राजकुमार आदिवासी:
ग्राम शिवनगर को वर्ष 2026 में बसाया गया। यह भूमि राजस्व विभाग के सर्वे नंबर 711 की खाली ज़मीन पर बसाई गई। उसी खाली जगह के पास हमारे पाँच परिवारों की पट्टे की जमीन थी, जो लगभग 165 बीघा थी। यह जमीन हमारे पुराने गाँव तिघरा से लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित थी।
उस समय रावत और यादव समुदाय के दबंग लोग हमारी फसलों को अपने पशुओं से उजाड़ देते थे। जब हम उन्हें ऐसा करने से मना करते, तो वे हमें एक या दो लोगों को घेरकर पीट देते थे। बार-बार ऐसी घटनाएँ होने के बाद हमने सोचा कि इस तरह रहने से और फसल न होने के कारण भूखे मरने से अच्छा है कि हम अपनी ही जमीन पर रहकर संघर्ष करें।
इसलिए पाँचों परिवारों ने मिलकर फैसला किया कि हम अपनी ज़मीन पर ही रहेंगे। जब हम वहाँ रहने लगे तो दबंग लोगों ने हमारी झोपड़ियों में चोरी करना, हमें डराना-धमकाना शुरू कर दिया। लेकिन हम लोग डरे नहीं और उनका डटकर सामना किया। हमने इसकी शिकायत विधायक से की। विधायक ने पुलिस से कहा कि वे तुरंत जाकर आदिवासियों की समस्याओं को देखें।
इसके बाद भी हमारे सामने पानी की बड़ी समस्या थी। हमें पानी लाने के लिए 1 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित गाँव तिघरा जाना पड़ता था। वहाँ ग्राम गहलोंनी के कुछ दबंग लोग हमें पानी भरने भी नहीं देते थे। तब हमने पंचायत, जनपद और ब्लॉक के पी.एच.ई. विभाग में आवेदन दिया, लेकिन फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद हमने कलेक्टर साहब को भी आवेदन दिया, लेकिन वहाँ से भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अंत में हमने तय किया कि हम अपने परिवार और बच्चों के साथ फिर से विधायक के पास जाएंगे। जब हम विधायक से मिले तो उन्होंने दो महीने के भीतर हैंडपंप लगवाने का आश्वासन दिया। लगभग दो महीने बाद विधायक निधि से हमारे गाँव में हैंडपंप लगवाया गया।
जब पानी की व्यवस्था हो गई, तो वहाँ दो और गाँवों के लगभग 20 परिवार आकर बस गए, जो ग्राम ठगोसा और कलाखेत के निवासी थे। इस तरह धीरे-धीरे लोगों की संख्या बढ़ने लगी।
जब गाँव में परिवार बढ़ा, तो हमने बिजली की मांग भी उठाई। चुनाव के समय हमने प्रत्याशियों से वोट के बदले काम की मांग की। इसके बाद हमें सेटलमेंट योजना के तहत 25 आवासों के लिए लगभग 28 लाख रुपये की मंजूरी मिली और कॉलोनी बनाई गई। इस योजना के अंतर्गत 25 परिवारों को आवास प्राप्त हुए।
पहले दबंग लोग हम पर अत्याचार करते थे, लेकिन जब हम सब एकजुट होकर खड़े हुए तो उन्होंने हमसे उलझना बंद कर दिया। उन्होंने हमारी फसलों में मवेशी चराना भी बंद कर दिया। धीरे-धीरे हमारे गाँव में परिवारों की संख्या बढ़ती गई।
आज हमारे गाँव में लगभग 60–70 परिवार रहते हैं। हमारे गाँव के लोग जब भी चुनाव आता है, तो वोट के बदले शराब, मुर्गा या पैसे नहीं मांगते, बल्कि गाँव के विकास के कामों की मांग करते हैं। इसी वजह से हमारे गाँव के कई काम धीरे-धीरे पूरे होते जा रहे हैं।

