रजिया, करिश्मा:
डॉ नरेंद्र दाभोलकर के जन्म दिन को राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस के रूप में मनाया गया। 20 अगस्त को राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस पर ग्राम सभा प्रेमापुर और पारापट्टी में राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस के रूप में मनाया गया, इस कार्यक्रम के अंतर्गत डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के जन्म दिन के रूप में भी मनाया गया। राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस क्यों मनाते हैं, इसके बारे में बच्चों को बताया गया साथ ही डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के जीवन और कामों के विषय पर बच्चों के साथ संवाद किया गया और वैज्ञानिक चेतना के बारे में भी बच्चों को बताया गया। दिशा लर्निंग सेंटर पर, लाल प्रकाश राही द्वारा अनेक वैज्ञानिकों की तस्वीर और पोस्टर लगाये गये। सेंटर पर उपस्थित सभी बच्चों को इन पोस्टर्स को पढ़ने के लिए कहा गया, साथ ही पोस्टर पर बने वैज्ञानिकों के चित्रों को समझाया गया। बच्चों ने पोस्टर को पढ़कर और चित्र को देखकर समझा और कुछ सवाल भी किए गए बच्चों से – जैसे बल्ब के बारे में, जहाज के बारे में, और उन सबके बारे में उन्हें बताया गया।
राही जी ने बच्चों से कई सवाल और पहेलियां पूछीं। बच्चों ने उन पहेलियों और सवालों के उत्तर बताये। बच्चों ने इन गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। यह सभी गतिविधियाँ बच्चों को बहुत ही अच्छी लगी। इस तरह तस्वीर के माध्यम से, पढ़ते हुए और उनको समझाते हुए, वैज्ञानिक चेतना के बारे में बच्चों को काफी जानकारी प्राप्त हुई, जैसे बल्ब का आविष्कार किसने किया, जहाज का आविष्कार किसने कैसे किया, गुरुत्वाकर्षण का पता किसने लगाया, आदि घटनाओं की कहानी बच्चों को सुनायी गयी – जिसकी वजह से हमारी ज़िंदगी में इतना उजाला और बदलाव हुआ है। जो हम पढ़ पा रहे हैं, काफी सारी जानकारी बच्चों ने प्राप्त की। बच्चों को पोस्टर पढ़ाकर और दिखाकर कई चीज़ों को समझने और सीखने का अवसर बनाने का प्रयास किया गया।
राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस को तीन ग्राम सभाओं के तीन लर्निंग सेंटर और एक विद्यालय के बच्चों के साथ मानता गया। तीन लर्निंग सेंटरों में 75 बच्चे शामिल हुए, जबकि विद्यालय में 80 से भी अधिक छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।
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जमशेदपुर (झारखंड): 20 अगस्त को अंधविश्वास के खिलाफ़ लड़ाई के प्रतीक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का स्मृति दिवस होता है, जिसे देश भर में राष्ट्रीय वैज्ञानिक चेतना दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी उपलक्ष्य में बिंदु चंदन ट्रस्ट फॉर ट्राइबल सेल्फ एंपावरमेंट संस्था द्वारा आज शिलपहाड़ी गाँव में, गाँव के युवाओं और बच्चों के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित एक कार्यशाला आयोजित की गई। इस गाँव में मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों जैसे सबर, बिरहोर, भूमिज आदि रहते है।
इस कार्यशाला का उद्देश्य गाँव में फैले अंधविश्वासों जैसे डायन प्रथा, भूत-प्रेत और जातीय असमानता पर संवाद एवं लघु फिल्मों के माध्यम से चर्चा करके जागरूकता फैलाना था।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके की गई, जिसमें सभी बच्चों और युवाओं ने भाग लिया।
कार्यशाला के दौरान संस्था की शिवानी मरडीह ने कहा कि आज हमारा आदिवासी समाज भूत-प्रेत, डायन प्रथा, टोना-टोटका और नशा जैसी कुरीतियों में उलझा हुआ है, जो हमारे समाज को पीछे धकेल रहा है। ऐसे में समाज के युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करना बहुत आवश्यक हो गया है, ताकि वे शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।
गाँव की एक पढ़ी-लिखी युवती कोईली सोरेन ने इस अवसर पर बच्चों में खेलों के माध्यम से तर्कशील सोच बढ़ाने पर ज़ोर दिया और कहा कि जब समाज में वैज्ञानिक और तर्कशील दृष्टिकोण कम होता जा रहा है, तब शिक्षा के माध्यम से उसे बनाए रखना और बढ़ाना बहुत ज़रूरी हो जाता है।
इस कार्यक्रम को सफल बनाने में सुखलाल किस्कू, अर्जुन सोरेन, कोईली सोरेन, सिमोती बेसरा, मैया सोरेन एवं अंकुर शाश्वत की अहम भूमिका रही।
झारखण्ड एवं उत्तर प्रदेश में मनाया गया विज्ञान दिवस की एक झलक।

