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मज़दूरी या बंधन? ईंट-भट्टों का पीस रेट मॉडल

पुखराज रावत:

पुरे देश भर में लगभग पचास हज़ार ईंट भट्ठे हैं। इन ईंट भट्टों पर पीस रेट का सिस्टम है जो मज़दूरों का शोषणकारी मानक है। ईंट भट्टों में पीस रेट ख़त्म करके दैनिक मज़दूरी में शामिल किये जाना चाहिए।

पीस रेट का मतलब जितनी ईंट बनाओगे उतनी मज़दूरी दी जाएगी। इस पीस रेट के कारण मज़दूर दिन रात 15 से 16 घंटे काम पर लगे रहते हैं। इस काम में महिला, पुरुष और बच्चे सभी लगे रहते हैं, फिर भी अपना पूरी तरह गुजारा नहीं कर पाते हैं। 

ईंट भट्टों पर पूरा का पूरा परिवार प्रवास करता है, जिसके कारण उनके बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है। और ईंट भट्टों पर शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चे भी अपने परिवार के साथ काम में हाथ बटाते-बटाते वही काम करना सिख जाते हैं। पहले वह छोटा बच्चा ईंट पलटने, ईंट लगाने और रेत लाने जैसे छोटे-छोटे कामों से शुरुआत करता है। धीरे-धीरे वह ईंट बनाने का काम भी करने लगता है और इसी तरह वह इस जाल में फंस जाता है। बाल मज़दूर से वह एक पूरा मज़दूर बन जाता है। ईंट भट्ठा मालिकों को उसमें अपना भविष्य का मज़दूर नज़र आने लगता है।

ईंट भट्टों का ऐसा जाल है की मज़दूर निकलना चाहे तो भी आसानी से निकलना बहुत मुश्किल है क्योंकि मज़दूरों को शुरुआत में ही एडवांस (पेसगी) के जाल में फंसाया जाता है। उसके बाद उसको 15 दिनों में एक बार खाने खर्च के पैसे दिए जाते है और पुरे सीजन मतलब 8-9 महीने उसकी मज़दूरी का भुगतान नहीं किया जाता है। जब ईंट भट्टे का काम खत्म हो जाता है, तब मज़दूरों का हिसाब किया जाता है। उसमें भी कई भट्ठे मालिक मज़दूरों के हिसाब में गड़बड़ कर देते हैं। अगर मज़दूरों की टूट (किश्त) पूरी नहीं भर पाती है, तो बची हुई रकम अगले सीजन के एडवांस में जोड़ दी जाती है, जिसके कारण मज़दूरों को अगले सीजन में भी काम करने के लिए आना ही पड़ता है।

अगर ईंट भट्टों  में पीस रेट सिस्टम ख़त्म हो जाता है तो भट्ठे मालिकों के द्वारा मज़दूरों को दैनिक मज़दूरी पर मज़दूर लाना पड़ेगा, जिसके कारण बंधुआ मज़दूरी को खत्म किया जा सकता है। पीस रेट को खत्म करने से मज़दूरों के शोषण को रोका जा सकता है। भट्ठा मालिकों द्वारा एडवांस का जो दबाव मज़दूरों पर बनाया जाता है, उससे मज़दूर बच सकते हैं। पीस रेट खत्म होने से मज़दूरों से काम के तय समय से ज़्यादा काम करवाने पर उन्हें अतिरिक्त मज़दूरी मिल सकेगी।

सरकार को भी ईंट भट्टों का अध्ययन करवाना चाहिए ताकि मज़दूरों को उनका मेहनताना पूरा मिले सके। राजस्थान सरकार ने थपाई के 1000 ईंटों पर 309 रूपये तय कर रखे हैं जबकि IIT मुंबई के द्वारा ईंट भट्टों पर कच्ची ईंट बनाने का अध्ययन किया गया, जिसमे एक व्यक्ति 8 घंटो में 490 ईंट ही बना सकता है। इसलिए सरकार को ईंट भट्टों पर टाइम मोशन स्टडी करवाना चाहिए और उनकी दैनिक मज़दूरी तय करनी चाहिए।

पीस रेट मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाने में भी बाधा बनता है, क्योंकि पीस रेट सिस्टम में मज़दूर बंधे रहते हैं और अपनी मज़दूरी के बारे में बात नहीं कर पाते हैं। उन्हें एक ही मज़दूरी में दिन-रात काम करना पड़ता है। मज़दूरों के उत्थान के लिए पीस रेट सिस्टम को खत्म किया जाना चाहिए।

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  • पुखराज, राजस्थान के अजमेर ज़िले के मसोदा से हैं। वो पिछले 5 सालों से राजस्थान प्रदेश ईंट भट्ठा मज़दूर यूनियन के साथ काम कर रहे हैं।

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