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गाँव से शहर तक: शिक्षा और संघर्ष की यात्रा

सोनू आदिवासी :

मेरा नाम सोनू आदिवासी है और मेरा जन्म गाँव में हुआ था। मेरा गाँव ग्राम बंगाली पुरा, बरई, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्थित है। मेरे गाँव में लगभग 40 से 50 घर हैं और पूरे गाँव में आदिवासी समाज के ही लोग निवास करते हैं। मेरा गाँव छोटा सा है, लेकिन यहाँ के लोग बहुत दयालु हैं।

मेरे गाँव में सुबह 4:00 बजे से ही मुर्गे की आवाज़ आने लगती है और दिन की शुरुआत चिड़ियों के चहचहाने से होती है। गाँव के लोग एक सरल और अच्छी ज़िंदगी जीते हैं। सुबह-सुबह उठकर लोग अपनी गाय, भैंस और बकरी का दूध निकालते हैं और उसे बाज़ार जाकर बेचते हैं।

मेरी पहली से पाँचवीं तक की पढ़ाई गाँव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद की पढ़ाई पास के गाँव रायपुर में हुई। फिर मैंने नौवीं और दसवीं की पढ़ाई बानमोर के जे.डी. कॉन्वेंट स्कूल से की और 2019–20 में उत्तीर्ण किया। इसके बाद मैंने 11वीं और 12वीं की पढ़ाई शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, श्याम स्कूल, बरई, ग्वालियर, मध्य प्रदेश से पूरी की।

इसी बीच मेरी बहन की शादी के लिए पैसों की ज़रूरत थी, इसलिए मुझे गाँव छोड़कर गुजरात शहर जाना पड़ा। वहाँ मैंने लगभग 2 साल तक कंपनियों और फैक्ट्रियों में काम किया। इस कारण मैं अपनी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख सका। लेकिन मेरा मन पढ़ाई में ही लगा रहता था। मैंने 12 साल तक मेहनत करके पढ़ाई की थी, इसलिए मैं आगे भी पढ़ना चाहता था, ताकि जीवन में कौशल विकसित हो और भविष्य बेहतर बन सके।

इसी इच्छा के साथ मैंने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की। वर्तमान में मैं ग्वालियर में रहता हूँ और जीवाजी विश्वविद्यालय से संबंधित महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष का छात्र हूँ।

जब भी मैं शहर से वापस अपने गाँव जाता हूँ, तो मुझे बहुत खुशी होती है। मेरे गाँव के दोस्त भी बहुत अच्छे हैं। गाँव के हरे-भरे खेत और शांत वातावरण मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। मेरा बचपन भी इसी गाँव में बीता है।

बचपन में मैं दोस्तों के साथ बकरी चराने जंगल में जाया करता था। हम सब साथ घूमते, खाते-पीते और खेलते थे। जंगल के झरनों, नदियों और तालाबों में नहाते थे। नदी के किनारे लगे आम के पेड़ों से आम तोड़कर खाते थे और कभी-कभी घर पर सब्ज़ी बनाने के लिए भी ले आते थे।

मैंने बकरी चराने के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी पूरी की। कई बार पढ़ाई के लिए मुझे दूर नहीं जाना पड़ा, क्योंकि मेरी अधिकांश पढ़ाई गाँव और आसपास के इलाकों में ही हुई। मैंने 12वीं कक्षा 2021–22 में उत्तीर्ण की। उसके बाद घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण मेरी पढ़ाई कुछ समय के लिए रुक गई और मुझे लगभग दो साल का अंतराल लेना पड़ा।

मुझे आज भी अपने स्कूल के सर की बात याद है। वे हमेशा कहते थे कि तुम जहाँ भी जाओ, अपने गाँव को कभी मत भूलना।

आज भले ही गाँव के बहुत से लोग रोज़गार के लिए बाहर चले जाते हैं, लेकिन त्योहारों के समय सभी वापस गाँव लौट आते हैं। रक्षाबंधन, दीपावली, होली, नवरात्र और महाशिवरात्रि जैसे त्योहार गाँव में बहुत उत्साह के साथ मनाए जाते हैं।

मेरे गाँव के लोग बहुत मेहनती हैं। कई लोग जंगलों से जड़ी-बूटियाँ लाते हैं और उन्हें बेचकर अपना रोज़गार चलाते हैं। जंगल से जड़, लकड़ी, गोंद और तेंदू पत्ती जैसी चीज़ें इकट्ठा करके भी लोग अपना गुज़ारा करते हैं।

गाँव के कुछ लोग खेती-किसानी करते हैं और मुर्गी तथा बकरी जैसे पशुओं का पालन भी करते हैं। इसी तरह मेहनत करके गाँव के लोग अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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  • सोनू आदिवासी ग्वालियर, मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव से आने वाले छात्र हैं। वर्तमान में वे बी.ए. प्रथम वर्ष के छात्र हैं और अपने जीवन अनुभवों के माध्यम से गाँव, मज़दूरों और समाज की वास्तविकताओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं।

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