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महिला संगठन ने दबंगों की दादागिरी को ख़त्म किया 

मंजूलता:

पिलवापाली ग्राम पंचायत के ग्राम भिरहा दीपा गाँव की कुल जनसंख्या 900 है। इसमें से 50 घर ऐसे हैं जिसमें सतनामी, आदिवासी और अगरिया समुदाय के लोग रहते हैं। गाँव के सतनामी और आदिवासी लोग खेती-किसानी, मज़दूरी के काम करते हैं। अगरिया जाति के लोग ज़मीन पर ज़्यादा ध्यान देते हैं।  जैसे कि अगर आदिवासी या दलित लोगों की ज़मीन, उनकी जमीन के पास है तो अरिगया लोग आदिवासियों को बड़े-बड़े सपने दिखाते हैं। फिर हम लोग इन बातों को सही समझ कर उनकी बातों में आ जाते हैं और अपनी ज़मीन या घर, जो भी रहता है उनके पास गिरवी रख देते हैं। वे लोग हमें पूरा पैसा एक साथ नहीं देते हैं, थोड़ा-थोड़ा कर के देते हैं। 5 हज़ार देते हैं तो उसको 50 हज़ार लिखते हैं। समय बीतने पर आदिवासी लोग भूल भी जाते हैं और वे लोग लिखा हुआ दिखाते हैं। फिर कर्जा चुका नही पाते हैं तो अगरिया लोग ज़मीन अपने नाम करवा लेते हैं। उसमे भी एक एकड़ जमीन लेते हैं और रजिस्ट्री करवाने के टाइम अगल-बगल के ज़मीन को भी उसी में रजिस्ट्री करवा लेते हैं।

यहाँ तक कि स्कूल की जो ज़मीन थी उसको भी अपने नाम करवा लिए हैं। अगर कोई कुछ बोलते हैं तो उनकी बहू बेटियों के साथ कुछ ना कुछ गलत व्यवहार करते हैं। यह एक सच्ची घटना है आँखों देखी, अभी-अभी की। अभी कुछ महीने पहले जब पता चला कि स्कूल की बची हुई ज़मीन किसी एक व्यक्ति के नाम में करवा लिया गया है तो गाँव वालों ने बैठक रख के उनको बोला तो उन लोगों ने गाँव वालों से कहा  कि आपको जो करना है कर लो मैं किसी से नहीं डरता हूं।  फिर कुछ दिन बाद में एक साहू समाज के लड़के को एक आदिवासी महिला के घर भेज दिया और महिला के हाथ पकड़ के छेड़खानी करवाया गया था। 

अभी का हाल यह है कि अगरिया समाज के एक व्यक्ति ने, जो गाँव के पटेल भी हैं, गाँव में तहलका मचा कर रखा है। आदिवासी और सतनामी समुदाय की ज़मीन को भी अपना बताते हैं और अपने हिसाब से गाँव को चलाना चाहते हैं। यहाँ तक कि वो बीच रोड में ही अपना घर बना रहे थे। गाँव वाले जब मना किये तो उनके साथ मारपीट तक किया। गाँव वाले जब थाना में रिपोर्ट लिखवाने गये तो पुलिस ने भी कोई कार्रवाई नहीं करी और ना ही रिपोर्ट लिखी। कई बार गाँव वाले थाने में रिपोर्ट लिखाने गये लेकिन कभी भी कोई कार्रवाई नहीं किया गया बल्कि गाँव वालों को ही दबाव देते थे पुलिस वाले। उस पटेल ने सभी सम्बंधित अधिकारियों को भी पैसे में खरीद लिया था। कई बार उस अगरिया पटेल के नाम में रिपोर्ट लिखवाई लेकिन कभी भी कोई कार्रवाई नहीं की। 

आदिवासियों को कलेक्टर ऑफिस में शिकायत करने जाने से रोकने के लिए आगरिया लोग वहाँ जाकर बैठ गए।

तब गाँव वालों ने एक बैठक बुलाई और इस बात पर गहन चर्चा करी। सबने सुझाव दिया की इस परेशानी का हल ग्राम सभा में ढूंढना चाहिए। ग्राम सभा आयोजित कर इस बात को उठाया और चर्चा करी। ग्राम सभा ने एकमत से सहमती दिखाई कि हम सब महिला-पुरुष एकजुट होकर पटेल की दबंगई से मुक्ति पाने के लिए हल ढूंढेंगे और अब कहीं रिपोर्ट लिखवाने नहीं जायेंगे। हर घर से एक-एक महिला और पुरुष इकट्ठा होंगे। जिस जगह में पटेल अपना घर बना रहा था, उस जगह पर एक सरकारी स्कूल भी है, पहली से लेकर पांचवी तक। उस पटेल ने यहाँ तक की उन दोनों ही जगह का नक्शा भी बनवा लिया था, पटवारी को पैसा देकर।

तब गाँव के सभी महिला-पुरुष एक जगह इकट्ठा हुए, जहाँ पर वो अगरिया पटेल अपना घर बना रहा था और सभी ने उसके घर को तोड़ दिया। इस घटना के बाद जब पुलिस आयी, तब उन्होंने पटेल का साथ देते हुए कहा कि आप गाँव वालों ने कानून को अपने हाथ में लेकर ये गलत किया है। तब गाँव वाले अधिकारीयों से नाराज़ होते हुए अपनी लाचारी सुनाई। वह उनको स्पष्टता से याद दिलाये कि वे कई बार पुलिस सहयोग की मदद मांगने उनके दरवाजे आये पर हर बार न तो कोई रिपोर्ट दर्ज की गयी और न ही कोई कार्रवाई शुरू की गयी। बल्कि हर बारी हमको धमका कर वहाँ से भगा दिये। जिसके बुलाने (पटेल की ओर इशारे करते हुए) पर आप आए हो, और उससे घूस लेते हो, आप उसके पास जाओ वरना आप भी सोच लीजिये कि हम भी अपना सत्याग्रह शुरू कर देंगे। इतना बोलकर सभी महिलाएँ एक-एक डंडा पकड़कर खड़े हो गए। 

ऐसा माहौल देख कर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करी और वहाँ से चली गयी। तब जाकर उस अगरिया पटेल को थोड़ा डर हुआ और स्कूल और रोड पर अपनी दबंगई जताना छोड़ा। तब से भिरहा दीपा गाँव की महिलाएँ और पुरुषों को अपने अधिकारों व एकजुटता का एहसास हुआ। संगठन और एक अकेला के संघर्ष में क्या फर्क होता है ये भी अच्छे से महसूस हुआ। तब से भिरहा दीपा गाँव के सभी परिवार, संगठन बनाकर ही रहते हैं। जहाँ भी किसी चीज की ज़रूरत पड़ती है या समस्या आती है, तो सभी महिलाएँ इकट्ठा हो जाती हैं और एक आदर्श ग्राम बनाने के प्रयासों में जुटी हुयी हैं और अब अपने गाँव को क्षेत्र के संगठन – दलित आदिवासी मंच के साथ जोड़ने का पहल कर रही हैं। इसीलिये आज की स्थिति में भी अगरिया लोगों की दबंगई बहुत कम हो गई है। 

यह इसीलिए संभव हो सका क्योंकि पिलवापाली पंचायत में जब से दलित आदिवासी मंच का संगठन बना है तब से महिलाएँ घर से निकल कर ग्राम सभा तक जा रही हैं और गाँव के लोग महिलाओं के निर्णय को मान्य कर रहे हैं। महिलाएँ एकता बना कर रखी हैं। पिलवा पाली में कहीं भी अगरिया लोग कुछ दादागिरी करने लगते हैं तो महिलाएँ, पुरुषों से पहले निकलती हैं। महिलाओं की ताकत ज़िन्दाबाद।

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  • मंजुलता, छत्तीसगढ़ के महासमुंद ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वर्तमान में मंजु, दलित आदिवासी मंच के साथ जुड़कर जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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