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राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम का मेरा अनुभव

गीता ब्राह्मणे:

इस कार्यक्रम के तहत हम नवजात शिशुओं से लेकर 18 साल के बच्चों तक का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं। इसमें गंभीर बीमारी वाले बच्चों को चिन्हित करके उन्हे ज़िले तथा हायर सेंटर भेजते हैं ताकि उनका इलाज समय पर किया जा सके।

गंभीर बीमारी जैसे दिल में छेद (सी एच डी), क्लेफ़्ट लिप या palate – कटे हुए होट वाले बच्चों, मूक-बधिर बच्चों, पैर से विकलांग बच्चों व कुपोषित बच्चों को चिन्हित करके एन आर सी पहुँचाते हैं। क्लब फ़ुट वाले बच्चे या जितनी भी जन्मजात विकृति वाले बच्चे पैदा होते हैं उन्हे चिन्हित कर के ज़िले तक पहॅुचाना होता है।

अधिकतर बीमारियॉं या विकृतियॉं तो देख कर पता कर सकते हैं लेकिन हृदय में छेद वाली बीमारी को डॉक्टर द्वारा ही पता किया जा सकता है। इन बच्चों की हृदय की धड़कन सामान्य बच्चों से थोड़ी अलग रहती है जिसे स्टेथोस्कोप की मदद से आसानी से पहचाना जा सकता है।

ये बच्चे सामान्य बच्चों से थोड़े ही भिन्न होत हैं। ये बच्चे थोड़े कमज़ोर दिखते हैं तथा सांस फूलना या जल्दी थकावट महसूस करते हैं और थक जाते हैं। थोड़ा सा चलने या खेलने पर इनकी सॉंस फूलने लगती है। कोई कोई बच्चा बेहोश भी हो जाता है और कोई बच्चा नीला भी पड़ सकता है। नवजात शिशु से छः साल तक के बच्चों में यदि ऐसी बीमारी हो तो आंगनवाड़ी केन्द्र मे जाकर इसके बारे में पता कर सकते हैं।

एक बार मैं फील्ड विजिट के लिए बड़गांव नामक गांव में गई थी। वहाँ पर एक सात साल की बच्ची में हृदय की विकृति पाई गई। मैंने उसके माता पिता को उनकी बच्ची की समस्या के बारे में बताया तो उसके माता पिता ने कहा कि हमारी बच्ची ठीक है। उसे कुछ नहीं हुआ, आप लोग ऐसे ही कह रहे हैं। तब मैंने उनको स्टेथोस्कोप से एक नॉर्मल बच्चे और उस बच्ची की हृदय की ध्वनि सुनाई और उन्हें अच्छे से समझाया। तब जाकर किसी तरह वे मेरी बात माने। फिर हम उन्हें जिले स्तर पर स्वास्थ्य कैंप में लेकर गए। वहाँ उसके ह्रदय की इकोकार्डियोग्राफी की गई। अब उसका ऑपरेशन इंदौर के अरबिंदो अस्पताल में होगा आयुष्मान भारत कार्ड की सहायता से।

इस तरह हम राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करके ग्रामीण बच्चों को जन्मजात विकृतियों से बचाव कर सकते हैं। इस तरह से शासन की स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं का लाभ लेकर हम बच्चों के स्वास्थ्य पर ध्यान दे सकते हैं।

पहले मुझे भी लगता था कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था कुछ काम नहीं कर सकती। लेकिन जब से मैं सरकारी संस्था के माध्यम से काम कर रही हूँ मुझे समझ आया है कि सरकार के पास बहुत साधन है और यदि हम मेहनत से काम करें तो अपने समाज का और गरीब वर्ग का बहुत फायदा करवा सकते हैं। लोगों को भी सरकारी सेवा पर विश्वास नहीं है क्योंकि उन्हे अच्छे अनुभाव नहीं हैं। यदि हम ईमानदारी से कार्य करेंगे तो धीरे धीरे गाँव वालों को हम पर और सरकारी सेवा पर विश्वास हो जाता है। मुझे खुशी होती है जब मेरे प्रयास के कारण किसी का फायदा हो जाता है।

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  • बड़वानी जिले के निवासी, डॉ. गीता ब्राह्मणे गत दस माह से राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में आयुष मेडिकल ऑफिसर पद पर कार्यरत हैं। वे पूरी लगन और निष्ठा से आदिवासी बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए काम करने में जुटी हैं।

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