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आधारशीला आवासीय बालिका शिविर – बालिकाओं की जीवन कहानियाँ और अनुभव

युवानिया डेस्क द्वारा संकलित :

आधारशीला बालिका शिक्षण शिविर अमरपुरा, चित्तौड़गढ़  क्षेत्र की उन बालिकाओं के लिए आशा की किरण बनकर उभरा है, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, और जिन्हें परिवार व समाज की परंपरागत कुरीतियों के कारण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पाता। यहाँ न केवल शिक्षा दी जाती है, बल्कि जीवन कौशल, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व निर्माण पर भी ध्यान दिया जाता है। इस आवासीय विद्यालय में पढ़ने वाली सभी लड़कियाँ भील समुदाय और मीणा समुदाय से हैं। यहाँ अब तक 700 बच्चों तक पहुँच बनी है, जिनमें से 150 बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। नीचे कुछ बालिकाओं के अनुभव और उनकी कहानियाँ उन बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत हैं:

1. गायत्री नायक (उम्र 19 वर्ष, गाँव उचनारकाला)

गायत्री अपने परिवार की पहली लड़की हैं, जिसने कक्षा 10 तक पढ़ाई की। 2016 में जब वह आधारशीला पहुँचीं, तो उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। माता-पिता मजदूरी और खेती का काम करते थे।
गायत्री ने यहाँ रहकर पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई, चित्रकला, नृत्य और गीत गाना सीखा। वह बताती हैं कि उनके समाज में बाल विवाह की कुरीति गहरी है, और इस कारण लड़कियाँ शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। गायत्री का सपना पुलिस में जाकर अपने समाज की इन कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाना है।

2. केशर मीणा (उम्र 14 वर्ष, गाँव केशरियावाद, प्रतापगढ़)

केशर ने 2018 में आधारशीला में प्रवेश लिया। उनके पिता मजदूरी करते हैं और माँ खेती का काम करती हैं। परिवार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करता है।
आधारशीला में रहते हुए केशर ने पढ़ाई के साथ सिलाई, नाटक, कंप्यूटर और गीत सीखे। हाल ही में तहसील स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर उन्होंने अपनी प्रतिभा साबित की। उनका सपना नर्स बनने का है।

3. पूजा मीणा (उम्र 16 वर्ष, गाँव केशरियावाद)

पूजा ने 2014 में आधारशीला में प्रवेश लिया था। जब वे यहाँ आईं तब उन्हें पढ़ना-लिखना बिल्कुल नहीं आता था। आधारशीला ने न केवल उनकी शिक्षा की नींव रखी बल्कि उनके व्यक्तित्व में भी गहरा बदलाव लाया।
उन्होंने आत्मविश्वास, मंच संचालन, नाटक और सार्वजनिक बोलने की कला सीखी। पूजा कहती हैं कि उम्र बढ़ने के साथ वे पढ़ाई से भटकने लगी थीं, लेकिन शिक्षिकाओं और सहयोगियों ने उन्हें लगातार प्रेरित किया। आज उनका सपना है कि वे अपने जैसी अन्य बालिकाओं को प्रेरित करें, उन्हें स्कूल से जोड़ें और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ खड़ी हों।

4. सपना भील (कक्षा 12, गाँव चित्तौड़गढ़)

सपना 2018 से आधारशीला शिविर में रह रही हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने वाली सपना ने यहाँ पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई, चित्रकला, कंप्यूटर और संगीत सीखा। उन्होंने राजस्थान ओपन स्कूल से कक्षा 10 उत्तीर्ण की और अब कक्षा 12 की पढ़ाई कर रही हैं।
सपना का सपना है कि वे अध्यापिका बनें और अपने गाँव में उन बच्चों को शिक्षा दें जिन्हें अवसर नहीं मिल पाता। वे सुमन माई, पलका दीदी और खेमराज जी को अपने जीवन में प्रेरणा मानती हैं।

5. निकिता कुंवर (कक्षा 9, गाँव मगरदा)

निकिता 2017 में आधारशीला शिविर से जुड़ीं। उनके पिता गाड़ी चलाते हैं और माँ गृहिणी हैं। गाँव के स्कूल की तुलना में आधारशीला ने उनके जीवन में बड़ा बदलाव लाया।
यहाँ उन्होंने नाटक, नृत्य, कंप्यूटर, गाना, सिलाई और मंच पर बोलने जैसी कई कलाएँ सीखीं। वे बताती हैं कि आधारशीला ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया। निकिता का सपना है कि वे अध्यापिका बनकर यहीं शिक्षा दें और अन्य जरूरतमंद बच्चों को भी इस शिविर से जोड़ें।

6. आशा मीणा (कक्षा 12, गाँव नाड़, प्रतापगढ़)

आशा का परिवार बेहद कमजोर आर्थिक स्थिति से जूझ रहा है। उनके पिता मजदूरी और माता खेती व गृहकार्य करती हैं। उन्होंने 2015 में आधारशीला में प्रवेश लिया। यहाँ रहते हुए आशा ने सिलाई, कंप्यूटर, संगीत, नृत्य और नाटक सीखा।
कक्षा 10 उन्होंने बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय भदेसर से पूरी की, जिसके लिए रोज़ाना 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने 67% अंक प्राप्त किए। आशा बताती हैं कि आधारशीला ने उन्हें आत्मविश्वास और साहस दिया, जिससे वे अपनी पढ़ाई जारी रख सकीं।

आधारशीला आवासीय बालिका शिविर ने इन बालिकाओं के जीवन में शिक्षा का उजाला भर दिया है। यह केवल विद्यालय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का केंद्र है, जहाँ से निकलने वाली हर बालिका अपने गाँव और समाज में प्रेरणा का स्रोत बन रही है। गायत्री, केशर, पूजा, सपना, निकिता और आशा जैसी बालिकाएँ अपने सपनों को साकार करने के साथ-साथ अन्य लड़कियों को भी शिक्षा और आत्मनिर्भरता की राह पर ले जाने का संकल्प रखती हैं।

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