Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

मेहसी के सीप वाले बटन: स्वदेशी आंदोलन की पहचान बना उद्योग, आज लुप्त होने की कगार पर

विकाश कुमार:

इस वर्ष अप्रैल में मुझे “जहाँ पड़े कदम गांधी के, एक कदम गांधी के साथ” पदयात्रा के तहत पटना से चंपारण तक आयोजित यात्रा में शामिल होने का मौका मिला। यह यात्रा उन ऐतिहासिक स्थलों से होकर गुज़री, जहाँ महात्मा गांधी 1917 में पहली बार बिहार आने के दौरान पहुँचे थे। यात्रा का अंतिम पड़ाव चंपारण था, जहाँ गांधी ने पहली बार सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी थी।

इसी यात्रा के दौरान पूर्वी चंपारण के मेहसी जाने का अवसर मिला। मेहसी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि कभी यह स्थान देश के सबसे महत्वपूर्ण कुटीर उद्योगों में से एक का केंद्र हुआ करता था। यहाँ बनने वाले सीप (Shell) के बटन एक समय पूरे भारत में अपनी गुणवत्ता और प्राकृतिक चमक के लिए प्रसिद्ध थे।

आज भी मेहसी में कुछ परिवार पीढ़ियों से चली आ रही इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। एक छोटे से कुटीर उद्योग में हमें सीप से बटन बनाने की पूरी प्रक्रिया देखने का अवसर मिला। नदियों से प्राप्त प्राकृतिक सीपों को पहले साफ किया जाता है, फिर विशेष मशीनों की सहायता से गोल आकार में काटा जाता है। इसके बाद उनमें छेद किए जाते हैं, किनारों को तराशा जाता है और अंत में पॉलिश कर उन्हें चमकदार बनाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया आज भी काफी हद तक हस्तकौशल पर आधारित है और वर्षों के अनुभव की माँग करती है।

स्वदेशी आंदोलन से जुड़ा इतिहास

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा, तब विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का व्यापक अभियान चलाया गया। उस समय यूरोप से आयातित बटनों के विकल्प के रूप में मेहसी में बनने वाले सीप के बटन तेज़ी से लोकप्रिय हुए। प्राकृतिक, टिकाऊ और आकर्षक होने के कारण इनकी माँग देशभर में बढ़ी और यह स्थानीय उद्योग स्वदेशी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण आर्थिक आधार बन गया।

इसी दौर में मेहसी में अनेक छोटी-बड़ी बटन फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं। हज़ारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोज़गार मिला। वर्ष 1908 में स्थापित तिरहुत मून बटन फैक्ट्री (Tirhut Moon Button Factory) इस उद्योग का सबसे प्रतिष्ठित नाम थी। बताया जाता है कि यहाँ निर्मित बटन देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों तक भी भेजे जाते थे। यात्रा के दौरान इस ऐतिहासिक फैक्ट्री को देखने का अवसर मिला। आज इसकी इमारत खामोश खड़ी है, मानो अपने गौरवशाली अतीत की कहानी खुद बयां कर रही हो।

कैसे आया पतन?

1990 के दशक में बाज़ार में सस्ते नायलॉन और प्लास्टिक के बटन बड़ी मात्रा में आने लगे। कम कीमत और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण इनका बाज़ार तेज़ी से बढ़ा। इसके सामने प्राकृतिक सीप के बटन प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके।

इसके साथ ही कच्चे माल की उपलब्धता में कमी, आधुनिक तकनीक का अभाव, विपणन की कमज़ोर व्यवस्था और सरकारी संरक्षण न मिलने से यह उद्योग लगातार सिमटता चला गया। एक समय हज़ारों लोगों को रोज़गार देने वाला यह उद्योग अब कुछ गिने-चुने परिवारों तक सीमित रह गया है।

Author

  • विकास युवा विचारक, स्वतंत्र पत्रकार एवं प्रगतिशील सिनेमा आंदोलन से जुड़े हैं, झारखंड के निवासी,हैं और फिलहाल विशाखापटनम में रहते है।

    View all posts
Exit mobile version