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युवा देश का भविष्य है, लेकिन युवाओं का भविष्य क्या है?

जयश्री:

भारत दुनिया का सर्वाधिक युवा देश कहलाता है। 18 से 29 वर्ष उम्र के युवक-युवतियां भारत की जनसंख्या के 22% यानी कि 26 करोड़ है। साथ ही अब भारत की कामकाजी उम्र की आबादी, गैर कामकाजी उम्र की आबादी से अधिक है। 2019 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार कामकाजी उम्र की करोड़ों की आबादी के लिये अतिरिक्त नौकरियों की तुरंत आवश्यकता है। लेकिन साथ वास्तविकता ये है कि 47% युवाओं के पास 2030 में रोज़गार पा सकने के लिए ज़रूरी शिक्षा व कौशल है ही नहीं (UNICEF, 2019)। इस हालत में हम कैसे पहुंचे, इसके कारण भी किसी से छिपे नहीं हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार सरकारी स्कूलों के खराब बुनियादी ढांचे, बच्चों में व्याप्त कुपोषण और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी से, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बच्चों को नहीं मिल पा रही है।

दूसरी तरफ 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने, करोड़ों रोज़गारों का सृजन करने के वादे जनता कब से सुन रही है। हमें अपने आस-पास झांकने से समझ आता है कि बेरोज़गारी की समस्या अब बहुत विकराल रूप ले चुकी है। 10-20 सरकारी पदों के लिए लाखों आवेदन आते हैं। सेना भर्ती के लिए, लाखों युवा दौड़ लगाने के लिए पहुंचते हैं। पढ़-लिख कर नौकरी नहीं मिली, इसलिये आत्महत्या की घटनाएं हम आये दिन अख़बारों और सोशल मीडिया पर पढ़ते  हैं। आलम ये है कि सालों साल तक कोई न कोई पदों के लिए युवा आवेदन करते ही रहते हैं। इससे फाॅर्म फीस के रूप में सरकार की मोटी कमाई होती है। फोटोकाॅपी वाले, सायबर कॅफे वालों का धंधा भी ज़ोर से चलता है, लेकिन छात्रों और उनके माता-पिता की जेबें खाली हो जाती हैं। लाखों युवक-युवतियां इस चक्र से गुज़रते हैं और निराश व हताश हो जाते हैं। 

हाल ही में रिक्त पदों पर भर्ती की मांग लिए भोपाल पहुंचे बेरोज़गारों पर पुलिस द्वारा भारी लाठी चार्ज किया गया। उनकी मांगे पूरी करना तो छोड़ो, उनसे संवाद की भी ज़रूरत सरकार को महसूस नहीं हुई। बेरोज़गारी की स्थिती किसी राज्य तक सीमित न हो कर सभी राज्यों में शिक्षित-अशिक्षित वर्गों, ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों, सभी में व्याप्त है। ज़ाहिर है कि हमारी आर्थिक नीतियां रोज़गार पैदा करने में सक्षम नहीं हैं।

करोड़ों युवक-युवतियों की यह फ़ौज राजसत्ता की नींद हराम कर सकती है, इसलिए उन्हें भ्रमित करने का और बरगलाने का काम भी ज़ोरों पर जारी है। कांवड यात्राओं में उमड़ पड़ती युवाओं की भीड़ इसका प्रमाण है।

इस समय भारत में असमानता अपने चरम पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट बताती हैं कि 10% भारतीयों के पास देश की कुल 77% संपत्ति इकठ्ठा हो चुकी है। सन 2000 में भारत में 9 अरबपति थे और उनकी संख्या अब 119 हो चुकी है। इन अरबपतियों की कुल संपत्ति हमारे केंद्रीय बजट आवंटन से भी अधिक है। भयानक असमानता का अंदाज़ा इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि एक कार्पोरेट अधिकारी एक साल में जितना कमाई करता है, उतने पैसे कमाने के लिए एक ग्रामीण दिहाड़ी मज़दूर को न्यूनतम मज़दूरी के हिसाब से 941 साल लगेंगे।

स्वास्थ्य और शिक्षा के निजीकरण ने गरीबों को और भी दीन-हीन अवस्था में पहुंचा दिया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ और करोड़ों के जीवन का आधार रही खेती को भी सरकारों द्वारा लगातार जानबूझ कर दुर्लक्षित रखा है। खदानों, जंगलों के साथ ही अब देश के सारे ही संसाधन कौड़ियों के मोल, पूंजीपतियों  के हवाले करने का काम दिन रात ज़ोरों पर है। ऐसे में बेरोज़गारी, गरीबी और असमानताएं और भी बढेंगी। साथ में धर्म, जाति, क्षेत्रवाद में जनता को उलझा कर, आपस में लड़ाने का काम भी और ज़ोर पकड़ेगा। इसलिए व्यवस्था परिवर्तन से ही बेरोज़गारी को काबू किया जा सकता है। एक न्यायपूर्ण व्यवस्था जो सबको रोज़ी-रोटी-सम्मान दे और जो प्रकृति और इंसान के शोषण पर ना टिकी हो, उसका निर्माण ही अंतिम सपना हो सकता है। उसके लिए हम सबको धर्म, जाति, लिंग और क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर, इतिहास से सबक ले कर मोर्चे बंदी करनी होगी।

काम बहुत कठिन है लेकिन बीच का रास्ता है नहीं।

फीचर्ड फोटो आभार: स्क्रॉल

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  • जयश्री, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाती हैं।

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