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एक आदिवासी लड़की क्या सोचती है?

महेशवरी मरावी:

एक आदिवासी लड़की अपनी शिक्षा के बारे में क्या सोचती होगी? एक आदिवासी लड़की सोचती है कि उसके माँ-पापा कैसे-कैसे उसके भाई-बहनों को पैसे इकट्ठा करके पढ़ाई करा रहे हैं।

उस लड़की की बस इतनी ही सोच रहती है कि उसे पढ़-लिखकर छोटी-मोटी सरकारी नौकरी मिल जाए, जिससे उसके घर की स्थिति एवं उसके भाई-बहनों की पढ़ाई भी अच्छे से करा सके और उसके घर की स्थिति में सुधार आ सके। वो सोचती है कि मेरे होते हुए मेरे माँ-पापा को इतनी परेशानी क्यों झेलनी पड़े, वो सोचती है कि क्या मैं अपनों के लिए कुछ कर नहीं सकती?

वो सोचती है कि मैं क्या करूँ जिससे मेरे परिवार की स्थिति ठीक हो।

उसके दिमाग में एक ख़याल आता है कि क्यों न मैं अच्छे से पढ़ाई करूँ, लेकिन अभी पढ़ाई के लिए भी तो पैसा लगेगा। वो सोचती है, मेरी माँ-पापा कहाँ से मेरी पढ़ाई के लिए इतना पैसा लाएँगे।

घर का राशन भी तो बड़ी मुश्किल से आ रहा है। ऊपर से मेरे भाई-बहन भी पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी पढ़ाई के लिए भी पैसे लगेंगे। 

वो सोचती है कि क्या मैं भी कहीं दुकान, पेट्रोल पम्प, जनरल स्टोर या कपड़े आदि की दुकान में काम कर लूँ, जिससे कम से कम मेरे भाई-बहनों की पढ़ाई तो हो जाएगी।

वो यह सोचती है कि मैं भी तो अच्छे से पढ़ाई कर सकती हूँ। लेकिन कोई मार्गदर्शक भी नहीं है। अगर मेरी माँ-पापा पढ़े-लिखे रहते तो शायद स्थिति कुछ अच्छी होती। फिर सोचती है कि कई सरकारी योजनाएँ भी तो हैं, लेकिन क्या करें, वो तो गाँव तक पहुँच नहीं पातीं। पहुँचती भी है तो उस पर कुछ काम ही नहीं होता, या फिर सरपंच/साचीव द्वारा गाँव के गरीब परिवार की लड़कियों को उन योजनाओं के बारे में जानकारी ही नहीं दी जाती या फिर गाँव के उच्च वर्ग के बच्चों को दे दी जाती है, जिनको उसकी ज़रूरत ही नहीं होती।

एक आदिवासी लड़की बस यह सोचती है कि कैसे भी करके पढ़ाई तो पूरी हो जाएगी, लेकिन नौकरी के लिए बहुत सारे पैसे लगेंगे। पढ़ाई तो पूरी हो जाएगी, पर ये ऊपर बैठे उच्च वर्ग के लोग, पैसे वाले लोग, उनके आगे मेरी पढ़ाई काम नहीं आएगी।

अभी की व्यवस्था ऐसी है कि जिसके पास पैसा या फिर ऊपर तक पहुँचने वाले लोग हैं, वो सरकारी नौकरी ले लेते हैं और हम जो गरीब परिवार से हैं, जिसकी नौकरी लगवाने के लिए कोई नहीं है, तो बस उनके पास कौशल, कुछ कर दिखाने का हुनर, शिक्षा, उच्च विचार, और अपनी प्रतिभा द्वारा किसी भी फील्ड में अपना बेस्ट देना चाहिए।

आखिर में वह सोचती है कि क्या अनुभव, कौशल, विकास, सहनशक्ति, शिक्षा – ये सब मायने नहीं रखते? रखता है तो बस पैसा, कहते हैं ना, जिसके पास पैसा है, उसके पास सब है।

Author

  • महेश्वरी छत्तीसगढ़ के कोरबा ज़िले से हैं। वर्तमान में महेश्वरी राज्य स्तरीय सामाजिक परिवर्तन शाला की प्रतिभागी हैं। वे शिक्षा, युवाओं के अनुभवों और आदिवासी समुदाय की चुनौतियों से जुड़े मुद्दों पर अपने विचार और अनुभव साझा करती हैं।

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