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पलायन की कहानी मज़दूर साथी की जुबानी

रोजालिया तिर्की:

छोटका मुर्मू उम्र 18 वर्ष,  ग्राम-पंचवाहिनी, ज़िला दुमका, झारखण्ड का स्थाई निवासी है। वह अपने 20 साथियों के साथ काम की तलाश में बी.आर.ओ. लद्दाख में किसी मेट के द्वारा काम करने गये थे। झारखण्ड से लद्दाख पहुँचने के बाद उन 20 मज़दूरों को काफी दिनों तक काम नहीं मिला, ऐसी स्थिति में मेट के द्वारा दिए गए खाना-पीना से वो किसी तरह दिन बिता रहे थे और काम मिलने के इन्तज़ार में थे। 

कुछ दिन के बाद जो मेट उन्हें लेकर गया था, उसने भी उन सभी मज़दूरों को छोड़ दिया। ऐसे में दाने-दाने को खाने के मोहताज छोटका मुर्मू ने मन में ठान लिया कि लद्दाख से अब झारखण्ड लौटा जाये। वो अपने बाकी साथियों को छोड़कर भाग निकला। लद्दाख से दिल्ली आने के क्रम में एक अनजान व्यक्ति से उसकी ट्रेन में मुलाकात हुयी। वह व्यक्ति छोटका मुर्मू को बरगला-फुसला कर अपने साथ उत्तर प्रदेश ले गया और बागपत ज़िले के ग्राम कुर्डी में बबलू नामक एक व्यक्ति को चुपके से बेच दिया। छोटका मुर्मू  को इसके बारे में कुछ मालूम नहीं चला। 

छोटका बहुत ही ईमानदार और मेहनती व्यक्ति था, उसने बबलू के पास 20 दिन  मज़दूरी की। एक दिन उसी गाँव की कुछ महिला मज़दूरों को छोटका मुर्मू की दयनीय हालात पर काफी तरस आया और उन्होने आपस में चर्चा करते हुए, छोटका को वहाँ से जितना जल्दी हो सके भाग निकलने की सलाह दी। उन्होने छोटका को कुछ कपड़े और पैसे देकर भागने में सहयोग किया। उन महिलाओं ने उसे यह हिदायत देकर भेजा कि जब तक तुम उत्तर प्रदेश की सीमा पार नहीं करोगे तब तक अपना मोबाईल स्विच ऑफ करके रखना।

भागने के क्रम में रास्ते के मंदिर और गुरूद्वारे में बांटे जाने वाले खाने का पैकेट छोटका ने बाँध लिया था और उसे ही खाकर वह सफर करता रहा। दिल्ली पहुँचने पर कुछ बदमाशों ने उसका मोबाइल छीनने का प्रयास किया। उनके साथ धक्का-मुक्की भी हुयी, परन्तु स्थानीय पुलिस ने संभाल लिया और पुनः चोटका के सफर की व्यवस्था की। झारखण्ड पहुँचने के बाद भी रेलगाड़ी से उतरने के पहले ही टी.सी. ने छोटका को पकड़ लिया तो उसने उन्हें अपनी आपबीती कह सुनायी। तब स्थानीय पुलिस की टीम ने आपस में चर्चा करते हुए छोटका को मदद करने के लिए उसका टिकट करवाकर कर उसे वापस घर भेज दिया। इस तरह से छोटका मुर्मू को अपने राज्य, परिवार, सगे-सबंधियों को दुबारा पाने के लिए बड़ा दुःख उठा कर संघर्ष करना पड़ा।

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  • रोजालिया, झारखण्ड से हैं। वे पिछले दो दशकों से महिलाओं के मुद्दे, शहरी बस्तियों के मुद्दे और मज़दूरी के सवालों पर निरंतर काम कर रही हैं। रोजालिया ने अन्य कुछ महिलाओं के साथ सामूहिक रूप से जावा (झारखण्ड आदिवासी विमेंस एसोसिएशन) नामक संस्था बनाई जो आदिवासी महिलाओं के सवालों पर सतत काम कर रही है।

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