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पुनर्वास की समस्या: आदिवासी समुदायों के संघर्ष की कहानी

मंजू लता:

स्थान बार नवापारा छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार जिले के ब्लॉक कसडोल में स्थित है जो राज्य के महासमुंद जिले की सीमा के पास आता है जिस बार नवापारा वन्यजीव अभ्यारण के नाम से जाना जाता है। 

स्थापना 

इस बार नवापारा अभ्यारण को 1972 के वन जीव संरक्षण अधिनियम के तहत वर्ष 1976 में स्थापित किया गया था जोक नदी महानदी की एक उपनदी है इस अभ्यारण में बहती है। 

क्षेत्रफल 

अभ्यारण का कुल क्षेत्रफल लगभग 245 वर्ग किलोमीटर है यह क्षेत्र 265 मीटर से 400 मीटर की ऊंचाई वाले समतल और पहाड़ी भूभाग का मिश्रण है अभ्यारण क्षेत्र के अंतर पहले 22 गांव थे जिसमें से तीन गांव व्यवस्थापित कर दिया गया है। 

  1. बार नवापारा जो अब रामसागर भाव पटेवा महासमुंद हो गया है 
  2. लटा दादर चैन दीपा सकरा महासमुंद हो गया है। 
  3. रामपुर श्रीरामपुर सकरा महासमुंद हो गया है ।

कुल जनसंख्या 430 कल परिवार 160 जिसमें 65 परिवार obc, 65 st और 30 sc हैं। 

व्यवस्थापित दिनांक 19 जून 20…  

व्यवस्थापित हुए कुल परिवार 151… 

ग्राम पंचायत विजय मल विकासखंड पिथौरा जिला महासमुंद छत्तीसगढ़ आता है। 

जून 2013 में रामपुर गांव का व्यवस्थापन पिथौरा ब्लाक के अंतर्गत आने वाले श्री रामपुर गांव में किया गया यह व्यवस्थापन एक सरकारी आदेश के अंतर्गत किया गया था जिसमें प्रत्येक परिवार के मुखिया को पुनर्वास के बदले 5 एकड़ भूमि एक पक्का मकान और 50000 की धनराशि दी गई। 

रामपुर गांव की कुल जनसंख्या 169 थी जिसमें से 160 परिवारों ने सरकार द्वारा प्रस्तावित स्थापना को स्वीकार कर लिया और श्रीरामपुर में पुनः बस गए। इन परिवारों को योजना के तहत सभी निश्चित लाभ प्राप्त हुए हालांकि आदिवासी समुदाय के नौ परिवार ऐसे थे जिन्होंने व्यवस्थापन को स्वीकार नहीं किया। और आज भी रामपुर गांव में रह रहे हैं।  रामपुर से स्थापित किए गए परिवारों को मुआवजा वितरण में गंभीर असमानता सामने आई है।  विशेष कर आदिवासी समुदायों के साथ भेदभाव व्यवहार किया गया। अन्य समुदायों के परिवारों में मुआवजा केवल मुखिया को ही नहीं बल्कि उसके बेटों और बेटियों को भी अलग-अलग इकाइयों के रूप में दिया गया।  इसके विपरीत आदिवासी समुदाय के परिवारों को केवल एक इकाई मानकर सिर्फ परिवार के मुखिया को मुआवजा दिया गया चाहे उसे परिवार में कई विवाहित बेटे बेटियां या अलग-अलग परिवार इकाइयां क्यों न थी।  यह भेदभाव भूमि अधिकार और समानता के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है अतः इन परिवारों को सरकार द्वारा कोई मुआवजा या पुनर्वास सहायता प्रदान नहीं की गई।  इस स्थिति के कारण उक्त परिवार ना तो श्रीरामपुर जा सके और ना ही मूल स्थान रामपुर में किसी प्रकार की सुविधा प्राप्त हो सकी।  आज भी यह परिवार वहीं रह रहे हैं जहां मूलभूत सुविधाओं की कमी और सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा का वातावरण बना हुआ है। 

रामपुर में रह रहे आदिवासी समुदाय के जो परिवार आज भी किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं जिसके कारण उनके पेंशन प्रधानमंत्री आवास योजना, पीने के पानी की सुविधा, बरसात के समय कीचड़ से भरे रास्ते और आवश्यक वस्तुओं की खरीदी के लिए 20 किलोमीटर दूर बाजार जाने जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।  जनसंख्या कम होने के कारण ना तो वहां राशन दुकान है ना ही कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 20 किलोमीटर की परिधि में मौजूद है जिसे महिलाओं को विशेष रूप से कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।  साथ ही गांव में ना तो आंगनबाड़ी है और ना ही प्राथमिक विद्यालय इन समस्याओं के अंतर्गत ग्रामीण को वन विभाग के अधिकारियों के दबाव का भी सामना करना पड़ता है।  गांव के चारों ओर लगे बॉर्डर में वन में प्रवेश निषेध बताया गया है।  जिसके कारण ग्रामीणों को अन उपज लाने से रोका जाता है और यदि कोई व्यक्ति इसका उल्लंघन करता है तो उसे पर जुर्माना लगाया जाता है तथा जेल भेजने की धमकी दी जाती है। इसे भी अधिक चिंताजनक बातें है कि वन विभाग द्वारा व्यवस्थापन के पश्चात रामपुर गांव में छोड़े गए सरकारी भवन निवासियों और यहां तक की धार्मिक स्थलों को भी तोड़ दिया गया है।

पुनर्वास के कारण आदिवासी महिलाओं को होने वाली समस्याएं: 

जंगल से जुड़ाव का टूटना पुनर्वास के बाद महिलाओं का अपने पारंपरिक वनों से संपर्क कट गया जिसे उनकी पहचान और आत्म सम्मान पर सीधा प्रभाव पड़ा। वनों ऊपर से होने वाली आमदनी समाप्त हो गई पहले महिलाएं साल भर विशेष कर 6 महीना तक वन उपज महुआ, तेंदु कर हर बहरा इकट्ठा करके आर्थिक सहायता करती थी जो अब पूरी तरह बंद हो गया है।

संस्कृति और धार्मिक स्थलों से वंचित हो गए आदिवासी समाज के देवी देवता और पूजा स्थलों से महिलाओं का जुड़ा टूट गया जिससे उनकी संस्कृति आस्था को गहरा प्रभाव पड़ा है। 

पीने का पानी के स्रोत की कमी से महिलाओं को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है जिससे उनका समय और ऊर्जा दोनों खर्च होती है और बारिश के समय रास्ते में कीचड़ भरने से स्थिति और भी खराब हो जाती है। 

यौन हिंसा और सुरक्षा का बढ़ना जंगल या बाजार के लिए दूर जाने पर महिलाओं को सुरक्षा और उत्पीड़न का डर सताता है विशेष कर जब स्थानीय ढांचे में महिलाओं की सुरक्षा करने के लिए कोई प्रबंध नहीं किया गया है। 

पुनर्वसना मिलने के कारण हुई ना ही राशन वितरण और ना ही वृद्धा पेंशन जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पा रही है। व्यवस्थापन के बाद बच्चों के जाति और निवास प्रमाण पत्र बनने की समस्या रामपुर से व्यवस्थापित होकर श्रीरामपुर में पुनर्वास हुए परिवारों के स्कूली बच्चों को आज भी जाति प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हो पा रही है।  जिसके चलते बच्चे अपने आगे की पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे हैं ना ही कोई सरकारी लाभ ले पा रहे हैं। पुनर्वास स्थल पर राजस्व विभाग नक्शा, खसरा या वन विभाग द्वारा अभी तक b1 या खसरा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कर रहे हैं पुनर्वास अभी तक राजस्व रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है जिससे वहां स्थाई निवास का प्रमाण पत्र बता सके। 

रामपुर जैसे वन क्षेत्र में बसे आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से जंगल के भीतर ही जीवन यापन करते आ रहे थे। वन केवल वनों में निर्भर उपयोग करते थे बल्कि और उसमें रहने वाले वन जीव से प्राकृतिक रक्षक भी थे। उनके जीवन का ढांचा जंगल से जुड़ा था। भोजन ईंधन और दवा आवास और संस्कृति परंपराएं सब कुछ जंगल पर आधारित थी।  इन समुदायों को कोई रोक-टोक नहीं थी वह वन को क्षति पहुंच जाए बिना उसका संरक्षण करते हुए जीवन जीते थे। वास्तव में उन्होंने वन जीव और वृक्ष की रक्षा में भूमिका निभाई थी। लेकिन जब इन क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया तो आदिवासी समुदायों को अवैध कब्जेदार मान लिया गया और उनके ऊपर अनेक पाबंदियां लगा दी गई। इसके विपरीत सुरक्षित क्षेत्र घोषित होने के बाद वन विभाग के कुछ अधिकारियों की गतिविधियां भ्रष्टाचार और वन संपदा के दोहन से जुड़ गई। कई स्थानों पर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई चुप कर वन जीवन का शिकार और पर्यावरण संतुलन जैसे गंभीर आप सामने आई। जिन लोगों ने जंगल को बचाकर रखे उन्हें वहां से हटाया गया जबकि जिन पर संरक्षण की जिम्मेदारी थी वह स्वयं ही वन संसाधनों के दोहन में लग रहे हैं।

Author

  • मंजुलता, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में मंजु, दलित आदिवासी मंच के साथ जुड़कर जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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