शंकर तड़वाल:
घर के लोग सोचोगे कि हमारे परिवार के लोग काम-धन्धे के लिए रोज़गार के लिए बाहर गये हैं। काम करके परिवार चलाने लायक पैसे लेकर आयेंगे। कुछ घर के खान-पान में पैसे लगायेंगे, कुछ कर्ज़ चुकाने में लगायेंगे। जो परिवार में बच्चे व परिवार के सदस्य क्या-क्या सोचते होंगे।
उस परिवार के सदस्य की किसी भवन निर्माण में गिरकर मृत्यु हो गई, किसी सदस्य की बिजली करन्ट लगने से मौत हो गई, ये तो हमने सुना है, किन्तु किसी गाँव के 36 लोग काम के लिए पलायन पर गये और पूरे सदस्य की मृत्यु 2-3 साल तक बीमार रहकर मौत हो जाने की ख़बर नहीं सुनी होगी। हम ज़िला अलीराजपुर के ग्राम मालवाई गाँव या ग्राम ध्याना की ख़बर को सुनायेंगे तो आपको यक़ीन नहीं होगा कि ऐसा भी हो सकता है। मालवाई-ध्याना के 80-81 लोग ऐसा ही रोज़गार की तलाश में घर छोड़कर काम पर गये थे और वापस घर आने के बाद बीमार पड़ गये। बीमार भी कितने साल रहे होंगे – कोई 1 साल या 2 साल नहीं। 5 साल से 8 साल तक बीमार रहने के बाद उक्त 80-81 मज़दूरों की टोली ख़त्म हुई। हर मज़दूर मरने के समय खाट पर उछल-उछलकर पहले तड़पते हैं, पास में कोई परिवार का सदस्य खड़ा है उसे मारते हैं, चिल्लाते हैं, उसके बाद वह अपने आप साँस लेना बन्द कर देता है, उसकी मृत्यु हो जाती है।
भारत के इकॉनॉमिक सर्वे 2019-20 के अनुसार भारत की कुल मज़दूर संख्या (वर्क फ़ोर्स) 54 करोड़ है। इनमें से 44 करोड़ मज़दूर असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। कुल मज़दूर संख्या के 30% मज़दूर आज प्रवासी हैं, ऐसा सरकारी आँकड़े बताते हैं।
हमारे आदिवासी बहुल अलीराजपुर ज़िले में देख रहे हैं कि लगभग 30 वर्ष पूर्व लोगों ने मज़दूरी करने के लिये गुजरात राज्य में पलायन करना शुरू किया। आज हर घर से लोग बहुत बड़ी संख्या में गुजरात में, सौराष्ट्र के खेतों में, मोरबी के टाइल फ़ैक्ट्रियों में, शहरों के बाँधकाम उद्योग में, सूरत के कपड़ा उद्योगों में और शहरों के मज़दूर अड्डों में जा रहे हैं। इनमें महिला-पुरुष और बच्चे भी शामिल हैं।
आइये इस पलायन से उपजी एक त्रासदी के बारे में आपको मैं बताता हूँ।
जून 2004 में अलीराजपुर के खेड़ूत मज़दूर चेतना संगठ ने वन भूमि अतिक्रमणकारियों को लेकर झाबुआ में रैली निकालकर कोई 500 लोग कलेक्टर कार्यालय में श्री पाठक कलेक्टर को जाकर वार्ता की। वार्ता वन भूमि में खेती-किसानी के नियमितीकरण को लेकर हुई। किन्तु कलेक्टर के समक्ष वार्ता में ऐसे लोग बैठे थे जो बोल रहे थे कि साहब हमको अस्पताल से गाड़ी दिला दो, हमको इन्दौर एम.वाई. सिविल अस्पताल में जाना है, हमें अज्ञात बीमारी लग गई है, वह ठीक ही नहीं हो रही है। उनकी टोली में उनका कार्यकर्ता रामचन्द्र डामोर भी था।
हमने कलेक्टर चैम्बर से बाहर निकलने के बाद आखरदेव पत्थरों के पास में बात करने के लिए उन मज़दूरों को बुलाया। 16 भील आदिवासी मज़दूर वहाँ एकत्र हुए। हमने उनको पूछा कि आपको अज्ञात कौनसी बीमारी लग गई। उन्होंने बोला – नहीं मालूम। उनसे पूछा जाँच रिपोर्ट में क्या आया, उनका जवाब था – रिपोर्ट में भी कुछ नहीं आता है। उसके बाद उन्होंने एक अख़बार बताया। उस अख़बार में उक्त मज़दूरों के पलायन कर गुजरात के पंचमहल, खेड़ा और बड़ोदरा ज़िले में सिलिका मिनरल फ़ैक्ट्रियों में काँच के पत्थर पीसने और उसकी बारीक धूल फेफड़े में चले जाने से सिलिकोसिस बीमारी की जानकारी लिखी थी। झाबुआ के मज़दूरों ने बताया – आपके अलीराजपुर में भी ऐसे बीमार मज़दूर मिलेंगे।
हमने अलीराजपुर में ऐसे मज़दूरों की तलाश करना शुरू कर दिया। जुलाई 2004 में हमें ग्राम मालवाई में गणेश नाम के एक मज़दूर की बीमार होने की जानकारी मिली। हम उसके घर गये। उस समय घर के आँगन में वह खटिया पर बीमार सी हालत में सोया था। गणेश को हमने पूछा कि आप बीमार कैसे हो गये। उसका जवाब था कि मैं बीमार हूँ। फिर पूछा कि आपको बीमारी कैसे लगी? फिर भी वह बोला कि मैं बीमार हूँ। उसको हमने पूछा आप मज़दूरी कहाँ गये थे। उसने कहा – मैं गुजरात मज़दूरी गया था। हमने पूछा गुजरात कहाँ मज़दूरी की, फिर भी वह बोला – मैं गुजरात मज़दूरी की।
हमने उसे पूछा कि गुजरात में कौन-से ज़िले में काम किया? तो वो बताया कि वो पंचमहल ज़िले के गोधरा तहसील में काँच के पत्थर पीसने वाले कारखाने में काम करने गया था। गणेश ने यह भी बताया कि उसके साथ उसकी बहन, भाई और भाभी भी उन कारखानों में काम किये थे, और उनकी मृत्यु हो गई है।
हम यह सुनकर घबराये। मेरे साथ मगन कलेश भी था। मैंने मगन कलेश को डायरी में इन लोगों का नाम लिखने को कहा। नाम लिखना शुरू किया तो पूरे गाँव में 92 लोगों का नाम आया। आपके साथ और कौन-से गाँव के लोग काम किये, तब उसने बताया – ग्राम घोंगसा के लोग भी थे। हमने ग्राम घोंगसा जाकर गोधरा में काम करने वालों का नाम लिखना शुरू किया। वहाँ 23 मज़दूर लोग मिले।
जब हमने लोगों से पूछा कि आप लोग बीमार कैसे पड़े, तब लोगों ने बताया कि वालासिनोर नगर में एक मन्दिर है, वहाँ से मज़दूरों ने माता की मूर्ति चोरी करके उठा लाये थे। वही माता की मूर्ति सब मज़दूरों को मार रही है। हम सभी गाँव में ऐसे मज़दूरों का नाम लिखना शुरू किया तो 495 लोगों तक आँकड़ा हमने 28 गाँव से एकत्र किया। इस सर्वे में मज़दूरों के नाम अलीराजपुर, झाबुआ, धार ज़िले के भी थे।
21-07-2007 को हमने 495 मज़दूर लोगों के नाम की सूची आवेदन के साथ राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग में खेड़ूत मज़दूर चेतना संगठ (के.एम.सी.एस.) के लेटरपैड पर भेज दी, जो दिल्ली में आयोग के पास 30-07-2007 को प्राप्त हुई, जो प्रकरण क्रमांक 300/6/25/07-08 बना।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने के.एम.सी.एस. के इस आवेदन के बारे में मई 2008 में सुनवाई की। जून 2008 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का दल अलीराजपुर-झाबुआ में मज़दूरों से बयान लिये। अस्पताल के अधिकारियों से भी जानकारी ली। उसी समय 40-50 वाहनों के दल-बल के साथ राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अधिकारियों ने गुजरात के गोधरा, खेड़ा, बड़ोदरा के कारखानों में अचानक जाँच की। झाबुआ के मज़दूर पकड़ में आये। 50-60 कारखानों में धूल उड़ने की अनियमितता, घपले और कारखाना नियम का उल्लंघन उजागर किया।
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने हमें कहा कि गोधरा-वालासिनोर-बड़ोदरा के काँच के पत्थर पिसाई कारखानों में काम करने वाले मृतक मज़दूरों की फ़ाइल बनाकर हमें प्रस्तुत करें। हमने 2008 में धार, झाबुआ, अलीराजपुर के सिलिकोसिस बीमारी से मृतक 619 मज़दूरों की फ़ाइल बनाकर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को दी।
कारखाना-जन्य सिलिकोसिस बीमारी से मरने वाले प्रत्येक मज़दूर को 3-3 लाख रुपये देने के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 2009 से लेकर 2016 तक 4 से भी अधिक बार आदेश दिये। किन्तु गुजरात सरकार ने उस आदेश का पालन नहीं किया। 2016 में अपने आदेश का पालन करवाने के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ख़ुद सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया।
10-06-2016 को 238 मज़दूरों को 3-3 लाख रुपये देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने पारित कर दिया। फिर गुजरात सरकार इस आदेश का पालन कर 238 मज़दूर जो झाबुआ, धार, अलीराजपुर म.प्र. के थे, उनके परिवारजनों के बैंक खाते में राशि 3-3 लाख देना शुरू किया।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को 03-04-2017 को फिर आदेश दिया, जिसमें 266 मज़दूरों के परिजनों को 3-3 लाख रुपये देने का आदेश था।
अन्ततः 504 मज़दूरों को राहत राशि एफ.डी. का ब्याज व नगद राशि मिलाकर 19 करोड़ रुपये मज़दूरों को भुगतान किया गया।
सिलिकोसिस बीमारी वर्तमान औद्योगिक युग की आधुनिक व्यवसायजन्य बीमारी है। यह बीमारी काँच के पत्थर निकालने की खदान में काम करने वाले मज़दूरों को भी हो जाती है। कारखाने के अन्दर पत्थर पीसने और धूल उड़ने से भी मज़दूरों को यह बीमारी हो जाती है। इसकी मोटी-मोटी जानकारी यही है कि मज़दूर के फेफड़े में काँच के पाउडर की धूल चली जाती है, वह वापस कफ़ के साथ नहीं निकलती है। या तो ऑपरेशन करके पूरा फेफड़ा बदलना पड़ेगा। वह ऑपरेशन सफल भी हो सकता है, फ़ेल भी हो सकता है। वह भी लाखों रुपये का ऑपरेशन होगा। इसका निराकरण यही है कि मज़दूर जितने दिन ज़िन्दा रहता है, उतने समय तक टी.बी. का कोर्स लेवे, पौष्टिक भोजन खिलावे। उसके कुछ समय बाद उसकी मृत्यु उसी बीमारी से निश्चित है।
हमने ई.एस.आई. रोज़गार एवं श्रम मंत्रालय, मुम्बई से स्वास्थ्य जाँच दल बुलाकर मज़दूरों की स्वास्थ्य जाँच करवाई। ई.एस.आई. इन्दौर से जाँच दल बुलाकर मज़दूरों की स्वास्थ्य जाँच कराई।
208 जीवित मज़दूरों के सिलिकोसिस-प्रभावित मज़दूरों के प्रमाण-पत्र 2011 में बनवाये थे एवं प्रत्येक मज़दूर की पेंशन शुरू करवाई। सुप्रीम कोर्ट ने मृतक मज़दूर के परिवारजन को 3-3 लाख रुपये देने का आदेश दिया, साथ ही पुनर्वास पैकेज का भी आदेश दिया था। मृतक मज़दूर के परिवारजन एवं जीवित सिलिकोसिस-प्रभावित मज़दूर को कूप निर्माण, पशु-पालन, इन्दिरा आवास, खेत का मेड़-बन्धन, मनरेगा मज़दूरी आदि की आर्थिक सहायता भी दी गई। 208 में से अभी तक 37 मज़दूरों की मृत्यु हो चुकी है।
सिलिकोसिस बीमारी 3 प्रकार की होती है –
- क्रॉनिक सिलिकोसिस: यह 15-20 साल तक सिलिका धूल में काम करने से होती है।
- एक्सेलेरेटेड सिलिकोसिस: यह 5-15 साल तक सिलिका धूल के माहौल में काम करने से होती है।
- एक्यूट सिलिकोसिस: यह 6 माह से 2 साल तक सिलिका धूल में काम करने के बाद गम्भीर असर दिखाना शुरू कर देती है।
औद्योगिक युग की आधुनिक बीमारियाँ और भी हैं –
- कोयला खदान में काम करने वाले को काला फेफड़ा (एन्थ्राकोसिस) नाम की बीमारी लगेगी।
- किसी कबाड़खाने में काम करने वाले मज़दूर को फेफड़े में कैंसर होगा, उसे एस्बेस्टोसिस नाम की बीमारी लगेगी।
- शक्कर उद्योग या गन्ना कटाई, गन्ना रस कारखाना या कम्पनी में काम करने वाले को बैगासोसिस नाम की बीमारी लगेगी।
- कपड़े के कारखानों में काम करने वाले मज़दूर को भी साँस की बीमारी होती है, जिसका नाम विसिनोसिस है।
- जो मज़दूर तम्बाकू के खेत या उद्योग में काम करता है, उसे हृदय रोग, कैंसर, फेफड़े की ब्रोंकोसिस नाम की बीमारी लगेगी।
1985 से गुजरात के सिलिका मिनरल फ़ैक्ट्रियाँ पंजीकृत हैं। सबसे पहले गुजरात के भूमिहीन दलित-आदिवासी मज़दूरों ने इन कारखानों में काम किया। हज़ारों मज़दूर गुजरात में टी.बी. बीमारी, अज्ञात बीमारी के नाम से मारे गये। फिर प्रचार हुआ कि इन मिनरल-काँच के कारखानों में काम करने से मज़दूर नहीं बचता है, मर जाता है। कहकर सबसे पहले गुजरात के मज़दूरों ने इन कारखानों में काम करना बन्द कर दिया। उसके बाद 1997-98 से मध्यप्रदेश के झाबुआ, धार, अलीराजपुर और राजस्थान के डूंगरपुर, बाँसवाड़ा के मज़दूर इन कारखानों में काम करना शुरू किये। मध्यप्रदेश में भी 3 ज़िलों का सर्वे करके 800 लोगों के नाम हमने लिखे। ऐसे सैकड़ों मज़दूरों के नाम छूट गये, जहाँ जीवित एवं मृतक सिलिकोसिस-पीड़ितों का सर्वे हम नहीं कर पाये।
सिलिकोसिस की यह सारी रामकहानी सुनाने का मेरा उद्देश्य है कि ऐसी अनेक कहानियाँ आज भी घट रही हैं और आगे भी घटेंगी। अलीराजपुर क्षेत्र में एक जागरूक संगठन था, इसलिये इस काण्ड के तह में जाकर हमने खोजबीन की और मज़दूरों पर हो रहे अन्याय को उजागर किया। सरकारों को मजबूर किया कि पीड़ितों को न्याय मिले। लेकिन जहाँ लोग संगठित नहीं हैं, वहाँ क्या होता होगा? हम जानते हैं कि अख़बार के किसी कोने में एक ख़बर छपती है और थोड़े दिन में उसे भुला दिया जाता है। आज के अन्धाधुन्ध और बेलगाम चल रहे औद्योगीकरण के पीछे अन्याय और शोषण की ऐसी अनन्त कहानियाँ आपको जानने को मिलेंगी, यदि आप पलायन कर रहे आदिवासियों के पीछे-पीछे जाओगे और ढूँढोगे। चाहे वे रेल की पटरी बिछाने वाले आदिवासी हों या फिर गन्ना काटने के लिये दूसरे राज्यों में जाने वाले आदिवासी हों। हम जानते हैं कि असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे मज़दूरों को संगठित करना बहुत टेढ़ी खीर है। मज़दूर हर समय अपनी जगह बदलते हैं, मजबूरीवश आवाज़ नहीं उठाते हैं और पराये मुल्क में दबकर रह जाते हैं। पारम्परिक ट्रेड यूनियनों ने आज तक इनकी तरफ रुख नहीं किया है। फिर भी इस अन्याय को दूर करना ही होगा क्योंकि वे केवल मज़दूर नहीं हैं। ये वे लोग हैं जो शहरों और खेतों में सम्पत्ति का निर्माण कर रहे हैं और निश्चित ही अपने हक़ की गरिमा के वे अधिकारी हैं।

