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डिजिटल दुनिया में महिलाओं की अनुपस्थिति: एक नारीवादी दृष्टिकोण

नाजनीन नाज़:

“भईया, आपकी दुकान में गूगल मीट होगा क्या? मेरी बेटी के स्कूल में ऑनलाइन क्लास के लिए बोला गया है। अगर हो तो दे दीजिए।” यह शब्द थे एक महिला के जो कोविड के दौरान अपनी बेटी की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए गूगल मीट के बारे में जानने एक राशन की दुकान पर गई थी।

ये शब्द मैंने पहली बार एक डिजिटल मीडिया की ऑनलाइन क्लास में एक सोशल वर्कर हफसा नाज़ से सुना था जो कोविड के दौरान अपने फील्ड का अनुभव साझा कर रही थी। और उनका ये अनुभव सुनकर मैं सोच में पड़ गई—क्या डिजिटल दुनिया में महिलाओं की यही भूमिका है? सिर्फ मदद माँगने वाली, न कि स्वतंत्र रूप से तकनीक का इस्तेमाल करने वाली?

यह पूरे देश की एक व्यापक समस्या है। भारत में लगभग 48% पुरुष स्मार्टफोन मालिक हैं, जबकि केवल 29% महिलाएँ ही मोबाइल फोन का स्वामित्व रखती हैं। GSMA की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 81% पुरुषों के पास मोबाइल इंटरनेट की पहुँच है, जबकि महिलाओं में यह संख्या केवल 45% है। ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं बल्कि समाज में तकनीक को लेकर महिलाओं की स्थिति को दर्शाते हैं।

तकनीकी पहुँच में लैंगिक भेदभाव:

मुझे अपने स्कूल के वो दिन याद हैं जब हम दोस्त मिलकर स्मार्टफोन की बातें करते थे। कोई बोलता, “फोन में कैमरा होता है, वीडियो कॉल होती है।” लेकिन तब हम में से बहुत कम लोगों के पास फोन हुआ करता था। एक दोस्त ने बताया कि उसका छोटा भाई, पापा का फोन इस्तेमाल करता है लेकिन उसे कभी नहीं मिला। जब भी उसने फोन छूने की कोशिश की, उसे यह कहकर मना कर दिया गया कि “लड़कियाँ फोन से बिगड़ जाती हैं।”

कभी यह सवाल नहीं उठाया गया कि उसका भाई भी तो उसी फोन का इस्तेमाल कर रहा है? क्या वाकई लड़कियाँ फोन को ‘खराब’ कर देती हैं, या समाज उन्हें सीखने का मौका ही नहीं देता?

मुझे वो दिन याद है जब पापा नया फोन लेकर आए थे और चाचा ने पापा से कहा, “नाजनीन को फेसबुक चलाने मत देना।” जब मैंने पूछा क्यों? तो पापा ने बस इतना कहा, “अच्छा नहीं होता।” लेकिन वही फेसबुक चाचा खुद इस्तेमाल करते हैं।

जब लड़की को मोबाइल मिलता है: डर और दबाव

लड़कियों को जब फोन मिलता है, तो उसे अक्सर सिर्फ पढ़ाई के लिए दिया जाता है। इसके साथ कई शर्तें जुड़ी होती हैं — “ज़्यादा देर मत चलाना,” “गाने मत सुनना,” “किसी से बात मत करना।” वहीं, घर की महिलाओं को तब फोन मिलता है जब घर के पुरुष नया फोन ले लेते हैं — और वह भी सेकंड हैंड।

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया किसी की व्यक्तिगत पहचान बन चुका है। लेकिन महिलाओं को इससे दूर रखा जाता है क्योंकि यह “खतरनाक” समझा जाता है। कई बार महिलाएं फोन को छूने से भी डरती हैं क्योंकि उन्हें बार-बार सुनाया गया होता है — “तुम क्या जानो?”, “तुम से फोन खराब हो जाएगा।” ऐसी बातें सिर्फ एक डिवाइस के उपयोग को नहीं रोकतीं, बल्कि महिलाओं का आत्मविश्वास भी गिरा देती हैं।

ट्रोलिंग, शर्मिंदा करना और दोषारोपण

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं — जैसे सोशल मीडिया में मौके हैं, वैसे ही खतरे भी। लेकिन जब भी कोई महिला या लड़की ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कुछ बोलने या करने की कोशिश करती है, तो उसे ट्रोलिंग, बॉडी शेमिंग और धमकियों का सामना करना पड़ता है।

जब एक महिला यूट्यूब पर कुकिंग वीडियो डालती है, तो लोग उसके कपड़ों पर कमेंट करते हैं, न कि उसकी रेसिपी पर। जब वह इन टिप्पणियों का विरोध करती है, तो उसे ‘ओवररिएक्ट’ कहा जाता है।

सोचिए, जहाँ महिलाएं सिर्फ अपनी बात कहने की कोशिश कर रही हैं, वहीं समाज उन्हें ही दोषी ठहरा देता है — “तुमने क्यों डाला वीडियो?”, “तुमने क्यों लिखा?”

डिजिटल साक्षरता: केवल तकनीकी ज्ञान नहीं, बल्कि एक अधिकार

डिजिटल साक्षरता का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि कोई फोन चला ले या ऐप डाउनलोड कर ले। इसका मतलब है आत्मनिर्भर बनना, जानकारी तक पहुँचना, अपनी आवाज़ को बुलंद करना।

आज जब हर चीज़ — बिजली का बिल, बच्चों की फीस, स्वास्थ्य सेवाएं — ऑनलाइन हो गई हैं, तब यह सोचना कि “महिलाओं को तकनीक की ज़रूरत नहीं” एक बहुत ही संकीर्ण सोच है।

आज भी कई महिलाएं डिजिटल रूप से साक्षर हैं, वे ऑनलाइन बैंकिंग करती हैं, वीडियो कॉल करती हैं, सोशल मीडिया चलाती हैं। लेकिन अभी भी बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं इस दौड़ में पीछे हैं। इसलिए तकनीक तक समान पहुँच दिलाना केवल सुविधा नहीं, बल्कि एक समानता का अधिकार है।

तकनीक तक समान पहुँच बराबरी की दिशा में एक कदम

जब भी कोई नई सामाजिक या तकनीकी पहल होती है, महिलाओं को उसमें अपने हिस्से की बराबरी के लिए लड़ना पड़ता है — चाहे वह मतदान का अधिकार हो या फिर इंटरनेट का इस्तेमाल। समाज के हर हिस्से को यह समझने की ज़रूरत है कि तकनीकी सशक्तिकरण नारीवाद का एक ज़रूरी हिस्सा है।

फोन या इंटरनेट महिलाओं को स्वतंत्रता देता है — अपने विचार रखने की, अपने लिए फैसले लेने की, और अपने सपनों को पूरा करने की।

परिवार: बदलाव की पहली सीढ़ी

यह समस्या सिर्फ मेरे क्षेत्र की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। मैंने अपने गाँव और मोहल्ले में अकसर देखा है कि अगर कोई लड़का मोबाइल चला रहा है तो कहा जाता है, “फोन ही तो चला रहा है।” लेकिन वही मोबाइल जब किसी लड़की के हाथ में हो, तो सवाल उठते हैं— “घर का काम हो गया?”, “देखो कैसे मुस्कुरा रही है, फोन ने बिगाड़ दिया है इन लड़कियों को।”

बचपन में शायद ये बातें आम लगी हों, लेकिन जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मैंने अपने परिवार में एक सकारात्मक बदलाव महसूस किया। मुझे याद है, जब मैंने अपने पापा को पहली बार डिजी लॉकर ऐप के बारे में बताया था। वो अक्सर अपने ज़रूरी दस्तावेज़ कहीं रखकर भूल जाते थे। जब उन्हें यह पता चला कि मोबाइल में इन दस्तावेज़ों को सुरक्षित रखा जा सकता है, तो उन्होंने बहुत उत्साह से सीखा और खुद इस्तेमाल करना शुरू किया।

एक और अनुभव मेरे घर के सामने रहने वाली एक आंटी का है, जिनकी उम्र लगभग 40 वर्ष है। उन्होंने एक दिन मुझसे कहा, “मुझे भी फोन चलाना सीखना है।” शुरुआत में मुझे लगा वो मज़ाक कर रही हैं, लेकिन वो सचमुच सीखना चाहती थीं। उन्होंने कभी स्कूल की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन आज, लगभग दो साल बाद, वो व्हाट्सएप, यूट्यूब और पेटीएम जैसे ऐप आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल करती हैं। जब वो ये सब करती हैं, तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक होती है — एक आत्मनिर्भर मुस्कान।

इन अनुभवों ने मुझे यह समझाया कि महिलाओं में सीखने की ललक है, बस ज़रूरत है उन्हें मौका और समर्थन देने की। लेकिन सच्चाई यह भी है कि कई महिलाओं को आज भी फोन नहीं मिलता, उन पर भरोसा नहीं किया जाता, और उन्हें यह कहकर रोक दिया जाता है कि “बिगड़ जाएँगी”, “क्या करना है फोन चलाकर?”, या “तुमसे नहीं होगा।”

परिवार में तकनीक को लेकर यह भेदभाव ही महिलाओं के आत्मविश्वास को सबसे पहले तोड़ता है। इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि बदलाव की शुरुआत घर से हो — बेटियों को भी बेटों की तरह तकनीक के संसाधन मिलें, उन्हें प्रयोग करने, सीखने और गलती करने का बराबर अधिकार मिले।

बेटियों को भी बेटों की तरह फोन और लैपटॉप इस्तेमाल करने दें। सिर्फ पढ़ाई के लिए नहीं, बल्कि सीखने, संवाद करने और खुद को अभिव्यक्त करने के लिए।

समाज: अगर आप किसी का आत्मविश्वास बढ़ा नहीं सकते, तो कम से कम उसे गिराइए भी मत। किसी महिला को फोन या सोशल मीडिया इस्तेमाल करते देखकर उसे ‘खराब’ या ‘चालाक’ कहना बंद कीजिए। अगर संभव हो तो उसे मदद कीजिए।

सरकार: डिजिटल साक्षरता केवल ग्रामीण महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि शहरी क्षेत्रों की महिलाओं और युवाओं के लिए भी उतनी ही आवश्यक है। सरकार को चाहिए कि वह न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए सस्ते इंटरनेट प्लान, डिजिटल साक्षरता अभियान और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण की व्यवस्था करे, बल्कि शहरी इलाकों में भी इस दिशा में मज़बूत कदम उठाए।आज के समय में जब फेक न्यूज़, साइबर अपराध और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसे खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं, तो यह ज़रूरी हो गया है कि डिजिटल साक्षरता को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। इससे न केवल लड़कियाँ, बल्कि लड़के भी इन खतरों को समझ सकेंगे और उनसे बचने में सक्षम बनेंगे। साइबर सिक्योरिटी और क्रिटिकल थिंकिंग जैसी स्किल्स आज की ज़रूरत हैं, ताकि बच्चे यह समझ सकें कि इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि एक ज़िम्मेदारी भी है। डिजिटल जागरूकता से उन्हें यह भी समझ में आएगा कि ऑनलाइन दुनिया में क्या सही है और क्या गलत — और किसी अफवाह, फेक न्यूज़ या ट्रोलिंग के जाल में फंसने से खुद को कैसे बचाना है। इसलिए आज के समय की माँग है कि सरकार डिजिटल साक्षरता को केवल एक योजना की तरह न देखे, बल्कि इसे शिक्षा नीति का एक अनिवार्य हिस्सा बनाए।

निष्कर्ष: जब लड़कियाँ सीखेंगी, तभी समाज बदलेगा

एक स्मार्टफोन सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बल्कि आवाज़, शिक्षा और आज़ादी का जरिया है। अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश आगे बढ़े, तो हमें अपनी बेटियों को डिजिटल दुनिया में बराबरी का अधिकार देना होगा।

अगली बार जब आप किसी महिला को फोन चलाते हुए देखें, तो उसे यह मत कहिए कि “यह तुम्हारे लिए नहीं है।” बल्कि उसकी मदद कीजिए, क्योंकि हर क्लिक उसके आत्मनिर्भर भविष्य की पहली सीढ़ी हो सकती है।

और सिर्फ आत्मविश्वास नहीं, आजकल बिना स्मार्टफोन और इंटरनेट के आप अपने जीवन के कुछ पल भी नहीं सोच सकते, चाहे वह महिला हो या पुरुष, आज वह स्मार्टफोन सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि जानकारी और समाचार के लिए भी उपयोग करते हैं। इसके साथ ही अगर हम बात करें, अन्य सुविधाओं की जो हमें इंटरनेट से मिलती हैं जैसे स्थान तक पहुँचना, ट्रेन बुकिंग, तुरन्त ऑनलाइन भुगतान और शिक्षा के लिए बहुत तेजी से किया जाता है। और इसके साथ ही आजकल तो इतने सारे स्किल कोर्सेज फ्री में लोग इंटरनेट की मदद से करते हैं। देश का विकास जैसे मैंने पहले भी कहा, देश की महिलाओं की स्थिति पर निर्भर करता है, फिर ये आंकड़े क्या कहते हैं, “भारत में लगभग 48% पुरुष स्मार्टफोन मालिक हैं, जबकि केवल 29% महिलाएँ ही मोबाइल फोन का स्वामित्व रखती हैं।” तो आखिर में, मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि आज के समय में महिलाओं की डिजिटल उपस्थिति बहुत ज़रूरी है और इसके लिए परिवार, समाज और सरकारों सबको मिलकर काम करना होगा।

Author

  • नाज़नीन, हरियाणा के फरीदाबाद जिले से हैं और एक गैर सरकारी संस्था में मीडिया ट्रेनर के तौर पर काम करती हैं l उन्होंने अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी से स्नातक किया है और उनका सपना खुद को एक स्वतंत्र पत्रकार के रूप में देखना हैं। नाज़नीन अपने पूरे परिवार में दूसरी महिला हैं जिन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की हैं और वह अपने परिवार की पहली कामकाजी महिला हैं।

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