जेरोम जेराल्ड कुजूर:
वन विभाग / पलामू व्याघ्र परियोजना प्राधिकार ने यदि सही मायने में भारत सरकार द्वारा 2006 में गठित राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के अंतर्गत कोर जोन से ग्रामीणों के स्वेच्छिक पुनर्वासन हेतु निर्गत दिशा निर्देश का पालन करती तो शायद झारखंड में पुनर्वास का मिसाल कायम करती। परंतु पलामू व्याघ्र परियोजना / वन विभाग ने पलामू व्याघ्र परियोजना के अंतर्गत कोर जोन से ग्रामीणों के स्वेच्क्षिक पुनर्वासन का सुनहरा मौका खो दिया। अब पलामू व्याघ्र परियोजना के कोर जोन से स्वेच्क्षिक पुनर्वास को तैयार कूजरूम गाँव के आधे से अधिक लोग गाँव खाली करने को तैयार नहीं।
कूजरूम गाँव पलामू व्याघ्र परियोजना के तहत वन ग्राम है। इस गाँव में शतप्रतिशत अनुसूचित जन जाति एवं आदिम जन जाति के 56 परिवार के 315 लोग रहते हैं। इस परिस्थिति की जड़ें 2017 के वन विभाग (पलामू व्याघ्र परियोजना, दक्षिणी भाग) द्वारा निर्गत पत्र की ओर इंगित करती है, जिसे लातेहार ज़िले में स्थित 8 वन गाँव – लाटू, कुजरूम, रमनदाग, हेनार, विजयपुर, पंडरा, गुटवा और गोपखाड़ – के ‘ईको विकास समिति’ को भेजा गया था। इस पत्र में वन विभाग ने इन आठ गाँवों को विस्थापन एवं पुनर्वास हेतु प्रस्तावना भेजा था।
इस प्रस्तावना के तार भारत सरकार द्वारा बाघों के संरक्षण हेतु प्रयासों से जुड़े हैं। राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के अध्ययन के अनुसार, बाघों के लिए न्यूनतम 800-1000 वर्ग कि०मी० का कोर एरिया चाहिए, जो मनुष्यों के अतिक्रमण से परे हो। पलामू व्याघ्र परियोजना, जिसकी स्थापना केंद्र सरकार ने वर्ष 1974 में की थी, का कुल दायरा 1129.93 वर्ग कि०मी० है। वर्तमान में पलामू व्याघ्र आरक्षण के 414.08 वर्ग कि०मी० को कोर एरिया घोषित किया, जिसके अंतर्गत उपरोक्त 8 वन गाँव आते हैं। वन विभाग का पुनर्वास सम्बंधित प्रस्ताव इन 8 वन गाँव को कोर एरिया से हटाने का है।
एतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार इन 8 वन गाँवों को अंग्रेज़ी हुकूमत ने 1910-1920 के आसपास बसाया था। इन गाँवों के अधिकांश निवासी आदिवासी समुदाय से आते हैं। वर्ष 2006 में वन अधिकार क़ानून पारित होने के पश्चात इन सभी निवासियों के पास इस क्षेत्र में रहने का औपचारिक हक़ है। इन्होंने अपने-अपने गाँवों में रहने लायक घर, खेती लायक ज़मीन, परम्परा अनुसार सरना मसना स्थापना, बनाया है। इन क्षेत्रों में इनका निवास 100 वर्षों से ऊपर हो चला है।
इस बीच जब 2017 में वन विभाग द्वारा विस्थापन एवं पुनर्वास हेतु प्रस्तावना भेजा गया तो अधिकांश गाँवों ने इसका प्रत्यक्ष रूप से पुरज़ोर विरोध किया। हालाँकि, दो गाँव – लाटू और कुजरूम – ने वन विभाग के इस प्रस्ताव को बोझिल मन से स्वीकारा।
लाटू और कुजरूम, दोनो गाँव गारू प्रखंड के सुदूर वन क्षेत्र में बसे हैं। इन गाँवों तक न सड़क जाती और न ही बिजली। बारेसाड़ के मुख्य मार्ग तक आने के लिए इन ग्रामीणों को 6-13 कि०मी० का लम्बा सफ़र पैदल तय करना पड़ता है। बारिश के मौसम में इन गाँवों को जोड़ती कच्ची सड़क भी जवाब दे देती है। इन गाँवों में न तो उपचार केंद्र है और ना ही मोबाइल टावर; किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या के लिए मदद मिलना नामुमकिन सा प्रतीत होता है।
यह कहना उचित होगा की लाटू और कुजरूम के इस परिस्थिति का ज़िम्मेदार वन विभाग है। वन विभाग ने इन सुदूरवर्ती क्षेत्रों में विकास का कोई काम होने नहीं दिया है। चूँकि ये दोनो गाँव वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, अतएव यहाँ किसी भी प्रकार के विकास कार्य हेतु वन विभाग की अनुमति चाहिए होती है। परंतु, वन विभाग ने लोगों की जरूरतों को अनदेखा कर, वन्यजीवों की सुरक्षा की आड़ में, यहाँ किसी भी जन उपयोगी कार्य को आगे बढ़ने नहीं दिया। इस क्रम में वन विभाग शायद यह भूल गए की इंसान और प्रकृति को साथ चलना होता है, जो यहाँ रह रहे आदिवासियों के मूल में है।
वन विभाग द्वारा इन गाँवों में ऐसी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ बनाई गयी, जहाँ लोग खुद गाँव छोड़कर जाने के लिए व्याकुल हो उठे।
इसके अतिरिक्त, चूँकि ये दोनो गाँव वन क्षेत्र में हैं, जिसके परिणाम स्वरूप लोगों के पास खतियानी दस्तावेज़ ना होकर वन पट्टा है। खतियानी दस्तावेज़ ना होने के कारण यहाँ पर निवास कर रहे आदिवासियों को राज्य सरकार ने जनजातीय प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं कराया है और नहीं इन्हें झारखंड के स्थाई निवासी होने का प्रमाण पत्र ही प्राप्त है। जिसके कारण यहाँ के लोग राज्य एवं केंद्र सरकार की कई सारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं।
2017 के पुनर्वास प्रस्तावना के पीछे, एक तरफ़ वन विभाग द्वारा संरचित परिस्थितियाँ थी, तो दूसरी तरफ़ वन विभाग द्वारा गाँव वालों को किए गए अनौपचारिक वादे थे। वन अधिकारियों ने न केवल पक्के मकान, अच्छी शिक्षा एवं उज्जवल भविष्य का सपना दिखाया, वरन लोगों को जाति प्रमाण पत्र और झारखंड के स्थाई प्रमाण पत्र तक दिलाने का वादा कर डाला। इस संदर्भ में लाटू और कुजरूम के लोगों ने बोझिल मन से अपने घर छोड़ने के लिए हामी भर दी।
वन विभाग द्वारा प्रस्तावित पुनर्वास राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के दिशानिर्देश अनुसार होने थे। इन निर्देशों के अनुरूप लाटू और कुजरूम निवासियों को दो विकल्प दिए गए। पहले विकल्प के अंतर्गत लोग 10 लाख का मुवायजा लेकर अपने घरों से विस्थापित हो जाएँगे, और अपने पुनर्वासन की ज़िम्मेदारी वे ख़ुद उठाएँगे। इस विकल्प के तहत, 10 लाख की राशि देने के पश्चात, वन विभाग की पुनर्वास के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी। झारखंड राज्य सरकार ने प्रथम विकल्प को और आकर्षित बनाने हेतु इसमें 5 लाख की अतिरिक्त राशि जोड़ दी। आसान शब्दों में, लोग 15 लाख लेकर अपने घर से बेदख़ल हो जाएँ, और अपने पुनर्वास की व्यवस्था खुद करें।
दूसरे विकल्प में यह कहा गया कि समुचित 10 लाख की राशि लोगों को ना देकर, वन विभाग उनके पुनर्वास से सम्बंधित कार्य करेगी। इस कार्य के तहत, वन विभाग लोगों को 5 एकड़ ज़मीन दिलाएगी, खतियानी हक़ दिलाएगी, उनके लिए मकान बनवाएगी, और सामूहिक सुविधाएँ (जैसे की सड़क, पेयजल, शौचालय, मोबाइल, बिजली इत्यादि) उपलब्ध कराएगी।
इन विकल्पों का अध्ययन करने के बाद, कुजरूम गाँव के 120 परिवारों में से 70 परिवार ने दूसरे विकल्प को चुना, वहीं लाटू गाँव के 90 परिवारों में से 57 परिवार ने दूसरे विकल्प को चुना। कुजरूम गाँववालों की सहमति से उनके विस्थापन की जगह लाई-पैलापत्थल में चुना गया, जो की एक आरक्षित वन भूमि है। लाटू गाँववालों के लिए विस्थापन की जगह पोलपोल में चुना गया; हालाँकि इस चिन्हित जगह पर लोगों की सहमति नहीं बन पाई थी, जिसे वन विभाग ने नज़रंदाज कर दिया। आज भी लाटू गाँव के लोग पोलपोल जाना नहीं चाहते। अब तो लाटू के ग्रामीणों ने गाँव छोड़ने से साफ इनकार कर दिया है।
राष्ट्रीय व्याघ्र संरक्षण प्राधिकार के निर्देशानुआर, वन विभाग ने लाई-पैलापत्थर में 70 परिवारों के लिए 350 एकड़ (सामूहिक सुविधाएँ हेतु अतिरिक्त 65 एकड़), और पोलपोल में 57 परिवारों के लिए 285 एकड़ (सामूहिक सुविधाएँ हेतु अतिरिक्त 48 एकड़, अनुमानित) ज़मीन मुहैया कराने की अनुसंशा की।
सामूहिक सुविधाओं के लिए जो अतिरिक्त भूमि मुहैया करायी जा रही है, वह झारखंड पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति 2008 के अधीन है। इस नीति के तहत अगर पुनर्स्थापित क्षेत्र का दायरा 250 एकड़ से ज़्यादा होता है, तो सामूहिक सुविधाएँ मुहैया कराना अनिवार्य होगा। अतएव, लाटू और कुजरूम से पुनर्वासित हो रहे लोगों के लिए (जिन्होंने दूसरे विकल्प को चुना है) सामूहिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना वन विभाग की ज़िम्मेदारी बनती है।
ये सभी प्रक्रिया क़ानूनी विधि के अनुरूप की जा रही है, जिसका व्याख्यान ख़ुद वन विभाग अपने पत्राचार, जो की केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को सम्बोधित था (दिनांक 1/04/2022), में किया है। इस पत्राचार में राज्य वन विभाग ये स्पष्ट करता है कि पुनर्वास हेतु जो ज़मीन मुहैया करायी जा रही है, उसका कुल क्षेत्र (क़रीबन 750 एकड़) खाली करायी जा रही ज़मीन के कुल क्षेत्र (क़रीबन 827 एकड़) से कम है; अतः यह पुनर्वास पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देश (दिनांक 22/05/2019) का अनुपालन करता है।
अगर आंकलन किया जाए तो वन विभाग अपनी सामूहिक सुविधाएँ (बिजली, पेयजल इत्यादि) उपलब्ध करने की ज़िम्मेदारियों से भी बचता फिर रहा है। झारखंड पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति 2008 के अनुसार यह जिम्मेदारियाँ तभी लागू होती हैं जब पुनर्स्थापित क्षेत्र का दायरा 250 एकड़ से ज़्यादा हो। परंतु, वन विभाग द्वारा वन पट्टा के समकक्ष पुनर्स्थापित ज़मीन मुहैया कराना, कुल पुनर्स्थापित क्षेत्र की सीमा को 250 एकड़ से कम पर ले आता है।
ऐसी परिस्थिति में वन विभाग न केवल अपने वादों से मुकरता दिख रहा है, परंतु क़ानूनी विधि की भी अवहेलना कर रहा है। ऐसे में लाटू और कुजरूम के ग़रीब आदिवासी पिसते दिख रहे हैं, जिन्हें हर दिन एक नया सपना दिखाया जाता, और दूसरे दिन उस सपने को तोड़ दिया जाता है।
आज के समय में 56 परिवार में से 23 परिवार पलामू जिले के पोलपोल गाँव में पुनर्वास हेतु जा चुके हैं। बाकी 33 परिवार का कहना है की हमने शुरू में ही स्थल निरीक्षण के समय पोलपोल जाने से मना किया था। कुजूरूम गाँव के लोगों को पोलपोल गाँव जाने से इनकार करने पर वन विभाग उन्हे लातेहार जिले के लाई और पाइला पत्थर गाँव में बसाने की बात कही, जहाँ गाँव वाले तैयार हो गए। जैसे-जैसे पुनर्वास का समय नज़दीक आता गया, वन विभाग का दोहरा चरित्र देखने को मिला।
कुछ दिनो पूर्व, वन विभाग ने विकल्पों को दरकीनार करते हुए, वन अधिकारी कुजरूम के ग्रामीणों को, पर्यावरण मंत्रालय के 2019 के दिशानिर्देश का ग़लत हवाला देते हुए, यह कह रहे हैं कि उनकी पुनर्स्थापित ज़मीन 5 एकड़ ना होकर केवल उतनी ही मिलेगी जितना उनका तत्कालीन वन पट्टा है। यह बात स्पष्ट करनी ज़रूरी है कि वन पट्टा में उल्लिखित भूमि, माँगी गई भूमि से अक्सर कम रहती है। ऐसा वन विभाग इस लिए कर रही थी कि कूजरूम के लोगों के साथ ही गारु प्रखण्ड के ही एक गाँव जयगीर को भी वहाँ बसाया जा सके। इस बीच वन विभाग ने जयगीर गाँव के लोगों को वहाँ बुला भी लिया। जिसका कूजरूम गाँव के लोगों ने विरोध किया। बाद के समय में लाई और पाइला पत्थर गाँव के लोगों ने भी अपने इलाके में लोगों बसाने की बात से साफ इनकार कर दिया।
अप्रैल माह 2024 से पोलपोल गाँव में पुनर्वास का कार्य परंभ किया गया।
आज कूजरूम गाँव के 23 परिवार पोलपोल गाँव में पुनर्वासित होने के लिए जा चुके हैं। वन विभाग उनके लिए आवास का निर्माण भी कर रही है। आवास के साथ ही उन्हे 5 एकड़ जमीन का कागजाद मिला या नहीं इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। 33 परिवार जो गाँव में ही बसा है उनका कहना है की वन विभाग को हमने लाई और पाइला पत्थर में बसने की सहमति दी थी। अब वन विभाग मनमानी कर रहा है। इस लिए हम लोग गाँव छोड़ कर नहीं जाएंगे। गाँव वालों का कहना है की हम पाँचवीं अनुसूची के अंतरगर्त आने वाले गाँव में ही बसने को तैयार है। बशर्त वन विभाग सही तरीके से काम करे। पहले हमे विश्वास में ले। हमें पहले जमीन दिखाए और हमारे नाम पर जमीन का ऑन लाइन रसीद कटवाए। हम पुनर्वासित होना चाहते हैं।
इसी बीच एक और खबर सामने आई कि कूजरूम गाँव के एको विकास समिति के बैंक खाते में 32 लाख रुपये जमा थे जिसे एको विकास समिति के अध्यक्ष और सचिव ने उस खाते से 28 लाख रुपये निकाल लिए। आप को बताते चलें कि एको विकास समिति में अध्यक्ष गाँव का एवं सचिव वनपाल होता है। एको विकास समिति के फंड को ग्रामसभा की स्वीकृति के बाद अध्यक्ष और सचिव के हस्ताक्षर के बाद निकासी की जा सकती है। ग्रामीणों का कहना है कि ग्राम सभा के बिना सहमति के ही पैसे की निकासी की गई है और उस पैसे से एक ट्रैक्टर भी खरीद लिया गया है।
अब वन विभाग कूजरूम के 33 परिवार सशर्त पुनर्वास की मांग करने पर पुनर्वास हेतु आवंटित राशि को सरकार को वापस करते हुए समर्पित करने की बात कर रही है।

