Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

शिक्षा का असली मुद्दा क्या है?

अमित:

शिक्षा व्यवस्था की समस्या यह नहीं है कि इसमें हर तरह के पेपर लीक होते हैं। शिक्षा व्यवस्था की असली समस्या यह है कि ग्रामीण स्तर पर, सरकारी प्राथमिक शालाओं में कुछ हो ही नहीं रहा है। बच्चे भैंस चराते हुए, खेतों में काम करते हुए आठवीं पास हो जाते हैं और बिना पढ़ने-लिखने के कौशल, मूल गणितीय कौशलों, विज्ञान की पढ़ाई के लिये बुनियादी तैयारी और एकाग्रता जैसे अनेक गुणों के बिना या तो स्कूल के बाहर हो जाते हैं या नौवीं में भर्ती हो जाते हैं, जहाँ हाई स्कूल के शिक्षक, अपना माथा पकड़ लेते हैं।

हम आँकड़ों की कितनी ही लीपा-पोती कर लें और बताएँ कि कितने बच्चे स्कूल में हैं, कितने प्रतिशत ने हाई स्कूल कर लिया आदि। पर इन आँकड़ों से यह सच्चाई नहीं छुप सकती कि प्राथमिक स्कूलों व निचले स्तर पर, न शिक्षा है, न ही कोई व्यवस्था। असल में ये आँकड़े उस पहाड़ी गाँव में बने स्कूल की सच्चाई बयां ही नहीं करते, जहाँ के बच्चे खेतिहर या मज़दूर परिवार से आते हैं और जिन्हें खेत में काम करना ही होता है, जहाँ की बच्चियों को घर के सारे काम करने ही होते हैं और बारह-तेरह साल की उम्र से उन पर शादी का दबाव बनने लगता है। जहाँ शिक्षक को दो-तीन किलोमीटर पैदल सफ़र तय करना पड़ता है स्कूल पहुँचने के लिये, इसलिए ज़्यादा आसान होता है कभी-कभी जाना। इन आंकड़ों से उन अधिकांश बच्चों की कहानी भी नहीं समझी जा सकती, जिनके लिये शिक्षक की बात समझना ही सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि उनकी मातृभाषा ही कुछ और है। आज की तारीख़ में विकास के अन्य कार्यक्रमों की तरह शिक्षा क्षेत्र में भी सबसे अधिक रुचि ठेकेदारों को है, जो स्कूल का भवन निर्माण करते हैं। इसीलिए भवन निर्माण हर जगह होता दीखता है। शायद शिक्षा विभाग को भी इसी में रुचि है क्योंकि भवन निर्माण सभी के लिये अतिरिक्त आय का एक मोटा साधन है।

यदि स्कूल भवन भी है और शिक्षक वहाँ आते भी हैं और बच्चे भी आते हैं, तब यह सवाल आता है कि सिखाना कैसे है? सैकड़ों संस्थाओं, हज़ारों पी.एच.डीओं के बाद आप किसी ऐसे से पूछिए जो प्राथमिक शिक्षकों की ट्रेनिंग में लगे हैं, तो उनको आज सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला सवाल यह होता है कि बच्चों को पढ़ना कैसे सिखाएँ? मात्रा सिखाना तो एक असाध्य पहेली है। अब सोचिए, जिस देश में पाँच हज़ार साल पहले सिंधु घाटी में लिपि विकसित हो चुकी थी, वहाँ के शिक्षक बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं सिखा पा रहे। इसी तथ्य को समझते हुए सारे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और उनके चलते हमारी सरकारों ने केवल साक्षरता को मानक बनाया और हर वर्ष खुशी मनाते हैं कि साक्षरता की दर कितनी बढ़ गई है। जब हम साक्षर भारत भी नहीं बना पा रहे, तो ऐसे में शिक्षा जैसे विशाल शब्द का तो अर्थ समझना तो संभव ही नहीं है।

इस बात को सुनते ही लोग कहते हैं कि हमारे जैसे लोगों को केवल कमियाँ ही दिखती हैं। हमारे देश ने रॉकेट चाँद पर भेज दिया, सैटेलाइट लॉन्चिंग में इस दुनिया में अधिकांश देशों से आगे हैं, विदेशों से लोग यहाँ इलाज करवाने आते हैं, आदि-आदि। लेकिन, इनसे हमारी प्राथमिक शिक्षा की नग्न अवस्था नहीं छिपाई जा सकती। नंगों में से कौन और कैसे कुछ लोग उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुँच जाते हैं, वह अलग विषय है। हमारे गाँव की भैंस चराने वाली, चमकीली आँखों वाली, बहुत तेज़, फुर्तीली, मेहनती लड़की का वहाँ पहुँचने का चांस लगभग शून्य है। यह सच्चाई है। और इसी सामाजिक व आर्थिक सच्चाई को बदलने के लिये देश ने सार्वजनिक शिक्षा और सबके लिये बेहतर शिक्षा का सपना देखा था। इसीलिए सावित्रीबाई फुले ने पत्थर और गोबर की मार खाते हुए भी लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया था। इसीलिए बाबा साहेब आंबेडकर, टैगोर, गांधी और अनेक उच्च कोटि के विचारकों ने शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया था। इसीलिए संविधान में केवल प्रतिष्ठा की समता नहीं लिखा है, उसमें प्रतिष्ठा व अवसर की समता लिखा है। और भारत के प्रत्येक बच्चे को अवसर की समता मिले, इसके लिये मज़दूरों, किसानों, मेहनतकशों और हर गरीब-अमीर के बच्चे को एक-सी उच्च गुणवत्ता की शिक्षा मिलनी ही चाहिए। यह हम आज तक नहीं कर पाए और इस लक्ष्य से और दूर होते जा रहे हैं, यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की कमज़ोरी है।

सरकारें इस लक्ष्य को भूल ही नहीं गईं, अब वे इस ज़िम्मेदारी से भी पल्ला झाड़ने में लगी हैं। नब्बे के दशक में शुरू हुई शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की दस्तक अब परवान चढ़ गई है। देश के हज़ारों सरकारी स्कूल बंद किए जा चुके हैं। बहुत मेहनत से बने मॉडल स्कूल आदि को भी ज़मीन समेत निजी हाथों में दिया जा रहा है। निजी स्कूल को अच्छी शिक्षा का पर्याय मान लिया गया है, हालाँकि जो लोग छोटे कस्बों में रहते हैं, उन्हें मालूम है कि अधिकांश निजी स्कूलों का स्तर सरकारी स्कूलों से भी रद्दी है। कल्याणकारी राज्य की कल्पना से शिक्षा और स्वास्थ्य को बाहर कर दिया गया। जो स्कूल बच्चे के घर के पास सुलभ होनी चाहिए थी, जहाँ आज़ादी के बाद तीसरी-चौथी पीढ़ी की आदत में आ जाना चाहिए था स्कूल जाना, वहाँ आज भी स्कूल प्रवेश कार्यक्रम कर-कर के बच्चों को लुभाना पड़ रहा है और निजी स्कूलों में फीस भरकर भेजना पालकों की कल्पना से बाहर हो गया है। अधिकांश आदिवासी इलाकों में मजदूरों के बच्चे अब मजदूर हो बनेंगे – यही, निराशाजनक और गुस्सा दिलाने वाला, नतीजा निकला है शिक्षा में सरकार की अरूचि से।

खैर, मोटी बात यह है कि जब कोई स्कूल के आठ वर्षों के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकता, जोड़-घटाव, गुणा-भाग नहीं कर सकता, वह क्या ही सपना इस नई दुनिया का देखेगा। जो बच्चे सब अव्यवस्थाओं और घरों की कठिन आर्थिक-सामाजिक स्थितियों के बाद भी बाज़ नहीं आते और कॉलेज पहुँच जाते हैं और सरकारी नौकरी का सपना दिमाग में बसा लेते हैं, वो फिर जा फँसते हैं उनके पास के किसी शहर की कोचिंग फैक्टरियों में। साल का कम से कम एक-डेढ़ लाख का खर्च उनके माँ-बाप, भाई-बहन, भाभियाँ खेतों में काम करके, दूसरे राज्यों में मज़दूरी करके भरते हैं, उस नौकरी के सपने के पीछे। क्योंकि घर के एक की नौकरी सबके लिये काम आएगी। ये हैं वे बच्चे जो नीट की परीक्षा के मुद्दे पर इकट्ठे हो रहे हैं। जिनका आक्रोश एक परीक्षा का पेपर लीक होने से नहीं बना, वो बना है उनकी बारह-पन्द्रह साल की घटिया शिक्षा व्यवस्था से, जिसने उन्हें उस लायक नहीं बनाया जैसा उसे बनाना था।

शिक्षा का मुद्दा यह भी है कि बच्चों को क्या पढ़ाया जाएगा और यह कौन तय करेगा। एक रंग की विचारधारा के लोग क्या एक ही रंग की शिक्षा देंगे? रॉकेट लॉन्च करने वाले यह नहीं चाहते कि बच्चे विज्ञान सीखें। वे चाहते हैं कि बच्चे प्रश्न न करें, केवल विश्वासों के बल पर जीवन जिएँ। गरीबों के बच्चे सही इतिहास जानें, यह तो कभी कोई नहीं चाहता क्योंकि ऐसा होने से तो वे समझ जाएँगे कि उनकी गरीबी की हालत किसी दैविक लेखे-जोखे के कारण नहीं है। किन लोगों और व्यवस्थाओं के कारण है, यह भी समझ जाएँगे। यह भी पोल खुल जाएगी कि उनका शोषण केवल किसी एक विशेष धर्म के लोगों ने नहीं, बल्कि जब जो सत्ता में रहा, उन सब ने किया। इसीलिए पूरी स्कूली व्यवस्था को अंग्रेज़ों की तर्ज़ पर येस सर, नो सर, आज्ञा पालन, अनुशासन के आदर्शों पर बनाकर रखा है। इसका सीखने से कोई लेना-देना नहीं है।

शायद आज की पीढ़ी, जो इंटरनेट से सीख रही है, उसने ये सब मूल्य ठीक से नहीं सीखे। वे सवाल पूछ रहे हैं। तीखे सवाल पूछ रहे हैं। जिस भी बहाने पर शिक्षा का मुद्दा पहली बार राष्ट्रीय बहस में आया, यह बहुत बड़ी बात है। इस मौके को हमें केवल परीक्षा लीक, किसने गाली दी, तक सीमित नहीं रखना चाहिए।

इस लेख के माध्यम से मैं आप सबसे निवेदन भी करना चाहता हूँ कि आप सब अपने स्कूलों की, अपने गाँव-मोहल्ले के स्कूलों की कहानियाँ लिखें, जिससे आप सबकी आँखों से हम स्कूली व्यवस्था को देख सकें।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

    View all posts
Exit mobile version