकार है। हर बच्चे को सपने देखने का अधिकार है। और हर बच्चे को अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए।

बरबतपुरा हमें यही सिखाता है कि बदलाव हमेशा बड़ी इमारतों, बड़ी घोषणाओं या बड़े संसाधनों से नहीं आता। कभी-कभी बदलाव की शुरुआत एक छोटी-सी दुकान के पास हुई बातचीत से, एक बच्चे की कॉपी से और एक छोटी-सी पाठशाला से भी हो सकती है।

आज बरबतपुरा में हमारा सेंटर चल रहा है। हम जानते हैं कि सिर्फ पाठशाला शुरू कर देने से गाँव की सारी समस्याएँ खत्म नहीं होंगी। पानी की समस्या भी है, सरकारी योजनाओं की पहुँच का सवाल भी है और शिक्षा से जुड़ी कई चुनौतियाँ भी हैं।

लेकिन हम यह भी जानते हैं कि हर बड़ा बदलाव एक छोटे कदम से शुरू होता है।

बरबतपुरा में हमारा वह छोटा-सा कदम आज बच्चों की आँखों में दिखाई देने वाली उम्मीद बन रहा है।

और शायद यही हमारी सबसे बड़ी जीत है।

जहाँ सुविधाएँ कम हैं, वहाँ उम्मीद कम नहीं होनी चाहिए। जहाँ रास्ते मुश्किल हैं, वहाँ बच्चों के सपने रुकने नहीं चाहिए।

बरबतपुरा आज भी इंतज़ार में है, बेहतर पानी का, बेहतर शिक्षा का, सरकारी योजनाओं की सही पहुँच का और एक बेहतर भविष्य का।

और हम चाहते हैं कि इस इंतज़ार को सिर्फ कहानी बनाकर न छोड़ा जाए।

क्योंकि बारबतपुरा सिर्फ एक गाँव नहीं है, यह उन बच्चों की कहानी है जो सीमित साधनों के बावजूद बड़े सपने देखने की हिम्मत रखते हैं।

Author

  • राजा आदिवासी मध्य प्रदेश के शिवपुरी ज़िले की शिवपुरी तहसील के ग्राम मझेरा के रहने वाले हैं। वर्तमान में वे जेनिथ सोसायटी फॉर लीगल एंपावरमेंट संस्था के साथ जुड़कर सहरिया समाज के लिए कार्य कर रहे हैं। उन्हें कहानियाँ लिखना और सुनना पसंद है। इसके साथ ही उन्हें क्रिकेट खेलना भी अच्छा लगता है।

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