Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

एक अणु की जाति – एक कविता

अमिताभ पांडेय:

उमस को चीरती
एक बूँद पानी की जो टपकी थी
आसमान से नाक पर,
उसके एक एक अणु का
पूछा जाये पता,
की भैया कहाँ से चले थे तुम?
और कब पहुँचे उस बादल में
जो उठा था सागर से?

वो एक बूँद पसीने की
जो असगर के माथे से
सरकते हुए खुरदुरे चेहरे से
ढलकते पार कर गर्दन की लंबाई
उलझी गई थीछाती के बालों में।
तेज धूप में आमों का टोकरा
मंडी तक पहुँचाते पहुँचाते
उसका एक अणु उड़ कर चल पड़ा
लू के थपेड़ों में बहता-भटकता
हज़ारों मील पारसागर की ओर
जहां मिलेंगे उसके सगे सौतेले
पर उसके ही जैसे जैसे जुड़वा हों
अरबों ख़रब अणु पानी के
कुछ और भी अणु जो चले थे
रामआसरे के पसीने की बूँद में थे मौजूद
और कुछ जो थे तुम्हारी साँसों में

समंदर में और अणु भी जो थे
पानी के और भी दूजे
अनजान अणु न, आवारा अणुओं
के साथ साथ वही जो कभी
बहते थे तुम्हारी पड़नानी की धमनियों में
और उस बकरी के दूध में
जो पिलाया गया था
तुम्हारे परदादा को बीमार पड़ने पर
और वह था उस घोड़े की भी नसों में भी
जिसकी पीठ पर सवारी की थी
उस अनजान योद्धा ने जो मारा गया था
किसी भुला दिये गए बेवजह के युद्ध में

वह पानी का अणु
कभी किसी पेड़ की कोशिकाओं में
रासायनिक रास रंग में नाचता नाचाता
तुम्हारे बेटे के फेफड़ों की नालियों
के जाल में परसों जो गुजरा था
जो पानी का का अणु
वह चला था लाखों साल पहले
गुफामानव पुरखे के फेफड़ों से
जब वह बैठ गया होगा थक कर
आखेट करते।

पानी के उस अणु को
अंदाज़ा भी नहीं होगा
कि कितने दरख़्तों कितने पंछियों
कितनी नदियों में कितनी मछलियों
के गल्फड़ों से होता हुआ
किसी दिन वह ताक़त देगा
उस मेहतर की भुजाओं को
जो डाल रहीं हैं खाद गोबर की
उस आम के पेड़ में जो खाया था
तुमने सुबह।

अरे हाँ बात तो थी
पानी की बूँद की जो गिरी थी
सावन के उमस से बोझिल
आसमान से टपकी थी
तुम्हारी नाक पर
कितने अणु थे पानी के उसमें
सैकड़ों?
अरबों ?
ख़रबों?
150 शंख एक्जेक्टली
(1,500,000,000,000,000,000,000)

उसमे से अगर
हरेक का नाम
जात पात
धर्म और
पता ठिकाना
पूछा जाये,
जाँचा जाये,
और हुक्म हो
कि अब से आगे
अपनी पहचान
एक तख़्ती पर
लिखवा कर
बता कर गिरना
किसी के चेहरे पर
तो कितना अच्छा रहेगा!

है ना!

फिर तो शायद
किसी को भी
आपत्ति नहीं होगी

है ना?

फीचर्ड फोटो आभार : पब्लिक डोमेन पिक्चर

Author

Exit mobile version