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हीटवेव और मज़दूर 

ज़ेबा वसी:

भारत में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से ग्लोबल वार्मिंग तेज़ी से बढ़ी है, उसका असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। इसका प्रभाव सबसे अधिक एक खास वर्ग पर पड़ रहा है-मज़दूर वर्ग, जो पहले से ही विभिन्न सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से लगातार जूझता रहा है। जिस तरह से मज़दूर वर्ग अपनी आजीविका के लिए रोज़ सड़कों पर दो वक्त की रोटी कमाने निकलता है, ऐसे में बढ़ते तापमान में उन्हीं सड़कों पर काम करना उनके लिए कितना कठिन होता होगा, इसका सही अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।

असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों का संघर्ष हमेशा व्यापक और लगातार रहा है, लेकिन सरकार और पूंजीपति वर्ग इस वास्तविकता को आज भी पूरी तरह समझ नहीं सके हैं। सरकार हर साल एक्शन प्लान तो बनाती है, पर वह ज़मीनी स्तर तक कितना पहुँच पाता है, यह हम सब जानते हैं। कूलर और एयर कंडीशनर में बैठे लोग इस सच्चाई को शायद ही कभी महसूस कर पाएँ।

IMD (India Meteorological Department) के आंकड़ों पर आधारित एवं हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के कई शहरों में तापमान 40°C से 47°C तक पहुँच गया है। उदाहरण के तौर पर, दिल्ली का तापमान 43-45°C, उत्तर प्रदेश के बांदा में 47.6°C, महाराष्ट्र के अमरावती में 46.6°C और नागपुर में 45°C से अधिक तापमान दर्ज किया गया, जो हीटवेव की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में आम इंसानों से लेकर पशु-पक्षी तक हमेशा से जूझते आए हैं।

सरकार रोज़ नए-नए दावे करती है। हर राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर अलग-अलग विभाग बढ़ते तापमान पर बयान देते हैं और नए-नए फरमान जारी करते हैं, लेकिन मज़दूरों की रोज़ी-रोटी के बारे में ठोस तरीके से क्यों नहीं सोचते? जहाँ एक तरफ सरकार हर साल पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने का नाटक करती है, वहीं दूसरी तरफ विकास के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई हो रही है। इस पर शायद ही कोई स्पष्ट जवाब या बयान आता है।

ईंट-भट्टों पर काम करने वाले मज़दूरों के लिए सरकार के पास क्या उपाय है? अगर वे इस भीषण गर्मी में काम न करें, तो उनका घर कैसे चलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं दिखता। पूरे भारत में जिस तरह से इस मुद्दे को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, वह चिंता की बात है। हर राज्य में चुनाव होते हैं, अलग-अलग मुद्दे उठते हैं, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग जैसा अहम सवाल आज भी चुनावी बहस का हिस्सा नहीं बन पाता।

दिल्ली की बात करें तो सरकार ने हीटवेव के दौरान असंगठित मज़दूरों के लिए गाइडलाइन दी है, जैसे दोपहर के समय लगभग 12 से 4 बजे काम कम करना, बीच-बीच में आराम देना, पीने का पानी और ORS की व्यवस्था करना, छाया देना और हीट स्ट्रोक होने पर तुरंत इलाज की सुविधा रखना। लेकिन क्या एक मज़दूर के लिए एक दिन भी अपने घर में बैठ पाना मुमकिन है? और ज़्यादातर काम इन्हें दिन में ही करना पड़ता है।

इसी सिलसिले में जब कुछ मज़दूरों से बात की गई, तो यह अंदाज़ा हुआ कि ग्लोबल वार्मिंग जैसी गर्मी में भी अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी चलाने, खुद को ज़िंदा रखने और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उनके लिए काम करना कितना ज़रूरी है-चाहे सरकार के कितने ही दिशा-निर्देश क्यों न आएँ।

राजू बिहार के रहने वाले हैं और दिल्ली में एक कंस्ट्रक्शन मज़दूर हेल्पर के तौर पर काम करते हैं। वह सुबह 9 बजे से ही काम में लग जाते हैं। राजू बताते हैं कि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। चाहे कितनी भी गर्मी हो, काम तो करना ही पड़ेगा।

अरुण आगरा से दिल्ली आए हैं और वह डिलीवरी बॉय का काम करते हैं। वह पोर्टर पार्सल कंपनी के ज़रिए डिलीवरी करते हैं। उनका कहना है कि उनकी कंपनी की तरफ से अभी तक कोई ऐसा दिशा-निर्देश नहीं आया है कि दोपहर की तेज़ गर्मी में काम करना है या नहीं।

राम बहुरण हौज़ खास में रहते हैं और ठेला चलाकर अपना गुज़ारा करते हैं। वह सुबह से ही हौज़ खास बाज़ार में खड़े रहते हैं, इस इंतज़ार में कि कब उन्हें काम मिलेगा और उनका दिन चलेगा। हौज़ खास मेट्रो के बाहर पानी पीने का मटका लगा है, लेकिन दिलीप सिंह चरण मार्ग से लेकर औरबिंदो मार्ग तक कहीं और ऐसे मटके देखने को नहीं मिलते। कई बार उन्हें पानी खरीदकर पीना पड़ता है, क्योंकि ज़्यादातर लोग पानी के लिए पूछते भी नहीं हैं।

सूरज साहू उन्नाव से दिल्ली आए हैं और सड़क पर चाय बनाकर बेचते हैं। उन्होंने बताया कि पहले गैस की कमी की वजह से उन्हें दुकान चलाने में दिक्कत हुई, और अब इतनी गर्मी है कि ग्राहक आना कम हो गए हैं। लेकिन रोज़ी-रोटी के लिए काम करना तो ज़रूरी है ही। 

इसी तरह हर क्षेत्र के मज़दूरों को ग्लोबल वार्मिंग से लेकर जलवायु परिवर्तन तक न जाने कब तक झेलना पड़ेगा, और भारत जैसे देश इसे कब एक गंभीर मुद्दा बनाकर इस पर काम करना शुरू करेंगे। आख़िर कब तक मज़दूर इस बढ़ते तापमान और जलवायु संकट का सबसे बड़ा बोझ अकेले उठाते रहेंगे। क्या अब भी समय नहीं आया कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार को सिर्फ कागज़ी ही नहीं धरातल स्तर पर भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए काम करे? अब ज़रूरत है कि सरकारें सिर्फ़ दावों से आगे बढ़ें और मज़दूरों के लिए ठोस और स्थायी कदम उठाएँ, ताकि इस बढ़ते तापमान के बीच उनकी ज़िंदगी सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके। 

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  • ज़ेबा, बिहार- पटना की रहने वाली है और एक सामाजिक कार्यकर्ता है । वह पिछले 6 वर्ष से महिलाओं और बच्चों के मुद्दों पर कार्य कर रही है।

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