उत्कर्ष:
लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पर सहमति जताते हुए राहुल गाँधी ने जब कहा, “सरकार चलाने वाले शीर्ष के 90 सचिवों में सिर्फ 3 ओबीसी समाज से आते हैं” तो इस बयान ने एक नए मसले को तूल दे दिया और एकबार फिर से ओबीसी आरक्षण पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।राहुल गाँधी ने जो कहा वो एक विकराल समस्या की बस झलक भर है, अंग्रेजी में यदि कहें तो इट इज ओनली अ टिप ऑफ़ आईसबर्ग (It is only a tip of an iceberg)। अगर हम ऐसे ही आंकड़ों में और गोते लगाएँ तो पिछड़ा वर्ग आज किस पायदान पर खड़ा है, उसकी असली पोल खुल जायेगी ।
कहने को मंडल कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी की जनसंख्या देश की कुल आबादी की 52% है, लेकिन कुछ बुद्धिजीवी मानते हैं की अब ये प्रतिशत 55–60 पहुंच गया है। लेकिन प्रतिनिधित्व के मामले में भारत सरकार के 75 मंत्रालयों में A ग्रेड ओबीसी अफसरों की संख्या महज 18% है। ये जानकारी सरकार के मंत्री जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में एक जवाब में दी।
- ओबीसी का प्रतिनिधित्व विभिन्न पदों पर कुछ इस प्रकार है-
- एडिशनल सेक्रेटरी – 0% (कुल 93 पद)
- ज्वाइंट सेक्रेटरी – 6.91% (कुल 275 पद)
- डायरेक्टर – 13.89% ( कुल 288 पद)
- प्रोफेसर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में – 4.1%
- एसोसिएट प्रोफेसर केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 4.9%
सिर्फ केंद्रीय मंत्रालयों में ही एससी, एसटी और ओबीसी के 42000 से ज्यादा पद खाली हैं। बराबर हिस्सेदारी न मिलना इस समाज की सिर्फ एक समस्या है, इससे भी जटिल समस्या यह है कि ओबीसी वर्ग में भी आरक्षण का सामान रूप से वितरण कैसे हो? क्योंकि इसमें कुछ जातियाँ पिछड़ी हैं, कुछ अति पिछड़ी तथा कुछ अगड़ी जातियाँ भी शामिल हैं। छोटी-बड़ी मिलाकर कुल 3000 से अधिक जातियाँ ओबीसी के हिस्से आती हैं। यह बात भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि कैसे 3000 जातियाँ एक समाज में पनपी होंगी। साधारण कामगार इंसानों का ऐसा वर्गीकरण ये दिखता है कि इनके लिए आरक्षण क्यों होना चाहिए, 3000 तो व्यवसाय नही होंगे, सही ही कहा गया है- “ज्यों केले की पात-पात में पात-पात में पात। त्यों हिन्दुओं की जाति-जाति में जाति-जाति में जात।”
अपने आस-पास नज़र घुमा के देख लीजिए जो भी ज्यादा तथाकथित सम्मानजनक काम नहीं कर रहा है, हर वह व्यक्ति पिछड़ी जाति का व्यक्ति निकलेगा। जैसे नाई, धोबी, दर्जी, ठठेरा, हलवाई, भड़भुजा, तेली, मदारी, लोहार, कसाई आदि।
बगीचे से फूल तोड़ने के लिए अलग से एक जाति है- माली, ध्यान रहे कि माली सिर्फ फूल तोड़ेगा, जो सब्जी तोड़ेगा तो वो हो जायेगा मौर्या या मुराव, मौर्या सिर्फ सब्जियों की खेती करेगा, अगर अनाज की खेती करना है तो ये काम कुर्मी जाति का व्यक्ति करेगा, खेती अगर पान की है तो उसको चौरसिया जी करेंगें।
भारत एक गरीब देश था, लोग गाहे बगाहे ही चूड़ियां पहनते थे लेकिन उसके लिए भी जाति है- लखेरा। लखेरा जाति के लोग सिर्फ लाख की चूड़ियाँ बनाएँगे अगर चूड़ी कांच की है तो उसको मनिहार बनाएगा, चूड़ियां अगर सोने को है तो उसको सोनार बनाएगा।
अगर इतिहास में बहुत पीछे न जाएँ, तो भी ये जवाब मिल जायेगा कि ये पिछड़ी जातियाँ आखिर कौन हैं। आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा ज्योतिबा फुले ने सर्वप्रथम 1870 में जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए ब्राह्मणवाद का बहिष्कार किया था। ज्ञात हो कि सती प्रथा तथा महिला अधिकारों के लिए आंदोलन 1829 में राजाराम मोहन राय के ब्रम्हो समाज बनाने के बाद शुरू हो गए थे। लेकिन जब 1873 में सत्यसोधक समाज की नींव रखते हुए महात्मा फुले ने कहा था कि सवर्ण जातियों को छोड़ कर बाकी सभी जातियां शूद्र है, महात्मा फुले खुद माली जाति से आते थे, जो अभी एक ओबीसी जाति है। बाद में बाबा साहेब अंबेडकर ने भी महाराष्ट्र की धरती से उपजे इसी आंदोलन से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के समानांतर, जाति प्रथा उन्मूलन के लिए कई आंदोलन किए। बाबा साहेब ने इन्ही पिछड़ी जातियों को दो वर्गों में विभाजित किया, शुद्र और अतिशुद्र। आज़ादी के आंदोलन से संविधान बनने तक यही अतिशूद्र जातियां एससी और एसटी में बदल गई। यह बात भी सत्य है कि अंबेडकर ने एक पांच हजार साल पुरानी दानवी व्यवस्था से लोहा लिया था, इसीलिए उनको सिर्फ एससी और एसटी को रिजर्वेशन दिलवाने के लिए लोहे के चने चबाने पड़े। लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को पहली बार आरक्षण मिला 1990 में वो भी बहुत हाय–तौबा मचाने के बाद।
2016 में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने तथा वर्तमान में जाति आधारित जनगणना का डेटा ना रिलीज़ करने से सरकार की ओबीसी आरक्षण पर मंशा साफ समझी जा सकती है। रोहिणी आयोग की सिफ़ारिश को न लागू करना, आयोग के कार्यकाल को 14 बार विस्तारित करना आदि से लगता है मानो एक बार फिर सामाजिक और राजनैतिक आधार पर गैर-बराबरी के अनुसार सरकारें आरक्षण देने से कन्नी काट रही हैं।
इस तरह से हम कह सकते हैं कि आंकड़ों में आज ओबीसी का रिप्रेजेंटेशन जो इतना कम दिखाई दे रहा है, उसका एक कारण यह भी है कि एक तो इस तबके के लिए सामाजिक न्याय का चिराग बहुत देर से जला और जल्दी बुझता हुआ प्रतीत हो रहा है।
सरकार भी यह जानती है कि कैसे ओबीसी आरक्षण का लाभ सिर्फ ओबीसी की कुछ जातियों को मिल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक ओबीसी की 70 प्रतिशत आबादी को ओबीसी आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिल रहा है। इस कारण रोहिणी आयोग का गठन किया गया ताकि आरक्षण का वितरण उपवर्गों में उचित रूप से हो सके, लेकिन अभी ये रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
महिला आरक्षण दिया गया इसके लिए देशवासियों को बधाई, लेकिन ओबीसी महिलाओं के लिए फिर से कोई प्रावधान नहीं दिया गया। वैसे तो राम मनोहर लोहिया कहते थे कि महिला किसी भी जाति की हो, महिला हमेशा शुद्र ही होती है, लेकिन सरकार आधी से अधिक जनसंख्या वाले समाज की राजनीतिक भागीदारी कैसे सुनिश्चित करेगी? अगर यह मान लिया जाए कि पिछड़ी जातियाँ आर्थिक रूप से समृद्ध हो भी जाए तो भी इन्हें समाज में पिछड़ेपन का दंश अभी भी दशकों तक झेलना पड़ेगा, क्योंकि आपके विद्यालयों में पढ़ाया यही जायेगा कि ठ से ठठेरा।

