खीमा जेठी:
उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ ज़िले के विकासखंड डीडीहाट की ग्राम पंचायत ओगला के तोक पाठक गाँव में रहने वाली एकल महिला मोहनी देवी से पारंपरिक खेती और उससे जुड़े रीति-रिवाजों पर बातचीत की गई।
मोहनी देवी बताती हैं कि पहले धान की बुवाई करने से पहले गाँव के बुजुर्गों से बातचीत कर एक शुभ दिन और वार तय किया जाता था। उनके द्वारा बताए गए शुभ दिन पर ही बीज बोए जाते थे। विशेष रूप से शनिवार को बीज बोने के लिए शुभ माना जाता था। लोगों का विश्वास था कि शनिवार का दिन शुभ होता है, जिससे खेती का कार्य सफलतापूर्वक और शीघ्र पूरा होता है। सभी गाँव के लोग उसी दिन बीज बोने की शुरुआत करते थे।
मई और जून माह में धान, मड़ुवा, सोयाबीन, मक्का आदि खरीफ फसलों की बुवाई की जाती है। पहले धान की रोपाई के लिए नर्सरी तैयार की जाती है तथा 15 जून से 15 जुलाई के बीच धान की रोपाई का कार्य पूरा किया जाता है।
जून-जुलाई में धान की गुड़ाई की जाती है और अगस्त माह में उसकी निराई की जाती है। 15 सितंबर से मड़ुआ और धान की कटाई प्रारंभ होती है, जो अक्टूबर तक चलती है। इसके बाद नवंबर माह में गेहूँ, जौ, मसूर, चना और सरसों जैसी फसलों की बुवाई की जाती है।
फरवरी के मध्य से सरसों की कटाई शुरू होती है। मार्च में जौ और मसूर की कटाई की जाती है तथा अप्रैल में गेहूँ की कटाई होती है। गेहूँ की कटाई के बाद खेतों को पुनः धान की खेती के लिए तैयार किया जाता है।
धान की रोपाई शुरू करने से पहले शुभ दिन निर्धारित किया जाता है। उसी दिन रोपाई की शुरुआत होती है। नर्सरी से धान के पौधे निकालते समय पौधे निकालने वाले लोगों के माथे पर टीका लगाया जाता है। इसके साथ ही धान के पौधों, बैलों और हल का भी तिलक कर उनकी पूजा की जाती है। इसके बाद सामूहिक रूप से रोपाई शुरू की जाती है।
रोपाई समाप्त होने पर जिस खेत में धान की नर्सरी तैयार की गई होती है, उसके बीच में धान, तिल, हिसालू, पाती तथा बलू के पौधे लगाए जाते हैं। इन पौधों की सामूहिक पूजा की जाती है। सभी लोग एक-दूसरे को सुख-समृद्धि, अच्छी फसल और मिल-जुलकर कार्य करने का आशीर्वाद एवं शुभकामनाएँ देते हैं।
पहले गाँव में धान की रोपाई की शुरुआत अपने स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों का स्मरण करते हुए लोकगीत गाकर की जाती थी। महिलाएँ खेतों में सामूहिक रूप से रोपाई करते हुए ये गीत गाती थीं।
“जी राया जाग राया, सुफल है जाया, पंचनाम देवा हो…”
इस लोकगीत के माध्यम से स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों का स्मरण करते हुए अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और पूरे गाँव की खुशहाली की कामना की जाती थी। रोपाई के दौरान एक महिला गीत की पंक्ति गाती थी और अन्य महिलाएँ उसे दोहराती थीं। इन गीतों में वर्षा, उपजाऊ धरती, बैलों, बीज, अन्नदाता किसान, ग्राम देवता और परिवार की समृद्धि की कामना की जाती थी।
मोहनी देवी बताती हैं कि पहले धान की बुवाई मार्च माह में ही कर दी जाती थी, जिसकी कटाई सितंबर के पहले सप्ताह तक हो जाती थी। वर्तमान समय में पहाड़ों में धान की खेती बहुत कम हो गई है। यहाँ तक कि पारंपरिक फसलें भी पहले की तुलना में काफी कम बोई जा रही हैं।
पहाड़ों में सिंचाई की सुविधा सीमित होने के कारण अधिकांश खेती वर्षा पर निर्भर करती है। पहले समय पर वर्षा होने से किसान समय पर बुवाई कर लेते थे, लेकिन अब मौसम में बदलाव के कारण वर्षा का समय अनिश्चित हो गया है। समय पर बारिश न होने से किसान फसल की बुवाई समय पर नहीं कर पाते, जिससे उत्पादन भी प्रभावित होता है। देर से बोई गई फसल अपेक्षाकृत कम उपज देती है।
खेती से होने वाली आय में कमी के कारण आज बड़ी संख्या में युवा रोज़गार की तलाश में पलायन कर रहे हैं। जंगली सूअरों और बंदरों द्वारा फसलों को भारी नुकसान पहुँचाया जा रहा है। गाँवों में अधिकांशतः बुजुर्ग ही रह गए हैं, जिससे खेती कर पाना और भी मुश्किल हो गया है।

