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सामाजिक परिवर्तन शाला से मेरे अंदर आए बदलाव: प्रियंका कुमारी

प्रियंका कुमारी:

व्यक्तिगत बदलाव –

एसएससी शिविर के बाद मेरे अन्दर बहुत बदलाव आया है। जाति, धर्म, और रंग-रूप को लेकर पहले मैं बहुत भेदभाव व संकोच करती थी। लेकिन एसएससी के शिविर में आकर बहुत कुछ जानने, समझने और सीखने को मिला। बहुत अच्छा भी लगा। मुझे शिविर से ये सारी सीख भी मिली कि इश्वर जैसा कुछ नहीं होता है और ना ही कोई एक धर्म सबसे ऊपर है और ना ही भगवान ने पृथ्वी को या हमें बनाया है। यह यूनिवर्स बिग बैंग होने के बाद बना है। धीरे-धीरे चांद, तारे, धरती, सूर्य, का निर्माण हुआ और सब ही कुछ इलेक्ट्रान, प्रोटोन, न्यूट्रॉन, से बने हैं। मानव उत्पत्ति की कहानी में कैसे जाति, धर्म, जेंडर, आदि की पहचानें उभरी और कैसे इनसे धीरे-धीरे समाज में भेदभाव बढ़ा, इसको भी बहुत बारीकी से जानने का मौका मिला है। मेरे अन्दर भी इसी भेदभाव के जो बीज थे, वो अब खत्म हो गए हैं। अब मैं निजी जीवन में धर्म और जाति के अलग होने से, होते चले आ रहे भेदभावों को न मानती हूँ, और न ही ऐसे कार्य करती हूँ जो उनको बढ़ावा दें। बहुत ज़्यादा पूजा-पाठ में विश्वास करने वाली, परिवार वालों के दबाव में कभी-कभी बहुत ज़्यादा धार्मिक प्रथाओं को मानने/पालन करने वाली मैं, अब पूजा-पाठ, व्रत इत्यादि करना सब छोड़ दी हूँ, न ही अब मैं उन पर विश्वास करती हूँ।

कुशलता में बदलाव –

अगर कुशलता में आये बदलावों की बात करें तो, पहले मैं बहुत ध्यान से नहीं लिखती थी, बस लिखने के लिए, जो समझ आ रहा हो, लिख देती थी। पढ़ाई करने की बात जहाँ तक है, पहले हम टीचर के भरोसे ही रहते थे कि जब जो टीचर पढाएंगे, तभी पढ़ेंगे, नहीं तो नहीं! लेकिन मैं इस बार बी.ए. पार्ट 1 की तैयारी खुद से कर रही हूँ, तो खुद से ही पढ़ाई भी कर रही हूँ। मैं किसी कोचिंग या ट्यूशन पढ़ने भी नहीं जा रही और तो और वर्तमान में मैं काम के साथ-साथ पढ़ाई कर रही हूँ। यह सेल्फ-स्टडी का आत्मविश्वास मुझे शिविरों से आया है, जहाँ दिन भर अलग-अलग सत्रों में सीखने-समझने के बाद, रात में कुछ कार्य हमको स्वयं से व कुछ कार्य ग्रुप में मिलकर करना होता था। इसी दौरान मुझे खुद से पढ़ाई करने में रूचि जागी है। निजी बदलाव में एक और महत्वपूर्ण बदलाव आया है, वो है कि अब मैं और साहस के साथ बोल पाती हूँ और अपनी बात को सही रूप से व्यक्त कर पाती हूँ। पहले मैं बहुत हिचकिचाती थी, और सिर्फ अपने ही लोगों से बात करती थी। लेकिन अब अलग-अलग राज्यों के लोगों से बात करती हूँ, और कई गहरी दोस्तियाँ भी बना पाई हूँ।

काम में बदलाव –

इस शिविर के बाद हमारे काम में बदलाव आया है कि शिविर में जो भी सीखे हैं, उसे हम अपने क्षेत्र जहाँ पर हम युवा क्लब चलाते हैं, वहाँ भी अपने कामों में उतार पा रहे हैं। सभी बातें हम क्लब में भी बताते हैं। जब भी में संचालकों की मीटिंग होती है, तो उस मीटिंग में भी हम अपनी सीख व अनुभव को साझा करते हैं। पहले हम युवा क्लब में सिर्फ खेल खिलाते थे, पर अब हम इन्हीं खेलों के बीच में, ज़रूरी मुद्दों, विषयों पर बातचीत, छोटे-छोटे समूहों में चर्चा, पढ़ाई, बहुत सारा कुछ करते हैं।

विचार में बदलाव –

इस शिविर के बाद, मैं यह सीखी हूँ कि अपने क्षेत्र में चल रहे कामों के साथ-साथ संघर्ष और निर्माण जैसी प्रक्रियाओं को भी मज़बूत करना है और इस दिशा में भी काम करना है। चूँकि एसएससी करने से पहले मेरा सोच-विचार अलग था, लेकिन एसएससी के शिविरों से मेरी समझ और विचार दोनों में ही बहुत विस्तार हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते मैं और स्थिरता से समाज के लिए काम करुँगी और अपनी उम्र के युवाओं को भी प्रेरित करुँगी। सामाजिक कार्यकर्ता होने के नाते, मैं अपने आप पर भी मेहनत करुँगी, और अपने विचारों को समाज तक पहुँचाने के प्रयास करती रहूंगी।

Author

  • ओडिशा के सुंदरगढ़ ज़िले की रहने वाली प्रियंका, हिंदी साहित्य में पोस्ट ग्रेजुएट हैं और उन्होंने पिछले साल यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। उन्हें खासतौर पर कविताएँ लिखना पसंद है, वर्तमान में वह नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं।

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