सुनील चौहान:
(यह लेख़क के अपने विचार हैं।)
“क्या मरना ही एक रास्ता है??”
“क्या मरना ही एक रास्ता हैं??” इस दौर का प्यार बहुत ही अजीब है। इस प्यार में न जाने कितनी ही जिंदगियां दम तोड़ देती हैं। क्या प्यार में मरना ही एक रास्ता है? कभी सोचा है माता-पिता पर क्या गुजरेंगी? आज मैं इसी विषय पर बात करने वाला हूँ।
वर्तमान समय में फिल्मों, टीवी सीरियलों, सोशल मीडिया, मोबाईल आदि के कारण है स्कूल से स्नातक तक के उम्र के लड़को – लड़कियों में प्यार का बुख़ार जोरों शोरों से चढ़ रहा है। एक इंसान से दो दिन मिले हुए नहीं और उनमें प्यार हो जाता हैं। असल में कहा जाये तो उन्हें प्यार का मतलब ही पता नहीं है, नादानी में आकर्षण को ही प्यार समझ लेते हैं और जब बात आती है शादी की तब परिवार और समाज ‘जाति’ देखता है क्योंकि समाज ने अपनी जाति से दूसरी जाति में शादी करने को अभी तक मान्यता नहीं दी है। लेकिन वर्तमान में कुछ परिवारो ने मान्यता दे रहे हैं।
शादी के लिए आज कल के युवा – युवतियां अपने माता – पिता, परिवार और समाज के खिलाफ हो जाते हैं। जब बात ना बने तो भाग जाना, फांसी लगा लेना, नदी में कूद जाना और ज़हर पी लेना आदि रास्ते अपना लेते हैं। पल भर के लिए भी अपने माता-पिता के बारे में नहीं सोचते हैं, जिन्होंने बचपन से लेकर आज तक पढ़ा-लिखा कर बड़ा किया, अब तक की सारी ख़्वाहिशें पूरी की हैं I इस तरह के कदम उठा लेने से उन पर क्या गुजरेगी। यह कहते हुए बहुत ही दुख होता है कि माता – पिता के लिए कभी किसी ने जान नहीं दी, लेकिन कल आयी लड़की या लड़के के लिए जान दे देते है।
मैं जिस क्षेत्र से आता हूँ वहां एक माह के अंदर ही महज़ तीन से चार जिंदगियों ने दम तोड़ दिया, जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता था। इन चारों में से भी एक मोटा आंकड़ा कहूँ तो, दो जिंदगियों ने तो शत-प्रतिशत प्यार में ही दम तोड़ दिया। किसी का बुढ़ापे का सहारा छिन गया, किसी की घर की लक्ष्मी छिन गई। न जाने ऐसी कितनी ही अनगिनत ज़िंदगियाँ दम तोड़ देती हैं। दो दिन होते नहीं मिले हुए और नादानी में मरने का रास्ता अपना लेते हैं। इस तरह के कदम उठाने से तो अच्छा है अपने माता-पिता को मनाया जाये, क्या पता वह मान ही जाए ।
मुझे मेरी दादी जी की कुछ बातें याद आती हैं I वह कहती थी कि हमारे ज़माने में यह सब कहाँ होता था जैसे मिलना – मिलाना, देखना-दिखाना एवं पूछना-पूछाना आदि। पहले तो एक-दूसरे को देखे और जाने बगैर ही घर वाले शादी कर देते थे और फिर भी इस रिश्ते से दोनो खुश होते थे, उन में उतना ही प्यार और विश्वास रहता था। लेकिन अब तो पहले जैसा कुछ भी नहीं रहा, सब कुछ बदल गया हैं I लड़के – लड़कियों से उनकी पसंद, नापसंद पूछी जाती हैं।
मुझे लगता है कि यदि आपको कोई पसंद है भी तो घर वालों को मनाना चाहिए ना कि मरने का रास्ता अपना लेना चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों की खुशी से बढ़कर और कुछ भी नहीं चाहिए। कभी ना कभी तो मान ही जाएंगे। अगर नहीं भी मानते हैं तो घर वालों की मर्जी से शादी कर लेना चाहिए, इसी में ही सभी की भलाई है। क्योंकि माता पिता अपने बच्चों का कभी भी बुरा नहीं चाहेंगे, उनका सदैव अच्छा ही चाहेंगे।
अंततः मैं एक समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं समझूंगा कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं हैं I समाज द्वारा जो मान्यताएं स्वीकृत है उनसे अलग होकर यदि मनुष्य कोई भी कार्य करेगा तो समाज उसे बहिष्कृत या तिरस्कार कर देगा। इतिहास के पन्नों को झांकने पर मुझे सुकरात का उदाहरण याद आता है I जी हाँ मैं उस महान दार्शनिक सुकरात की बात कर रहा हूँ जिससे आप भली-भांति परिचित हैं जिसके विचार समाज से बिल्कुल ही अलग थे I वह सामाज की किसी भी मान्यता को नहीं मानते थे और उसका परिणाम यह हुआ कि समाज ने उसका बहिष्कार कर दिया गया अर्थात ज़हर का प्याला पिला दिया। इसी तरह माता-पिता को अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और समाज का डर है इसीलिए नए रिश्ते को मान्यता नहीं देते हैं लेकिन हमें उन्हें मनाना चाहिए। कभी ना कभी तो मान ही जाएंगे।
लेकिन यह भी सच है कि आज साड़ी दुनिया सुकरात का नाम जानती है और उनको लिखी बातों को विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। शायद उस समय समाज सुकरात की बातों के लिए तैयार नहीं था। इसी तरह शायद हमारा समाज इस बदलाव के लिए तैयार नहीं है। युवा यदि समाज की रीतियों से अलग जाकर कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें समाज को समझाने की कोशिश करनी चाहिए। संविधान के उदाहरण से भी समझाया जा सकता है। भाग जाना, फांसी लगा लेना, नदी में कूद जाना और ज़हर पी लेने जैसे रास्ते नहीं ने चाहिए।

