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विश्व आदिवासी दिवस महोत्सव पर झारखण्ड की निर्मला जी के अनुभव 

निर्मला एक्का:

9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। विश्व आदिवासी दिवस, हम आदिवासी समुदाय के लिए बहुत  महत्वपूर्ण है जो समुदाय की अपनी संस्कृति, परंपरा,  पहचान और एकजुटता को दर्शाता है। जागरुक आदिवासी, महोत्सव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और अपने अधिकारों की मांग करते हैं। यह दिवस कि ज़रुरत है बाकी लोगों को जागरुक कराने की और एहसास दिलाने की।

कोरोना काल के बाद पिछ्ले 2023 से झारखंड के माननीय मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन के द्वारा पुराना जेल परिसर – बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान में भव्य आयोजन समारोह आयोजित किया जाता है। इसकी तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है। झारखंड के सभी ज़िलों के आदिवासी अपनी नृत्य मंडली, पारंपरिक वेशभूषा, खान-पान, जड़ी-बूटी, कंद-मूल, आदि कईं चीजों को लेकर आते हैं। 9 और 10 तारीख – इन दो दिनों में बहुत सारे प्रोग्राम होते हैं जैसे- नृत्य, संगीत, भाषण, आदिवासी व्यंजन प्रतियोगिता, आदि आयोजित होते हैं।

आदिवासी महोत्सव को मनाने के लिए असम, मनिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, महाराष्ट्र, राजस्थान, ओड़िशा, छतीसगढ़ राज्यों के आदिवासी भी अपनी नृत्य मंडली के साथ शामिल हुए थे।

विश्व आदिवासी महोत्सव में आदिवासी व्यंजन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए हमने भी पहली बार, आखिरी दिन, आखिरी समय में अपना आवेदन जमा किया था और मुझे स्टोल मिला और हमने भाग लिया। मैं एक छोटी सी फास्ट फूड की दुकान भी चलाती हूँ और दुकान पर मिलने वाले व्यंजनों में मडुवा का मोमो भी शामिल है।

इस प्रतियोगिता में जाने की मेरी एक ही सोच थी कि जो हम बचपन से खाते-पीते आ रहे हैं, उसी को पारंपरिक तरीके से पकाया जाए और खिलाया जाए। इसमें हमने  केकड़ा, छोटी मच्छली, बत्तख और देहाती चावल को चुना और उसी को अलग-अलग तरीकों से पकाया। जैसे केकड़ा की चटनी और पकौडा, बत्तख झोर, छोटी  मच्छली का झोर, चावल, छिलका रोटी। आयो अस्मा का एक थाली थी जो लोगों को बहुत पसंद आयी। इस थाली में से दो व्यंजन को प्रतियोगिता में रखना था, जिसमें हमने केकड़ा और छोटी मच्छली को रखा था। जो हमने पहले जमा की थी और लोगों की पसंद के आधार पर हमें दूसरा स्थान मिला। यह हमारे लिए बहुत गौरव की बात है और बेहद खुशी की बात है। इसके लिए मैं TRI को और झारखंड सरकार, श्री हेमंत सोरेन, माननीय मुख्यमंत्री जी की शुक्रगुजार हूँ। आशा है अपनी संस्कृति, परंपरा, पहचान को बचाने के लिए ऐसे प्रोग्राम होते रहने चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत सारे जीव जन्तु विलुप्त हो रहे हैं और लोगों में बीमारियां बढ़ रही हैं। मेरा मानना है पुराने चीजों और ज्ञान के प्रयोग से कुछ हद तक इसका निवारण हो सकता है।

विश्व आदिवासी महोत्सव में आये अलग-अलग समुदायों के लोगों से बात करने से पता चला की कहीं ना कहीं आदिवासीयों को उपेक्षित समझा जाता और सभी आदिवासी अपने हक और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं।

Author

  • निर्मला एक्का, मूलतः झारखण्ड के गुमला ज़िला के रायडीह प्रखंड स्थित गम्हरटोली से हैं। निर्मला ने सामाजिक कार्य साल 2000 में जनाधिकार मंच से शुरू किया। तत्पश्चात् 2012 से वे वीडियो वालेंटियर्स के साथ जुड़कर ग्रामीण संवाददाता के रूप में काम की हैं। कोविड के दौरान, 2020 से 2023 तक उन्होंने लेबर कन्ट्रोल रूम में फिया संस्था और सरकार के साथ मिलकर श्रम विभाग में काम किया व वर्तमान में निर्मला जावा नामक मंच में अपना योगदान दे रही हैं।

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