रिया और राजू:
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 पर लेख की सीरीज के भाग-1[1] में हमने, इस अधिनियम का उद्देश्य, यह अधिनियम किन सामाजिक परिस्थितियों में लाया गया, इस अधिनियम के तहत कौन से कृत्य को अपराधों की श्रेणी में रखा गया है और इन अपराधों के लिया क्या सजा का प्रावधान है, इसके बारे में चर्चा किया था। भाग-2[2] में हमने दलितों और आदिवासीयों पर किये गए अपराधों में कानूनी कार्यवाही, शिकायत करने की प्रक्रिया और जमानत से संबंधित प्रावधानों के बारे में चर्चा किया था।
लेख की सीरीज के इस अंतिम भाग-3 में हम इस अधिनियम के तहत मुआवजे और इस अधिनियम में कमियों पर चर्चा करेंगे।
मुआवजे के प्रावधान –
इस अधिनियम के तहत अधिकांश अपराधों के लिए मुआवजा तीन चरणों में वितरित किया जाता है-
- पहला, एफ.आई.आर. दर्ज करने पर,
- दूसरा आरोप पत्र प्रस्तुत करने पर और
- तीसरा दोष सिद्ध होने पर।
हत्या जैसे कुछ मामलों में, केवल दो चरणों में मुआवजा वितरित किया जाता है पहला पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर 50% मुआवजा और दूसरा आरोप पत्र प्रस्तुत करने पर 50% मुआवजा।
इसके अलावा यह अधिनियम विभिन्न अपराधों के लिए मुआवजा भी निर्धारित करता है, और न्यूनतम राशि का प्रावधान करता है। जो कि इस अधिनियम के तहत बनाये गए नियम की अनुसूची में दिया गया है। इसके अलावा पीड़ित को उसकी तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एफ.आई.आर. पंजीकरण के सात दिनों के भीतर मुआवजा देने का भी प्रावधान है।
कानून की कमियां –
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, इस अधिनियम के तहत दर्ज अपराधों में वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2020 में 9.4% तक दलित समुदाय के खिलाफ और 9.3% तक आदिवासी समुदाय के खिलाफ अपराधों में वृद्धि देखी गई। और वर्ष 2020 की तुलना में वर्ष 2021 में दलित समुदाय के खिलाफ अपराध में 1.2% और आदिवासी समुदाय के खिलाफ 6.4% की वृद्धि हुई है।
इस अधिनियम में, आंकड़ो के अनुसार दोषसिद्धि की दर लगभग 25 फीसदी ही है। जबकि आरोपी की दोषमुक्ति की दर लगभग 75% है।
इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए हमारे मन में कुछ सवाल उठना वाजिब है, जैसे कि इतना सख्त कानून होने के बावजूद भी इन समुदायों के खिलाफ अपराध क्यों बढ़ रहे है? दोषसिद्धि की दर इतनी कम क्यों हैं? और दोषमुक्ति की दर इतनी ज़्यादा क्यों हैं? क्या यह आंकड़े इस अधिनियम को लागू करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करते हैं? सरकार इन परिस्थितियों से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है? अगर यह अपराध सिर्फ जातिवाद की वजह से हो रहे हैं तो राज्य और समाज इस ओर क्या कदम उठा रहे हैं?
दलित और आदिवासी समुदाय के सदस्यों पर अत्याचार होने पर प्रारंभिक शिकायतें दर्ज न कराने के लिए उन पर दबाव डाला जाता है। उन्हें अक्सर घटना के बारे में न बोलने के लिए धमकाया जाता है। अक्सर, पुलिस अधिकारी पीड़ितों की शिकायत लिखने और इस अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने से इनकार कर देते हैं। अगर मामला किसी तरह इस अधिनियम के तहत दर्ज हो भी जाता है, तो अक्सर पुलिस उचित धाराओं के तहत मामला दर्ज नहीं करती है और न आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करती है।
इस अधिनियम की कुछ कमियां इस प्रकार हैं-
- अधिनियम की धारा 14 में यह प्रावधान है कि, यथासंभव, आरोप पत्र दाखिल होने के 60 दिनों के भीतर मुकदमा पूरा हो जाना चाहिए लेकिन हकीकत कुछ और ही है। त्वरित विचारण के इस प्रावधान के बावजूद भी पीड़ित को न्याय मिलने और निर्णय आने में सालों लग जाते हैं।
- पुलिस अक्सर इस अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर जोर देती है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम यूपी सरकार के मामले में कहा कि जब जानकारी संज्ञेय अपराध के घटित होने का खुलासा करती है तो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 के अनुसार रिपोर्ट दर्ज करने के लिए जानकारी की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए एफआईआर दर्ज करने के चरण पर जाति का प्रमाण पत्र आवश्यक नहीं है।
- मानव अधिकार शोध संस्थान, चेन्नई[3] ने इस अधिनियम की क्रियान्वयन के बारे में एक शोध में पाया कि जब किसी दलित या आदिवासी समुदाय के सदस्य के खिलाफ अपराध किया जाता है तो पुलिस ने भारतीय दंड संहिता के तहत शिकायतें दर्ज की हैं, लेकिन इस अत्याचार निवारण अधिनियम की सम्बंधित धाराओं को शामिल करने से इनकार कर दिया है। अगर कभी दर्ज कर भी दिया जाता है तो गलत धाराओं का प्रयोग किया जाता है। ऐसी स्थिति में, मानव अधिकार के मुद्दों पर काम करने वाले संस्थानों के हस्तक्षेप करने के बाद उचित धाराओं को रिपोर्ट में शामिल किया जाता है।
- मुआवजे के वितरण के सम्बन्ध में इस अधिनिम के तहत बनाये गए नियम 12(4) में कहा गया कि पीड़ितों को उनकी तत्काल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एफआईआर पंजीकरण के सात दिनों के भीतर मुआवजा मिलना चाहिए। और मुआवजा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार मुकदमे के विभिन्न चरणों में मिलना चाहिए मानव अधिकार शोध संस्थान, चेन्नई ने अपनी शोध में पाया कि तत्काल मुआवजे के लिए भी कभी कभी 6-7 महीनों तक भी इंताजर करना पड़ता है।
- मानव अधिकार शोध संस्थान, चेन्नई ने अपनी शोध में यह भी पाया कि ज्यादातर पुलिस स्टेशन न तो महिलाओं के प्रति संवेदनशील हैं और जब दलितों जैसे हाशिये पर रहने वाले समुदायों की बात आती है, तो पुलिस का व्यवहार उनके प्रति काफी असंवेदनशील और निराशाजनक होता है।
- हमारे समाज में जातिगत भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी होने के कारण कानूनी कार्रवाई के दौरान पीड़ितों को समाज के प्रभावी लोगो से काफी दबाव का सामना करना पड़ता है। यह प्रभाव कई बार पीड़ित को अदालत से बाहर समझौता करने के लिए मजबूर करता है और कई बार गवाहों को अदालत में गवाही देने से रोकता है।
- ज्यादातर मामलों में जो व्यक्ति पीड़ित है और जिसके खिलाफ अपराध हुआ है वो व्यक्ति अगर किसी सामाजिक और राजनैतिक रूप से प्रभावी व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने की हिम्मत जुटा पाता है तो तथाकथित उच्च जाति के लोगों द्वारा उसका सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार कर दिया जाता है इस वजह से भी कई सारे मामले दर्ज ही नहीं होते हैं।
- ऐसे दलित और आदिवासी क्षेत्र जहाँ पर इन समुदायों के सदस्यों पर अत्याचार होने की ज़्यादा सम्भावना है ऐसे क्षेत्रों में कोई अतिरिक्त सुरक्षा के उपाय नहीं होते और न ही इन क्षेत्रों में कोई विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है। ऐसी स्थिति में यह क्षेत्र अधिक अत्याचार संभावित क्षेत्र बन जाते हैं।
- सामान्यतया विभिन्न संस्थान और सरकारी निकाय हमेशा से शोषित वर्गों को उनके अधिकारों और विभिन्न क़ानूनी प्रावधानों के बारे में जागरूक करने पर ज़्यादा जोर देते है लेकिन शोषक वर्ग जो अत्याचार करता है, उनको क्या नहीं करना चाहिए इसके बारे में जागरूक नहीं करते हैं। यह एक बहुत बड़ी कमी है जो हमे नज़र आती है।
आगे का रास्ता –
इसलिए, ऐसे में हम सभी लोगों का यह दायित्व बनता है कि इस कानून के प्रावधानों के बारे में न केवल पीड़ित वर्ग बल्कि अत्याचार करने वाले वर्गों को जागरूक करें और पीड़ित के साथ खड़े होकर अन्याय के विरुद्ध लड़ने में उसका सहयोग करें और सामाजिक न्याय की इस लड़ाई को आगे ले जाने में अपना सहयोग दें।
खुद का और अपनों का ख़याल रखिये।
जय भीम!! जय जोहार !!
फीचर्ड फोटो आभार: गीक्स फॉर गीक्स
[3] https://www.cvmc.in/wp-content/uploads/2022/10/30-Years-review-2020-English.pdf

