Site icon युवानिया ~ YUVANIYA

खेमराज – मेरी यादें

डॉ. नरेंद्र गुप्ता:

खेमराज से मेरी पहली मुलाकात सन् 1980 में हुई जब वो मुझसे मिलने देवगढ़ (पुराना नाम देवलिया, प्रतापगढ, राजस्थान) आये। मैं देवगढ़ में जनवरी 1979 से ही बस गया था। गोरा रंग, नाटा कद, दुबला पतला सा शरीर, एक मधुर और आत्म विश्वास से भरपूर यह व्यक्ति मेरा हमउम्र जैसा ही लगा। आकर कहा कि मैं भी यहाँ पर तुम्हारे साथ काम करना चाहता हूँ। खेमराज ने बताया कि वे भी इसी जिले के निम्बाहेड़ा कस्बे के रहने वाले हैं और वर्तमान में अजमेर जिले के तिलोनिया गाँव में स्थित समाज कार्य एवं अनुसंधान केन्द्र के एक कार्य क्षेत्र में ग्रामीण निर्धनों के सशक्तिकरण और उनके सामाजिक, आर्थिक उत्थान के लिए कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि निम्बाहेड़ा में उनका संपर्क श्रीलता स्वामीनाथन और महेन्द्र चौधरी से हुआ था और उनके कहने पर ही वे तिलोनिया गये थे। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि वे देश में व्याप्त निर्धनता के बारे में कुछ समझते है और उनको लगता है कि निर्धनता से निकलने के लिए उनका संगठन करना बहुत आवश्यक है। उनसे मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि वे स्वयं एक निर्धन परिवार से हियन और मज़दूरी करके ही उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की है। 

मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ कि वे इतनी कठिन परिस्थितियों से गुजरने के बाद भी अपने आप को कुछ सुदृढ़ और पैसे कमाने वाले कार्य के स्थान पर पूर्ण रूप से जोखिम भरे अनिश्चित कार्य क्षेत्र को चुनने की ललक है। यह पूर्णतः समाज के बारे में उनकी परिपक्व राजनीतिक समझ और विष्लेषण से झलकता था। उन्होंने मुझसे इस संदर्भ में विस्तार से चर्चा की और कुछ दिन रहने के बाद पुनः वापस आने के लिए कह कर चले गये। किन्तु फिर बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक सुदुर गाँव में अपना डेरा जमाया और फिर लगभग 7 वर्षो बाद पुनः देवगढ़ काम के लिए लोैटे। देवगढ के कुछ परिवारों को छोडकर क्षेत्र के सभी गाँवों में मीणा आदिवासी परिवार ही रहते हैं। यह पूरा पहाड़ी इलाका है इसलिए एक गाँव से दूसरे गाँव जाने के लिए एक पहाड़ से उतर कर दूसरे पर चढ़ना पड़ता था, इस कारण अगर एक ही बार में दो गाँव में जाना हो तो एक गाँव में रात रूककर फिर दूसरे गाँव में जाते थे और फिर अनेक दिनो बाद ही लोैटते थे। 

यहाँ के सभी मकान मिट्टी अथवा तड़त की लकड़ियों पर गोबर थेप कर बनाये हुए होते थे और रात्रि उनमें ही गुज़ारते थे। हमारे कार्य क्षेत्र में सीता माता वन अभ्यारण भी पड़ता था, जहाँ अनेक आदिवासी परिवार वन विभाग द्वारा हटाए जाने के विरूद्व संघर्ष कर रहे थे। खेमराज उन गाँवों में निरन्तर अनेक दिन बिताकर उनके संघर्ष में सहयोग करते थे। एक बार जब उस क्षेत्र से लौट रहे थे तो बीच में पड़ने वाले जाखम बांध से पानी छोड़ देने के कारण तीन दिन तक वापस आना ही संभव नहीं हो पाया। इसी प्रकार देवगढ़ चूंकि एक पहाड़ी पर बसा हुआ था तो वहाँ पानी की बहुत समस्या थी। मैं जब वहाँ गया तो मैं भी अन्य परिवारों की तरह गाँव के खण्डहर हुए किले के पीछे बरसात के पानी से भरी बावड़ी का पानी पीता था, जो कि जल कुम्भी के बीच निचोड़ कर निकाला जाता था। किन्तु जब खेमराज आये तब तक हमने एक हेण्डपम्प लगवा लिया था, जिसमें गर्मी के दिनों में पानी सूख जाता था या बहुत नीचे चला जाता था और बहुत बार चलाने के बाद ही पानी आता था। इसके लिए खेमराज, मैं, प्रीती, देवेन्द्र, अजय इत्यादि सब बारी-बारी से खाली हेण्डपम्प चलाते थे, तब कहीं कुछ मटके पानी आता था।

खेमराज पूरे जीवंत इंसान थे। नागरिकों में सामाजिक-आर्थिक विषयों पर चेतना जाग्रत करने के लिए उनके ज़मीनी स्तर के तौर-तरीके और विश्लेषण इतने प्रभावशाली थे कि जो उनको सुनता उनका दिवाना हो जाता। उनकी बात और विश्लेषण की शैली के कारण अनेक उच्च शिक्षित मध्यवर्गीय युवा उनसे प्रभावित होकर उनके साथ निर्धनों के लिए कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए उनके साथ जुड़ गये। मैंने उनको कभी निराश अथवा क्रोधित नहीं देखा और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष करने के लिए वे तैयार रहते थे। अपने को क्षेत्र के अत्यन्त निर्धन आदिवासी परिवार के जीवन से जोड़ने के लिए वे वो सब कार्य करने के लिए तैयार रहते थे, जैसे कि जलाऊ लकड़ी के मोटे गठ्ठर पास के जंगलो से सिर पर उठाकर 15-20 कि.मी. पैदल जाकर प्रतापगढ में 2-3 रूपये में बेच देना। निश्चित ही उनके इस प्रकार के कार्यो से गाँव के लोग उनसे निरन्तर जुड़ गये थे और उन्हें अपना जैसा ही मानते थे। 

मुझे याद है कि जब वे देवगढ में थे तो हमने क्षेत्र के आदिवासी परिवारों की कृषि भूमि आवंटन अथवा जो सूदखोरो के कब्जे में चली गयी थी को छुड़वाने, वन क्षेत्रों पर अधिकार, अकाल राहत कार्यो में वास्तविक मज़दूरी भुगतान, बंधुआ मज़दूरों को मुक्त करवाने के लिए अनेक प्रदर्शन, धरना कर अभियान चलाये। उसके बाद उन्होंने अपने कार्य के लिए निम्बाहेड़ा चुना जहाँ भी बड़ी संख्या में खानों में कार्यरत बधुंआ मजदूरों को मुक्त करवाया गया। सन् 1998 के बाद से उन्होंने अपना कार्य क्षेत्र का और फैलाव कर चित्तौड़गढ़ जिले के मंगलवाड़ क्षेत्र में कार्य प्रारम्भ किया जिनमें करजाली गाँव की पंचायत में भ्रष्टाचार पर जन सुनवाई और समीपवर्ती गाँव कियाखेड़ा में दलितों के मंदिर प्रवेश जैसे संदर्भों में कार्य किया। एक अत्यन्त रोचक आन्दोलन खाट का था जिसमें दलित जो कि सामान्य वर्ग के समक्ष खाट पर नही बैठ सकते थे को खाट पर बैठने का था। जब करजाली गाँव में जन सुनवाई होने वाली थी और कियाखेड़ा में घोषित मंदिर प्रवेश होने वाला था, तो प्रशासन ने वहां धारा 144 लागू कर दी थी। 

ऐसे अनेकों प्रकरण हैं जिनकी अगर फेरहिस्त बनाई जाए तो पूरी किताब लिखनी पड़ेगी। उनमें जो काम करने की ऊर्जा थी, उसको देख मैं हमेशा चकित ही रहता था, वो भी तब जब उनका शरीर उनका साथ ही नहीं देता था। जब वे 1989 में देवगढ़ आये, तब ही से उनका पाचन तंत्र गड़बड़ था और उसका कोई उपचार संभव नहीं हो पा रहा था। इसके लिए एलोपेथी, होम्योपेथी, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा आदि सभी तरह के उपचार किये गये पर कुछ विषेष फायदा नही हो पाया। सन् 2008 में उन्होने चित्तोैडगढ़ के भदेसर उपखण्ड के निकट गाँव अमरपुरा में डेरा जमाया और अंत तक वहीं रहे। जब वे वहाँ रहने लगे उस समय ही पाइल्स और बाद में गुदा के कैंसर का पता चला, जिसके लिए इलाज प्रारम्भ किया गया। कैंसर होने के बावजूद भी वे जब तक चल-फिर सकते थे तो निरन्तर गाँवों में जाते, बैठके करते और उनको संगठन के लिए प्रेरित करते। वे अपने साथ एक कैमरा भी रखते और जो फोटो खींचते उनको फेसबुक पर डालते। उनके इन फेसबुक पेज को बहुत बडी संख्या में देखा जाता था। अन्त में कैंसर का प्रभाव उनके शरीर के अन्य अंगों में भी पहुँच गया, डॉक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिये और उनको 70 वर्ष से कम आयु में ही जाना पड़ा, किंतु जो कुछ उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में देश के निर्धनों को जागृत और संगठित करने के लिए किया, उसे कभी भुलाया नही जा सकता।

Author

Exit mobile version