विकास कुमार:
“मुझे महसूस होता है कि मेरे हाथों में खून हैं।” यह शब्द परमाणु बम के पिता कहे जाने वाले वैज्ञानिक ओपनहाइमर के थे, जब वो जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराए जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन से व्हाइट हाउस में मिलने गए थे।
दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी के तानाशाह हिटलर के बढ़ते फासीवाद से मुकाबले करने के मकसद से अमेरिका ने परमाणु बम निर्माण कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसे मेनहट्टन प्रोजेक्ट भी कहा जाता था। इस प्रोजेक्ट के नेतृत्व में अमेरिका में थ्योरेटिकल न्यूक्लियर फिजिक्स के सबसे बड़े चेहरे ओपनहाइमर थे। हिटलर की मौत के बाद भी अमेरिका परमाणु हथियार बनाने से पीछे नहीं हटा, क्योंकि जापान ने अब तक आत्मसमर्पण नहीं किया था। 1945 में सफल परमाणु परीक्षण के तुरंत बाद अमेरीकी सरकार ने जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासिका में परमाणु बम गिराए, जिसमें लाखों लोगों की मौत हो हुई थी। इसके बाद हुए हृदय परिवर्तन के कारण ओपनहाइमर, अमेरिकी सरकार द्वारा परमाणु हथियार कार्यक्रम को जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन अमेरिका, सोवियत यूनियन से हथियार की दौड़ में आगे निकलने की होड़ में हाइड्रोजन बॉम्ब बनाना चाहता था। ऐसे में शांति का संदेश देने वाले ओपनहाइमर को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना जाने लगा। ओपनहाइमर का देशप्रेम सवालों में कठघरे में आ गया। बाद में उनके करीबी लोग ही उन पर वामपंथ परस्त होने के आरोप लगाते हुए सोवियत यूनियन से उनके तार जोड़ते हुए उनके खिलाफ मुकदमा कर देते हैं।
विश्व विख्यात अमेरिकी फिल्म निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन की नई फिल्म “ओपनहाइमर” इस नामी वैज्ञानिक के निजी एवं सार्वजनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है। परमाणु परिक्षण से पहले, उस दौरान और उसके बाद, उनके मनोवैज्ञानिक और नैतिक उलझनों को परखने की कोशिश करती है। विज्ञान और राजनीति के बीच गठजोड़ और उससे मानवता के लिए दूरगामी परिणाम को सामने लाती है।
कैंब्रिज में छात्र से लेकर अमरीका के सबसे ताकतवर इंसान बनने का सफर
फिल्म की शुरुआत में ओपनहाइमर के प्रारंभिक जीवन को दर्शाया गया है। वे अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद ब्रिटेन चले जाते हैं। लैब (प्रयोगशाला) के काम के प्रति उनकी अरुचि रहती है, और थ्योरी से बड़ा लगाव। लेकिन उसके लैब इंचार्ज ब्लैकेट काफी खड़ूस होते हैं, उन्हें ताना मारते हैं। उसके खिलाफ़ गुस्से में ऑपेनहाइमर लैब में पड़े उनके सेब में पोटेशियम साइनाइड मिला देते हैं। लेकिन किस्मत से वह जहरीला सेब खाने से वे बच जाते हैं।
बाद में ओपनहाइमर जर्मनी से फिजिक्स में पीएचडी करते हैं, जहाँ उनकी मुलाकात मशहूर वैज्ञानिक हाईज़ेनबर्ग से होती है। हाईज़ेनबर्ग उनसे काफी प्रभावित होते हैं। बाद में ओपनहाइमर अमेरिका वापस लौटते हैं ताकि वहाँ क्वान्टम फिजिक्स में रिसर्च को आगे बढ़ाया जा सके। वे अमेरिका में विभिन्न यूनिवर्सिटीज में पढ़ाने लगते हैं। शुरू में उनके पास छात्र काफी कम होते हैं लेकिन विषय के प्रति उनका जुनून बरकारा रहता है। धीरे-धीरे देश में उनकी लोकप्रियता बढ़ती जाती है। फिल्म ने दिखाया कि उनके कई मित्र वामपंथी आंदोलन से जुड़े होते हैं। वे खुद भी यूनिवर्सिटी में ट्रेड यूनियन के आंदोलन को समर्थन करते हैं। उनकी पहली प्रेमिका वामपंथी पार्टी से जुड़ी एक कार्यकर्ता होती है। उनकी शादी भी बोटनी की एक प्रोफेसर और पूर्व कम्युनिस्ट से होती है। बाद में अमरीकी आर्मी के जनरल उसे परमाणु हथियार कार्यक्रम की बागडोर इस शर्त पर सौंपते हैं, जब ओपनहाइमर उन्हें दिलासा देने में सफल होते हैं कि वे वामपंथी नहीं हैं और ना उस विचार के प्रति कोई संवेदना रखते हैं। यहूदी ऑपेनहाइमर को लगता था कि जर्मनी के नाज़ी भी परमाणु हथियार का निर्माण कर रहा है, इस कारण अमेरिका को भी इस खतरे का सामना करने के लिए अपना हथियार बनाना होगा।
महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से जब उनकी मुलाकात होती है, और उन्हें वह अपने अभियान से रूबरू कराते हैं, तो वो उन्हें चेतावनी देते हैं कि यह कार्यक्रम दुनिया को नष्ट करने की क्षमता रखता है। लेकिन ओपनहाइमर पीछे हटने को तैयार नहीं थे। वे एक बड़ी टीम बनाते हैं। टीम के सारे लोग अपने परिवार के साथ न्यू मेक्सिको के रेगिस्तान में रहने लगते हैं। इसी जगह पर तीन साल की कठिन मेहनत और दो बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने के उपरांत सफल परमाणु प्रशिक्षण किया जाता है। वैसे, जर्मनी द्वारा आत्मसमर्पण के बाद कुछ वैज्ञानिक सहकर्मी परमाणु बम के निर्माण पर संशय रखते हैं। अमेरिका सरकार को पेटिशन भी देते हैं कि वे परमाणु बम का उपयोग न करें। वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए ओपनहाइमर कहते हैं, “जब तक वे इसे समझ नहीं लेंगे तब तक वे इससे डरेंगे नहीं। और वे इसे तब तक नहीं समझेंगे जब तक वे इसका उपयोग नहीं कर लेते।” शायद उन्हें भरोसा था कि एटम बॉम्ब के भयावह परिणाम के बाद न्यूक्लियर वॉर हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। जापान में हुए परमाणु बम हमले के बाद ओपनहाइमर को परमाणु बम के पिता की उपाधि दी जाती है। उनकी लोकप्रियता चरम पर होती है लेकिन फिर भी उनका अंतर्मन शांत नहीं रहता। अपराधबोध से ग्रस्त, वे सोचते हैं – क्या वे विनाशक हैं, जिसके द्वारा बनाए गए बम से दुनिया नष्ट हो सकती है?
निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन का मजबूत निर्देशन, किलियन मर्फी का उम्दा अभिनय
नोलन का निर्देशन हमेशा की तरह काफी मजबूत है। ओपनहाइमर की जीवनी पर आधारित यह फिल्म, नॉन लीनियर है जो वर्तमान और फ्लैशबैक में आगे बढ़ती है। फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट और कलर दोनों में है। मजबूत पटकथा और डायलॉग्स के कारण तीन घंटे लंबी फिल्म होने के बाद भी यह बोझिल नहीं लगती और दर्शकों को बांधकर रखती है। नोलन की खासियत है कि वे दर्शकों को हल्के में नहीं लेते, उनके विवेक पर भरोसा करते हैं। फिल्म की गति काफी तेज है, इसलिए यह दर्शकों को भी काफी ध्यान से हर एक सीन को देखने पर विवश करती है। अभिनय की बात करें तो किलियन मर्फी ने ओपनहाइमर के किरदार से काफी न्याय किया है। महत्वकांक्षा, तनाव और नैतिकता के बीच उलझे किरदार में वह जान फूंकते हैं। अपनी बाकी फिल्मों की तरह इस फिल्म में भी नोलन ने रीयल इफेक्ट का प्रयोग किया गया है। परमाणु परिक्षण की रात का पूरा सीन काफी बेहतरीन तरीके से दर्शाया गया है। नोलन की फिल्मों में कैमरावर्क और बैकग्राउंड स्कोर अच्छा होता है। यह फिल्म भी तकनीकी मामलों में खरी उतरती है।
फिल्म की सबसे बड़ी कमी यह लगी कि अमेरिका द्वारा परमाणु बम के द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी में हुई तबाही और मानवीय क्षति को दिखाया नहीं गया। जापानी लोगों के दर्द का चित्रण से परमाणु हथियार के खतरे की व्यापकता पता चलती। सोशल मीडिया में एक मीम तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें कहा जा रहा है, “इस फिल्म के निर्माण के दौरान किसी जापानी को नुकसान नहीं पहुंचाया गया।”
विज्ञान क्या निष्पक्ष हो सकता?
फिल्म की खासियत है कि यह ईमानदारी के साथ विज्ञान के निष्पक्ष होने पर सवाल खड़े करती है। सत्ता किस तरह से विज्ञान का उपयोग युद्ध और विध्वंश के लिए करती है, उसका गंभीरता से चित्रण करती है। दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के बाद और हिरोशिमा और नागासाकी में हुई तबाही को देखकर विश्व शांति बहाल करने के बजाय, अमेरिका कम्युनिज्म के खिलाफ लड़ने के आवेग में परमाणु हथियार की रेस में लग जाता है। रूस भी पीछे नहीं रहता और अपने मुखबिर को अमेरिका के परमाणु परिक्षण के दौरान गुप्त जानकारी लेने के लिए भेजता है। देर सवेर ओपनहाइमर आर्म्स रेस के इस खतरे को समझने लगते हैं और जब वह उसके खिलाफ बोलने लगते हैं, तो सत्ता के कुछ लोग उस पर देशद्रोही होने का आरोप लगाने लगते हैं। रूस के मुखबिर होने के आरोप लगाते हुए उन पर ट्रायल चलता है।
आज दुनिया में नौ देशों के पास परमाणु हथियार हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। दुनिया में कुल परमाणु हथियारों की संख्या 13 हज़ार है। यह हथियार किसी भी वक्त धरती को खत्म करने की क्षमता रखते हैं। दुनिया की आज बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है और बदहाली, शिक्षा और स्वास्थ्य से जूझ रही है। लेकिन आज भी विभिन्न देश अपने परमाणु कार्यक्रम पर अरबों रुपए खर्च कर रहे हैं। आज यूरेनियम से सृजित ऊर्जा का भी वैकल्पिक और साफ ऊर्जा के तौर पर दुष्प्रचार किया जा रहा है, जबकि हमने झारखंड के जादूगोड़ा में देखा कि किसी तरह से आदिवासी क्षेत्रों में यूरेनियम माइनिंग से पिछले 50 वर्षों में वहाँ के पर्यावरण को नुकसान पहुँचा है। कई पीढ़ियां रेडिएशन से उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहीं हैं। आधुनिक विज्ञान का दुरुपयोग मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि अगर हम अपने अतीत से नहीं सीखते, तो हमारा भविष्य भी खतरे में है। ओपनहाइमर मानव सभ्यता के अतीत के अपराध बोध का प्रतीक है।

