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सुरक्षा का कवच – एक कविता

अंजू मल्होत्रा:

शादी से पहले पिता… और शादी के बाद पति –
दो ऐसे रिश्ते होते हैं, जो हमारे चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बुन देते हैं।
पिता की मौजूदगी में दुनिया का कोई डर हमें छू नहीं पाता।
वो चुपचाप हमारी राहें आसान बनाते हैं,
हर चिंता से पहले हमारी चिंता करते हैं,
हर आँसू गिरने से पहले उसे अपने दिल में समेट लेते हैं।
और फिर जब शादी के बाद एक नया अध्याय शुरू होता है,
तो वही सुरक्षा, वही अपनापन पति के रूप में साथ चलता है।
वो भी हर मुश्किल में हमारे आगे ढाल बनकर खड़ा हो जाता है,
बिना कुछ कहे, बस आँखों से हौसला देता है –
“चिंता मत करो, मैं हूँ ना…”
पर जब ये दोनों ही रिश्ते एक-एक कर जीवन से दूर चले जाते हैं,
तो एक ऐसी खामोशी रह जाती है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है।
वो घर, जो कभी हँसी की आवाज़ों से भरा रहता था,
अब सन्नाटे में डूब जाता है।
हर निर्णय खुद लेना पड़ता है,
हर डर से खुद लड़ना पड़ता है।
रात को सिरहाने रखी चुप्पी भी अब सवाल पूछती है –
“अब कौन है जो तेरे लिए ढाल बनेगा?”
कभी-कभी लगता है कि अब हम बिल्कुल अकेले हैं,
जैसे जीवन के रणक्षेत्र में बिना कवच उतार दिए खड़े हों।
पर तभी कहीं भीतर से एक आवाज़ आती है –
वही पिता की सीख, वही पति का विश्वास –
जो कहता है, “तू अब कमज़ोर नहीं…
हमारा अंश तेरे भीतर है,
हम अब तेरे बाहर नहीं, तेरे अंदर हैं।”
और यही एहसास हमें फिर से जीना सिखा देता है।
क्योंकि सच्चे रिश्ते कभी जाते नहीं,
बस रूप बदल लेते हैं।
कभी हवा की तरह छूते हैं,
कभी यादों की तरह साथ रहते हैं,
और हर कदम पर हमारी हिम्मत बन जाते हैं।

Author

  • अंजू मल्होत्रा, दिल्ली की रहने वाली हैं और प्राइवेट फर्म में अकाउंट और एडमिन डिपार्टमेंट में पिछले 34 सालो से नौकरी कर रही हैं। लिखने का शौक उनको हमेशा से रहा है लेकिन समय की व्यस्तता के कारण वो पहले लिख न सकीं। अब ज़िंदगी में कुछ ऐसा दर्द मिला कि जिंदगी के अकेलेपन मे उपजे भावों को अपनी लेखनी से लिखने की छोटी से कोशिश कर रही हैं और ये अभी शुरुवात ही है।

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