जीवतलाल परमार:
मनरेगा की समस्याएँ और नई योजना को लेकर बढ़ती चिंताएँ
राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले का आदिवासी क्षेत्र लंबे समय से आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करता रहा है। यहाँ ग्रामीण परिवारों की आजीविका मुख्य रूप से मज़दूरी और खेती पर निर्भर है। ऐसे में ग्रामीण महिलाओं के लिए मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम) एक महत्वपूर्ण सहारा रहा है। इस योजना ने हज़ारों गरीब और आदिवासी परिवारों को गाँव में ही रोज़गार उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई है।
लेकिन वर्तमान समय में डूंगरपुर के कई गाँवों में महिलाओं को मनरेगा से जुड़ी कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन समस्याओं का सीधा असर उनके जीवन, परिवार की आर्थिक स्थिति और बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है।
रोज़गार की गारंटी के बावजूद काम की कमी
मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को साल में कम से कम 100 दिनों का रोज़गार देना है। लेकिन वास्तविक स्थिति कई जगहों पर इससे अलग दिखाई देती है। डूंगरपुर के आदिवासी गाँवों की महिलाएँ बताती हैं कि वे कई बार काम के लिए आवेदन करती हैं, फिर भी उन्हें समय पर काम नहीं मिल पाता।
कई महीनों तक काम न मिलने के कारण परिवार की आय प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में कई परिवारों को कर्ज़ लेना पड़ता है या मज़दूरी के लिए दूसरे क्षेत्रों में पलायन करना पड़ता है। इससे महिलाओं पर आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों बढ़ जाते हैं।
मज़दूरी का पूरा भुगतान नहीं मिलना
जहाँ काम मिलता भी है, वहाँ मज़दूरी का भुगतान समय पर नहीं होना एक बड़ी समस्या है। कई बार मज़दूरी में देरी हो जाती है या पूरा भुगतान नहीं मिलता। इससे गरीब परिवारों की दैनिक ज़रूरतें पूरी करना कठिन हो जाता है।
ग्रामीण महिलाएँ बताती हैं कि जब मज़दूरी समय पर नहीं मिलती, तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरतों पर भी असर पड़ता है।
रोज़गार मांगने पर रसीद नहीं मिलना
मनरेगा के नियमों के अनुसार जब कोई व्यक्ति रोजगार के लिए आवेदन करता है, तो उसे आवेदन की रसीद दी जानी चाहिए। यह रसीद इस बात का प्रमाण होती है कि व्यक्ति ने रोजगार की मांग की है।
लेकिन कई गाँवों में महिलाओं को आवेदन की रसीद नहीं दी जाती। इससे वे अपने अधिकारों का दावा करने में असमर्थ हो जाती हैं। यदि समय पर काम नहीं मिलता, तो वे बेरोज़गारी भत्ते का दावा भी नहीं कर पातीं।
परिवार और सामाजिक जीवन पर असर
इन समस्याओं का सबसे अधिक असर ग्रामीण महिलाओं और उनके परिवारों पर पड़ता है। आर्थिक असुरक्षा बढ़ने से परिवार का जीवन स्तर प्रभावित होता है। कई बार महिलाओं को मजबूरी में गाँव से दूर जाकर मज़दूरी करनी पड़ती है, जिससे बच्चों की देखभाल और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाना मुश्किल हो जाता है।
नई VB GRAM G योजना को लेकर बढ़ी चिंता
हाल के समय में सरकार द्वारा मनरेगा के स्थान पर VB GRAM G योजना लाने की चर्चा ने ग्रामीण क्षेत्रों में नई चिंता पैदा कर दी है। विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएँ इस बात को लेकर चिंतित हैं कि अगर मनरेगा जैसी रोज़गार गारंटी कमज़ोर हो गई या खत्म हो गई, तो उनके लिए रोज़गार के अवसर और कम हो सकते हैं।
मनरेगा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि इसमें रोज़गार एक अधिकार के रूप में दिया जाता है। इसलिए ग्रामीण समुदाय यह जानना चाहता है कि नई योजना में भी क्या वही गारंटी, पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहेगी या नहीं।
ज़रूरी है संवाद और समाधान
डूंगरपुर जैसे आदिवासी क्षेत्रों में महिलाओं की आजीविका और आर्थिक सुरक्षा के लिए रोज़गार योजनाओं का मजबूत और पारदर्शी होना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए आवश्यक है कि मनरेगा के प्रावधानों को सही तरीके से लागू किया जाए, मज़दूरी का भुगतान समय पर हो और रोज़गार मांगने की प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए।
साथ ही नई योजनाओं के बारे में ग्रामीण समुदाय, विशेषकर महिलाओं को स्पष्ट जानकारी दी जानी चाहिए और उनकी राय को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं को समझकर उनका समाधान करना ही सच्चे अर्थों में समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

