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पुस्तक यात्रा के माध्यम से कहानियों को जीवित रखने की पहल

इरशाद अहमद:

हम लोग एक पुस्तक यात्रा लोगों के बीच ले जाकर लगाते हैं, इसलिए कि आज-कल लोग स्कूलों में सिलेबस के अलावा कहानी की किताबें नहीं पढ़ते हैं। हम लोगों का यह मकसद रहता है कि लोग सिलेबस के साथ-साथ कहानी टाइप की छोटी स्टोरी बुक भी पढ़ें। पहले दादी लोग कहानियाँ सुनाया करती थी, लेकिन ऐसा कुछ अब नहीं होता है। इन सब का कारण यह है कि अब लोगों के पास समय ही नहीं है। ज्यादातर बड़े-बुजुर्ग अपनी बीमारी में ही परेशान रहते हैं, इसलिए वह बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं। और आज-कल के माँ-बाप बच्चों को छोटी उम्र में ही मोबाइल का सहारा देकर लोगों से दूर भी कर देते हैं। इसलिए लोग अपना समय, ना बच्चे गार्जियन को ना गार्जियन बच्चों को समय दे पा रहे हैं, अब ज़्यादातर बच्चे मोबाइल की दुनिया में व्यस्त हो चुके हैं। वह मोबाइल में इतना व्यस्त रहते हैं कि अपने दादी-दादा के पास भी नहीं बैठते हैं, ना ही उन्हें समय देते हैं। 

हम लोगों का यही मकसद है कि जितनी देर हम लोग पुस्तक यात्रा लगाए रहें, उतनी देर बच्चों को कुछ अलग पढ़ने और सीखने का समय और मौका मिले। कहानी की किताब सीखने-सिखाने का बहुत अच्छा माध्यम है, और उनसे पढ़ने-लिखने की भी एक अच्छी सोच-समझ बनती है। बच्चों के बीच उनके स्कूल की किताबों से अलग कुछ किताबें ले जाकर हम उन लोगों के बीच लगाते हैं, हमारे कुछ साथियों की मदद से हम लोगों को किताबें मिलती हैं जैसे एकलंबिया पिटारा, चमक, पराग जैसी छोटी-छोटी स्टोरी बुक्स कुछ साथियों की मदद से हम बच्चों के बीच ले जाकर लगाते हैं। हमारे ऑफिस यूथ रिसोर्स सेंटर पर हम लोग सारी किताबें जमा करके उनको एक रजिस्टर में लिख लेते हैं कि कौन सी किताबें हैं, उनकी कितनी कॉपियाँ हैं और फिर हम उन्हें झोले  में रखकर अपने साथियों और कुछ वॉलिंटियर्स की मदद से अपने क्षेत्र में समुदाय के बीच जाकर पुस्तक यात्रा लगाते हैं। किसी खाली सामुदायिक जगह जैसे किसी मंदिर के आँगन में, या लोगों के बैठने की जगह जैसे किसी पेड़ के चबूतरे पर और कभी-कभी किसी के घर के आंगन में या घर की खुली जगह जैसे खिड़की आदि जैसी जगहों पर हम इन पुस्तकों को सजा देते हैं। बच्चे बहुत खुश होकर हमारी पुस्तकें पढ़ते हैं और उनसे क्या सीख मिलती है वह भी बताते हैं। 

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जब हम लोग पुस्तक यात्रा लगते हैं तब काफी लोग हैरान भी रहते हैं, लोगों के मन में बहुत से सवाल भी रहते हैं, हम लोगों से उन सवालों को पूछने के लिए कहते भी हैं। लोग अक्सर हमसे पूछते हैं कि आप लोग यह सब क्यों करते हैं या आप लोग क्या किसी स्कूल का प्रचार कर रहे हैं या किसी किताब का प्रचार कर रहे हैं, इस तरह के कई सवाल लोग हमसे पूछते रहते हैं। ऐसे में हम लोगों को बताते हैं कि ना तो हमारा मकसद कुछ बेचना है और ना ही कोई प्रचार करना है, हम लोग का मकसद यह  है कि हमारे क्षेत्र और मोहल्लों में बच्चों का ध्यान मोबाइल की दुनिया से कुछ समय के लिए दूर हो और वो स्कूल की किताबों से थोड़ा हटकर भी कुछ चीज़ें पढ़ें। हम लोगों ने तकरीबन 25 से 30 जगहों पर पुस्तक यात्रा लगाई है। बच्चे पहली बार में तो नहीं आते हैं, पहले बच्चे आने में थोड़ा सा डर महसूस करते हैं और उनको बहुत बुलाना पड़ता है, लेकिन जब दो-तीन बार एक ही जगह पर पुस्तक यात्रा लग जाती है तो फिर उनको बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती है, वह खुद ही आ जाते हैं। 

काफी सारे बच्चे किताबें घर ले जाकर भी पढ़ते हैं और अपने मम्मी-पापा को भी पढ़ाने की कोशिश करते हैं। उनके घर वाले जब हमसे मिलते हैं तो वह हमें ऐसा बताते हैं। पुस्तक यात्रा में शामिल होने वाले बच्चों की हम लोग लिस्टिंग भी करते हैं, अपना तालीम घर के नाम से हमने एक रजिस्टर भी बनाया है, जिससे बच्चों के नाम, उनके मम्मी-पापा का नाम, स्कूल का नाम और वह किस क्लास में हैं और मोबाइल नंबर यह सारी जानकारी नोट करते हैं। पहली बार में बच्चे यह सारी जानकारी देने से डरते हैं और मम्मी से पूछने की बात कहते हैं, लेकिन जब हम लोग दुबारा जाते हैं तो बच्चे खुद ही अपना नाम लिखवाने की कोशिश करते हैं और पूछते भी हैं कि हमारा नाम तो लिख लिया है ना। कभी-कभी हम लोग जब पढ़ने में व्यस्त हो जाते हैं तो बच्चे हमें अपने आप याद दिलाते हैं कि भैया आज आप नाम नहीं लिखेंगे। एक बार उनसे घुल-मिल जाने के बाद ये बच्चे हमारी काफी सहायता भी करते हैं, जैसे अगर हम लोग खड़े हों तो वह हम लोगों को बैठने के लिए कुर्सी भी लाकर दे देते हैं, पानी पीने को भी पूछते हैं, हम लोगों को देखकर ही वह सब कुछ लाकर रख देते हैं। बच्चे हम लोगों की पुस्तकें लगाने में भी सहायता करते हैं। जब बच्चों को कुछ समझ में नहीं आता है तो वह पूछते भी हैं कि यह क्या है, इससे क्या सीख मिलती है, जरा हमें समझा दीजिए। फिर हम लोग बच्चों को समझाने की कोशिश करते हैं। कई किताबें ऐसी भी होती हैं जिसमें कहानी की सीख सीधे-सीधे लिखी नहीं होती है, कुछ बच्चे तो चित्र देखकर समझ जाते हैं लेकिन कुछ नहीं भी समझ पाते हैं तो हम लोग बच्चों को समझाते हैं। हमें इन पुस्तक यात्राओं में बहुत मजा आता है, बच्चों के साथ उठना, बैठना, पढ़ना, लिखना, यह एक अलग तरह का ही अनुभव है। कभी-कभी हम लोगों से पढ़ने में अगर कोई गलती हो जाती है तो बच्चे हम लोगों को बताते हैं और हम लोगों ने भी उनके बीच में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया है कि हम कोई सर-मैडम या स्कूल के टीचर नहीं है, हमें अपना दोस्त समझिए और जो पूछना हो पूछिये। बच्चे हम लोगों से यह भी पूछते हैं कि क्या आप लोग खेल भी खिलाते हैं और कहते हैं कि हम लोगों को भी खेलने के लिए बुलाया करिए। हमारा संगठन हर साल अमन ट्रॉफी नाम से एक फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित करता है, इनमें से कुछ बच्चे अमन ट्रॉफी टूर्नामेंट के बारे में पूछते हैं और कहते हैं कि हम भी क्रिकेट और फुटबॉल टूर्नामेंट में खेलेंगे।

Author

  • इरशाद अहमद इंटीरियर डेकोरेशान का काम करते हैं और अवध पीपल्स फोरम के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की है। वह अपने जैसे कामगारों को संगठित करने का प्रयास कर रहे हैं। इन्होंने अभी कुछ युवा कामगारों के साथ संबंध निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू की है। इरशाद अपना काम करते हुए सामाजिक बदलाव की दिशा में कामगारों के साथ काम करने को लेकर आगे बढ़ना चाहते हैं।

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